कहानी : जिसके पीछे संसार चला- लेखक : डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित

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( लेखक परिचय : नाम : डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित। माता पिता : श्रीमती अमर कौर, श्री राम चंद्र पुरोहित। पत्नी: श्रीमती सुमन पुरोहित। शिक्षा : एमएससी, पीएचडी, Botany/Plant Physiology. कार्य अनुभव : 40 वर्ष, सेनि. प्रोफेसर एवं निदेशक, राजस्थान कृषि विश्व विद्यालय, बीकानेर। वर्तमान : संस्थापक अध्यक्ष, संबल प्रतिष्ठान : www.sambalglobal.com प्रमुख कर्म: शिक्षण, botany, अंग्रेज़ी, संस्कृत, हिंदी। अन्य कौशल : बेच फ्लॉवर पंजीकृत हीलर, परामर्श, जिन शिन कला, स्विच वर्ड, पुस्तक लेखन, एवं व्याख्यान। रुचि : साहित्य, पठन पाठन, कहानी वार्ता, संगीत, सिनेमा। प्रकाशन : दस पुस्तकें, कार्य क्षेत्र, बीस इतर क्षेत्र, जैसे, बेच फ्लॉवर, जिन शिन, स्विच वर्ड, गीता, बीज मंत्र टेक्नोलॉजी,प्रकटिकरन, अंग्रेज़ी, संस्कृत व्याकरण, कहानियाँ, कविताएँ, लेख इत्यादि। सम्मान: लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, 2011 संपर्क: 8290639891 purohitak2016@gmail.com ) 
जैन धर्म का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा है। बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया को अगर कोई रास्ता दिखा रहा है तो वह जैन धर्म ही है। कहने को जैन धर्म है, मगर यह एक प्रवाह है, यह एक धारा है और इस धारा को धारण करके ही हम मानवता के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जीवन हमारे सामने एक खुली किताब है। इस किताब के हर पन्ने पर लोक कल्याण की भावना है। महावीर ने आत्म कल्याण की संकुचित भावना से कभी कार्य नहीं किया, उनका जीवन लोक मंगल के लिए रहा। वे मानव जाति के कल्याण की बात करते रहे। जैन धर्म का प्रमुख आधार है क्षमा…दुश्मन को भी क्षमा कर देना जैन धर्म का प्रमुख आधार तत्व है।  परम वंदनीया चंदना की क्षमा और भगवान महावीर के संकल्प की कहानी दुनिया के सामने एक मिसाल है। यह वो कहानी है जिसके पीछे संसार चला…। डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित की लेखनी से लिखी कहानी ‘जिसके पीछे संसार चला’ को धारावाहिक के रूप में उदित भास्कर में प्रकाशित किया जा रहा है। हमारा पाठकों से आग्रह है कि यह कहानी आपको कैसी लगी, आप अपनी प्रतिक्रिया 9783414079 पर अवश्य अपने फोटो के साथ हमें भेजें, जिन्हें हम उदित भास्कर में समय-समय पर स्थान देंगे।

जिसके पीछे संसार चला

डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित

5- प्रेम का प्रस्फुटन

समस्त दर्शक दीर्घा कुमार  की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रही थी लेकिन एक ह्रदय और दो नयन थे जिनकी प्रसन्नता का कोई ओर -छोर नहीं था, वे थे राजकुमारी पद्मावती के।  नियति भी मानो मुस्कुरा रही थी। समारोह के बाद भी कुमार दधिवाहन महाराज के निमंत्रण पर कुछ दिनों के लिए लिच्छिवि गणराज्य में ही रुक गए और नियति ने एक ऐसा अवसर उपस्थित कर दिया जिससे युवराज दधिवाहन और राजकुमारी पद्मावती एक दूसरे के और निकट आ गए। हुआ यूँ कि नौका विहार करते समय एक मगरमच्छ ने राजकुमारी पद्मावती पर आक्रमण कर दिया और कुमार ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए राजकुमारी की प्राण रक्षा की। अब पदमावती के लिए कुमार एक अपराजेय योद्धा या सुकुमार नवयुवक  मात्र नहीं रह गए थे , वे उसके प्राण रक्षक भी हो गए थे। ताल के किनारे अर्ध सुषुप्त  अवस्था में श्लथ पड़े कुमार को  कुमारी पद्मावती चैतन्य करने का प्रयास करने लगी।

पद्मावती -जितशत्रु आर्य ! भद्र . कैसे हैं आप ?

कुमार – तुम कौन हो देवी ? क्या मैं स्वर्ग में हूँ ? या मेरी जल समाधि  हो गयी है। सुंदरी , क्या तुम अप्सरा हो या सरोवर कन्या ?

संकोच से पद्मावती के कपोल रक्तिम हो उठे, कोई उत्तर न दे सकी. सखी प्रसन्ना ने आगे बढ़ कर कहा – कुमार, ये राजकन्या पद्मावती हैं , आज आपके पराक्रम से ही इनकी और हम सबकी प्राण रक्षा हुयी है। आप स्वस्थ हों, हम आप को भवन में लिए चलती हैं।

कुमार – जी आप लोग चलिए , मैं कुछ ही देर में वस्त्र परिवर्तित कर भवन में उपस्थित होता हूँ।

लेकिन पद्मावती अपलक कुमार को ही देखे जा रही है।

प्रसन्ना -कुमार क्या आप मेरी सखी की एक इच्छा पूर्ण करेंगें ..

कुमार -इनकी इच्छा पूर्ण करना मेरा परम सौभाग्य होगा। बताइये मुझे क्या करना होगा ?

पद्मावती की निषेध दृष्टि को दरकिनार करते हुए –

प्रसन्ना- आज संध्या आप मेरी सखी से मिलने उपवन में पधार सकें तो आपका बड़ा उपकार होगा।

कुमार- उपकार किसका किस पर होगा यह कहना तो कठिन है , मैं अवश्य ही आऊंगा।

6- वरण

एक निकुंज में राजकुमारी पद्मावती और कुमार मिले और मौन अपलक एक दूसरे को निहारते देख सखी बोली –

” कुमार आप अनेक विद्याओं में पारंगत होंगे लेकिन नयनों की भाषा समझने में आप निपट अनाड़ी हैं शायद।

कुमार- ” आपकी सहेली मौन क्यों है ?”

प्रसन्ना -“ये तो कब से आपसे बातें कर रही है ”

कुमार- अच्छा ! आपकी सखी क्या चाहती हैं ?

प्रसन्ना – वो आपका सत्कार करना चाहती है , अपनी प्राण रक्षा के लिए।

पद्मावती एक  पुष्पहार ले कर खड़ी हुई , कुमार  ने भी अपना मस्तक झुका दिया।

प्रसन्ना -महाराज, यह तो आपको ज्ञात ही होगा की कुआंरी क्षत्रिय कन्या जब किसी पुरुष के गले में माला पहनाती है तो वह वरमाला ही मानी जाती है।

पद्मावती ने पुष्पहार कुमार के गले में पहना दिया और संकोच त्याग कर कहा –

” प्रसन्ना ने ठीक ही कहा है , मैंने आपका वरण किया। मेरे पिताश्री की भी इसमें सहमति है।आशा  है आप को भी स्वीकार होगा ”

कुमार- स्वीकार, सहस्त्र बार स्वीकार। कौन अभागा होगा जो आपके जैसी कन्या रत्न को अपनी जीवन संगिनी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा।

सुजनों। कुमार दधि वाहन और राजकुमारी पद्मावती का विवाह धूम् धाम से संपन्न हुआ। कुमार और उनकी दुल्हन के स्वागत में चंपा नगरी स्वयं दुल्हन की भाँति सज रही थी। महाराज सुयोधन ने भी एक सप्ताह बाद ही युवराज का राज्याभिषेक कर दिया और स्वयं मुनि सुदर्शन से दीक्षा ले कर मुनि धर्म मे स्थित होगये। महाराज चेटक राज तिलक समारोह मे सम्मिलित हुये। लेकिन शतानीक और काकमुख उपस्थित नहीं हुए। यह अनुपस्थिति उनकी ईर्ष्या  का प्रमाण था।

जारी…

दिनांक 18 सितंबर 2026 को आपने पढ़ा

कहानी : जिसके पीछे संसार चला- लेखक : डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित

कहानी : जिसके पीछे संसार चला- लेखक : डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित

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