आखिरी श्रोता : किसी के पास बैठना भी कभी कभी सबसे बड़ा संवाद होता है

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दूसरे दिन दर्शकों की आँखें हुईं नम, दोनों मंचन हाउसफुल रहे, सुनने की कला और मानवीय उपस्थिति के सवाल ने दर्शकों को भीतर तक छुआ

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

किसी के पास बैठने के लिए हमेशा शब्दों की जरूरत नहीं होती। कई बार किसी के पास चुपचाप बैठ जाना ही सबसे बड़ा मानवीय काम होता है। किसी की बात सुनने के लिए बोलना जरूरी नहीं, केवल उसके साथ बने रहना जरूरी है। थिएटर सेल, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय की समकालीन नाट्य प्रस्तुति ‘आखिरी श्रोता’ ने अपने दूसरे दिन के दोनों मंचनों में इसी मानवीय संवेदना को इतनी गहराई से स्पर्श किया कि कई दर्शकों की आँखें नम हो गईं और मंचन समाप्त होने के बाद सभागार में कुछ क्षणों का मौन स्वयं एक संवाद बन गया।

शनिवार के पहले हाउसफुल मंचन के बाद रविवार, 20 सितंबर को दोपहर 3 बजे और शाम 6:30 बजे हुए दोनों मंचन भी दर्शकों से पूरी तरह भरे रहे। तीनों मंचनों में दर्शकों की लगातार बढ़ती सहभागिता इस बात का संकेत रही कि ‘आखिरी श्रोता’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि हमारे समय के उस भावनात्मक संकट से संवाद कर रहा है, जिसमें हम सबके पास बोलने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी को सचमुच सुनने के लिए समय लगातार कम होता जा रहा है।

डॉ. हितेंद्र गोयल द्वारा लिखित, परिकल्पित एवं निर्देशित ‘आखिरी श्रोता’ आधुनिक जीवन की उस विडंबना को केंद्र में रखता है, जहाँ तकनीक, व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा और लगातार भागती जिंदगी के बीच रिश्तों में एक ऐसी अप्रत्यक्ष दूरी पैदा हो गई है, जिसे हम अक्सर पहचान भी नहीं पाते। नाटक का सवाल बहुत सरल है—क्या हमारे पास आज किसी के पास बैठने भर का समय है?

नाटक यह भी कहता है कि सुनना केवल कानों का काम नहीं, बल्कि मनुष्य की उपस्थिति का सबसे गहरा रूप है। किसी रोते हुए व्यक्ति के पास चुपचाप बैठना, माँ-बाप की बात बिना मोबाइल देखे सुनना, अपने साथी के साथ कुछ पल बिना किसी जरूरी काम के बिताना, या किसी ऐसे व्यक्ति को अपना समय देना जिसे सिर्फ यह एहसास चाहिए कि कोई उसके साथ है—ये छोटे दिखाई देने वाले काम ही शायद मनुष्य होने की सबसे बड़ी निशानियाँ हैं।

इसी भाव ने रविवार के दोनों मंचनों में दर्शकों को विशेष रूप से प्रभावित किया। कई दृश्यों में सभागार में सन्नाटा रहा और मंच पर घट रही संवेदना दर्शकों के चेहरों पर साफ दिखाई दी। कहीं मुस्कान थी, कहीं बेचैनी और कहीं आँखों में आँसू। नाटक समाप्त होने के बाद मिली लंबी तालियाँ केवल अभिनय की प्रशंसा नहीं थीं, बल्कि उन भावनाओं की स्वीकृति भी थीं, जिन्हें दर्शकों ने अपने निजी जीवन से जुड़ा हुआ महसूस किया।

नाटक के केंद्रीय पात्र श्रवणदास के रूप में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं एनएसडी वेटरन बी. एम. व्यास ने एक बार फिर अपने अभिनय अनुभव और गहरी संवाद अदायगी से दर्शकों को बाँधे रखा। श्रवणदास के भीतर का अपराधबोध, उसकी पत्नी लता की स्मृतियाँ और एक बेहतर श्रोता बनने की उसकी यात्रा नाटक के भावात्मक केंद्र को मजबूती प्रदान करती है।

नंदिता के किरदार में वरिष्ठ रंग अभिनेत्री अनुराधा अडवाणी की संवाद अदायगी और भावाभिव्यक्ति ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। मनोहर सिंह ने मंत्री की भूमिका, उम्मेद भाटी ने सेवानिवृत्त हरिराम, अभिषेक परिहार ने इन्फ्लुएंसर युवक तथा भरत वैष्णव ने इंटेलेक्चुअल पागल की भूमिका में उल्लेखनीय अभिनय किया।

थिएटर सेल के प्रशिक्षित कलाकारों में काव्या जग्गी, तोशी गोयल, वंदना पंवार, जितेंद्र पंचारिया, डॉ. रुचिता मेहता, मधुसूदन, नवीन मित्तल, नरेंद्र चौधरी और ओमप्रकाश लखारा ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वहीं भानु प्रोहित ने न्यूज़ एंकर की भूमिका में प्रस्तुति को समकालीन सामाजिक और मीडिया संदर्भ से जोड़ा।

मंच के पार्श्व एवं तकनीकी पक्ष में नितिन मारू ने स्टूडियो मैनेजमेंट, मयूर परमार ने रंगदीपन, प्रमोद बैनीवाल ने संगीत संयोजन, दुर्गादास वैष्णव एवं नरेंद्र चौधरी ने सेट डिज़ाइन, रामरश्मि सोमानी ने मेकअप एवं वेशभूषा तथा विक्रम सिंह राठौड़ ने रचनात्मक सहयोग की जिम्मेदारी निभाई।

रविवार के दोनों मंचनों में जोधपुर के वरिष्ठ रंगकर्मियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। भवानी सिंह चौहान, अरू व्यास, स्वाति व्यास, माहिर साब , शब्बीर हुसैन, हरीश देवनानी, जितेंद्र जालौरी और राहुल बौड़ा सहित शहर के अनेक वरिष्ठ रंगकर्मी प्रस्तुति देखने पहुँचे। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एवं वित्त नियंत्रक दशरथ छोलंकी सहित विश्वविद्यालय परिवार के सदस्यों ने भी प्रस्तुति देखी। इसके साथ ही थिएटर सेल के रंगकर्मियों और जोधपुर के युवा रंगकर्मियों की बड़ी संख्या ने भी नाटक की प्रस्तुति का साक्षात्कार किया। आज के मुख्य मंचन में विशिष्ट अतिथि के रूप में वैभव मूथा उपस्थित रहे।

लगातार दूसरे दिन हाउसफुल रहे दोनों मंचनों ने यह स्पष्ट किया कि दर्शक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ऐसा रंगमंच भी देखना चाहते हैं जो उन्हें उनके अपने जीवन, रिश्तों और भीतर के सन्नाटे के सामने खड़ा कर दे।

‘आखिरी श्रोता’ शायद आपसे कुछ कहने नहीं आया है।

वह शायद सिर्फ इतना पूछने आया है—
जब कोई आपके पास बैठकर कुछ कहना चाहता था,
तब क्या आप सचमुच उसके पास थे?

क्योंकि सुनने के लिए हमेशा बोलना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी बस बैठे रहना ही काफी होता है।

कल अंतिम दिन नाटक का मंचन में कुलगुरु प्रो पवन कुमार शर्मा के मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे ।

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