मैं एक गीतकार के तौर पर उनकी शख्सियत को खुद से कभी अलग नहीं कर पाऊंगा। मेरी ज़िंदगी का पहला रिलीज़ हुआ गीत ‘मिली न मोहब्बत’ उन्होंने ही कंपोज़ किया था। यह बात साल 2008 की है, जब मेरी यह नज़्म उनके हाथों में पड़ी और उन्होंने हाथों-हाथ इसे धुन में पिरो दिया।
दिलीप केसानी. जोधपुर
कुलदीप माथुर। एक और दोस्त का चला जाना…। कुलदीप माथुर कुछ लोगों के लिए शायद सिर्फ एक नाम हो सकता है, जिससे वे पूरी तरह अनजान हों। लेकिन कुछ लोगों के लिए उनकी पहचान यह थी कि वे कंप्यूटर हार्डवेयर के बेहतरीन जानकार थे, मेडिकल क्षेत्र की गहरी समझ रखते थे, गणित के विद्वान थे और एक समर्पित गुरु थे। वहीं कुछ लोगों के लिए उनकी पहचान एक बेहद उम्दा इंसान के रूप में थी। सच कहें तो, आप उनकी पहचान के दायरे को जितना समेटते जाएंगे, उनकी शख्सियत उतनी ही विशाल नज़र आती जाएगी।

मैं एक गीतकार के तौर पर उनकी शख्सियत को खुद से कभी अलग नहीं कर पाऊंगा। मेरी ज़िंदगी का पहला रिलीज़ हुआ गीत ‘मिली न मोहब्बत’ उन्होंने ही कंपोज़ किया था। यह बात साल 2008 की है, जब मेरी यह नज़्म उनके हाथों में पड़ी और उन्होंने हाथों-हाथ इसे धुन में पिरो दिया। रिकॉर्ड करके उन्होंने इसे संभाल कर रख लिया था, जिसे हमने आगे चलकर साल 2020 में रिलीज़ किया। इसके अलावा,
उन्होंने मेरी लिखी एक और नज़्म ‘दिल बनके’ को भी कंपोज़ किया था, जिसकी शूटिंग इटली में हुई और रिकॉर्डिंग अमेरिका (USA) में की गई। साल 2016 में जब मेरी पहली किताब ‘दस्तक’ का विमोचन हुआ, तब कुलदीप जी ने मंच से मेरी एक ग़ज़ल गाकर सुनाई थी, जिसे लोगों ने बेहद पसंद किया था।
’श्री जागृति संस्थान’ के कई कार्यक्रमों में भी उन्होंने अपने गीतों की प्रस्तुतियाँ दीं। साल 2018 की ‘श्री तिलक राज-जुगल किशोर जी नाइट’ में भी अपनी गायकी से उन्होंने दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी थी। कुलदीप जी के कंपोज़ किए हुए कुछ और गीत भी मेरे पास सुरक्षित रखे हैं—जैसे ‘आपके बस की बात नहीं’, ‘तुझे इश्क़ हो ख़ुदा करे’, और ‘मुख़्तसर दीवानगी’। ज़िंदगी में अगर कभी मौक़ा मिला, तो इन गीतों को भी दुनिया के सामने ज़रूर लाऊँगा।
कुलदीप जी और मेरा ताल्लुक सिर्फ़ गीतों तक ही सीमित नहीं था। हम अक्सर घंटों फोन पर बातें किया करते थे, एक-दूसरे से अपने सुख-दुख बांटा करते थे। उनका इस तरह अचानक चले जाना मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा ख़ालीपन छोड़ गया है, जो शायद इस जन्म में कभी नहीं भर पाएगा।
उनका अनूठा अंदाज़, हर किसी से मुस्कुराकर मिलना, हंसी-मज़ाक करना और बच्चों से भी बेहद तहज़ीब व अदब से बात करना—ये सब उनकी ख़ासियतें थीं। दिल से वे भी बिल्कुल बच्चे ही थे; हमारी 20 साल पुरानी दोस्ती में मैंने कभी उन्हें ग़ुस्से में नहीं देखा। शायद यही वजह है कि उनके जाने का अफ़सोस उनके अपनों से कहीं ज़्यादा उन्हें जानने-पहचानने वालों को है।
उनकी शख्सियत अब दोबारा लौटकर नहीं आने वाली। आख़िर में ईश्वर से यही दुआ है कि वे उनकी रूह को अपने चरणों में/जन्नत में जगह दें और उनके परिवार को इस असीम दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।







