सुनने की कला, रिश्तों की दूरी और भीतर के सन्नाटे पर सवाल उठाता है ‘आखिरी श्रोता’

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थिएटर सेल, जेएनवीयू की नवाचारी नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को तालियों से अधिक आत्ममंथन के लिए छोड़ा

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

आधुनिक समाज की तेज़ रफ्तार, घोर प्रतिस्पर्धा और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच मनुष्य-मनुष्य के बीच लगातार बढ़ती अप्रत्यक्ष दूरी, क्षीण होती ‘सुनने की कला’ और स्वयं के लिए समय निकाल पाने की जद्दोजहद को केंद्र में रखकर लिखा गया नाटक ‘आखिरी श्रोता’ शनिवार को थिएटर सेल, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के स्टूडियो में मंचित हुआ। डॉ. हितेंद्र गोयल द्वारा लिखित एवं निर्देशित इस समकालीन नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि कई ऐसे प्रश्नों और भावों के साथ छोड़ा, जो मंचन समाप्त होने के बाद भी देर तक भीतर गूंजते रहे।

‘आखिरी श्रोता’ का मूल प्रश्न बेहद सहज है—क्या आज हमारे पास किसी को सचमुच सुनने का समय है? नाटक आधुनिक जीवन की उस विडंबना को रेखांकित करता है, जहाँ हम एक-दूसरे से लगातार संवाद तो कर रहे हैं, लेकिन एक-दूसरे को सुनने की क्षमता और धैर्य खोते जा रहे हैं। मशीनों और स्क्रीन से घिरे इस दौर में किसी के साथ बैठकर चाय पीना, किसी के कंधे पर हाथ रखना, किसी रोते हुए व्यक्ति के पास चुपचाप बैठ जाना, माँ-बाप से सार्थक संवाद करना या कुछ क्षण स्वयं के साथ बिताना—नाटक इन्हीं छोटी लेकिन जीवन की बुनियादी जरूरतों को केंद्र में लाकर अनेक प्रश्न उठाता है।

नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दर्शकों को कोई आसान समाधान नहीं देता। मंचन के बाद जोरदार तालियों के बीच तुरंत उठकर चले जाने के बजाय यह दर्शकों को कुछ क्षण स्थिर, शांत और आत्ममंथन की अवस्था में रहने के लिए विवश करता है—मानो दर्शक अपने भीतर घटित हो रहे किसी परिवर्तन को महसूस कर रहा हो।

लेखन में दार्शनिक गहराई, सामाजिक सरोकार और चुटीले हास्य का सुंदर संयोजन दिखाई देता है। संवादों और दृश्यों के माध्यम से निर्मित कई बिंब ऐसे हैं, जो मंच से उतरने के बाद भी दर्शकों के ज़ेहन में देर तक गूंजते रहते हैं।

नाटक के केंद्रीय पात्र श्रवणदास में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं एनएसडी वेटरन बी. एम. व्यास ने अपने अनुभव और अभिनय कौशल से गहरी छाप छोड़ी। उम्र, अनुभव और संवाद अदायगी के अद्भुत तालमेल के साथ उन्होंने श्रवणदास के भीतर पल रहे अपराधबोध को पूरे नाटक का केंद्रीय भाव बना दिया। अपनी पत्नी लता की स्मृतियों और उससे जुड़े अपराधबोध के माध्यम से श्रवणदास का चरित्र नाटक के मूल कथ्य को एक गहरी मानवीय संवेदना प्रदान करता है।

नंदिता के किरदार में वरिष्ठ रंग अभिनेत्री अनुराधा अडवाणी की संवाद अदायगी, भावानुभूति और अभिनय शैली ने दर्शकों को विशेष रूप से बाँधे रखा। मनोहर सिंह एक मंत्री के रूप में , रिटायर्ड हरिराम के किरदार में उम्मेद भाटी, इन्फ्लुएंसर युवक के रूप में अभिषेक परिहार तथा इंटेलेक्चुअल पागल के रूप में भरत वैष्णव ने अपनी भूमिकाओं से उल्लेखनीय प्रभाव छोड़ा।

थिएटर सेल के प्रशिक्षित कलाकारों में काव्या जग्गी , तोशी गोयल, वंदना पंवार,जितेंद्र पंचारिया, डॉ. रुचिता मेहता, मधुसूदन, नवीन मित्तल, नरेंद्र चौधरी और ओमप्रकाश लखारा ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करते हुए नाटक के कथानक को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मंच के तकनीकी पक्ष में स्टूडियो मैनेजमेंट नितिन मारू , मयूर परमार ने रंगदीपन, प्रमोद बैनीवाल ने संगीत संयोजन, सेट डिज़ाइन दुर्गादास वैष्णव व नरेंद्र चौधरी, मेक अप और वेशभूषा रामरश्मि सोमानी जबकि रचनात्मक सहयोग विक्रम सिंह राठौड़ का रहा।

नाटक के शनिवार के मंचन में जोधपुर शहर के वरिष्ठ रंगकर्मियों, विश्वविद्यालय के शिक्षकों और बड़ी संख्या में कला एवं रंगमंच प्रेमियों ने सहभागिता की और प्रस्तुति की विषयवस्तु, अभिनय तथा मंचीय प्रयोगों की सराहना की।

‘आखिरी श्रोता’ का अगला मंचन रविवार, 20 सितंबर को दो बार—दोपहर 3 बजे और शाम 6:30 बजे—थिएटर सेल स्टूडियो, पुराना परिसर, मोहनपुरा पुलिया के पास, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में होगा।

थिएटर सेल, जेएनवीयू ने जोधपुर के रंगप्रेमियों और आम दर्शकों से इस समकालीन एवं संवेदनशील नाट्य प्रस्तुति को देखने के लिए सादर आमंत्रित किया है।

‘आखिरी श्रोता’ शायद आपको कुछ सुनाए नहीं—
शायद वह आपको यह महसूस कराए कि आप कब से किसी को सचमुच सुन नहीं पाए हैं।

 

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