स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विभाजन के बाद सिंधी समाज के पुनर्वास तक समर्पित रहा जीवन
पुत्र राजेश भेरवानी की कलम से. उदित भास्कर. जोधपुर
सिंधी समाज के सम्मानित समाजसेवी, स्वतंत्रता सेनानी, कांग्रेस कार्यकर्ता और सामुदायिक नेता श्री लोंगमल भेरवानी की 12 सितंबर को जयंती मनाई गई। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता, समाज सेवा, वंचितों के उत्थान और सिंधी समाज के कल्याण के लिए समर्पित किया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने से लेकर विभाजन के बाद विस्थापित सिंधी समाज के पुनर्निर्माण और सशक्तीकरण तक उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।
1912 में सिंध के मीरपुरखास में हुआ जन्म
श्री लोंगमल भेरवानी का जन्म 12 सितंबर 1912 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के सिंध प्रांत के मीरपुरखास में हुआ था। उनके पिता श्री जेठानंदजी थे। उनका जन्म एक संपन्न संगत जागीरदार परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे मेधावी और प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहे। परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध था, लेकिन संपन्नता के साथ उनमें सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हुई। वे जरूरतमंदों और गरीबों की सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उनके व्यक्तित्व में संवेदनशीलता, सेवा-भाव और समाज के प्रति जिम्मेदारी बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। यही गुण आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान बने।
गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय
युवा अवस्था में श्री लोंगमल भेरवानी महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। उन्होंने सिंध में एक युवा गांधीवादी स्वयंसेवक के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़कर सक्रिय भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में उन्होंने केवल सार्वजनिक रूप से ही नहीं, बल्कि आंदोलन की परिस्थितियों के अनुरूप भूमिगत कार्यकर्ता के रूप में भी अपनी भूमिका निभाई। देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के उद्देश्य से चल रहे संघर्ष में उनका योगदान उनके राष्ट्रप्रेम और साहस को दर्शाता है। उनके लिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का विषय नहीं था, बल्कि आम व्यक्ति की गरिमा, अधिकार और बेहतर जीवन से जुड़ा सपना था।
लोंगमल भेरवानी के जीवन की प्रमुख पहचान
- स्वतंत्रता सेनानी
- गांधीवादी विचारों से प्रभावित सामाजिक कार्यकर्ता
- कांग्रेस कार्यकर्ता
- समाज सुधारक
- नगर निकाय के नेता
- सिंधी समाज के सामुदायिक नेता
- विभाजन के बाद विस्थापित सिंधियों के सहयोगी
- गरीब एवं जरूरतमंद लोगों के मददगार
स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहा समाजसेवा का सिलसिला
भारत की स्वतंत्रता के बाद श्री लोंगमल भेरवानी का सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि समाज सेवा के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। उन्होंने स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की जिम्मेदारियां निभाईं और नगर निकाय से जुड़े सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहे। समाज सुधार और जनसेवा उनके कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे। उनका मानना था कि सार्वजनिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों तक सहायता पहुंचाना और लोगों को बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना है। वे अंतिम वर्षों तक सिंधी समाज की सेवा में सक्रिय रहे। उम्र बढ़ने के बावजूद समाज और समुदाय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कम नहीं हुई।
विभाजन के बाद जोधपुर में विस्थापित सिंधियों के लिए बने सहारा
भारत के विभाजन ने सिंधी समाज के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा किया। बड़ी संख्या में सिंधी परिवारों को अपना घर, कारोबार और जन्मभूमि छोड़कर भारत आना पड़ा। ऐसे कठिन दौर में श्री लोंगमल भेरवानी ने विस्थापित सिंधी समाज के बीच रहकर उनकी समस्याओं को समझा और उनके पुनर्वास एवं सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए कार्य किया। विभाजन के बाद जोधपुर में विस्थापित सिंधियों के लिए उनका योगदान उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय रहा। उन्होंने लोगों को केवल तत्काल सहायता पहुंचाने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि समुदाय को नए वातावरण में दोबारा खड़ा करने, सामाजिक रूप से मजबूत बनाने और भविष्य की ओर बढ़ने के लिए भी काम किया। उनकी दृष्टि में विस्थापन केवल घर छूटने की पीड़ा नहीं था। यह एक ऐसे समुदाय के सामने खड़ी चुनौती थी, जिसे नई जमीन पर अपनी सामाजिक और आर्थिक पहचान फिर से स्थापित करनी थी।
सिंधी समाज के लिए उनका संदेश
अपनी जड़ों और संस्कृति को संभालते हुए नए परिवेश में आगे बढ़ना ही समाज की वास्तविक शक्ति है। श्री लोंगमल भेरवानी का सार्वजनिक जीवन इसी भावना से प्रेरित रहा—सेवा, संगठन, सामाजिक एकता और जरूरतमंदों का सहयोग।
समाज सुधारक और सामुदायिक नेतृत्वकर्ता के रूप में पहचान
श्री लोंगमल भेरवानी का व्यक्तित्व केवल एक स्वतंत्रता सेनानी तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज सुधारक और सामुदायिक नेता के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाई। वे सिंधी समाज की समस्याओं को समझते थे और उनके समाधान के लिए सक्रिय प्रयास करते थे। समाज के गरीब और वंचित वर्गों के प्रति उनका विशेष लगाव रहा। संपन्न परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समाज के लिए समर्पित किया। उन्होंने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को केवल व्यक्तिगत दान या सहायता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहकर व्यापक स्तर पर लोगों के लिए काम किया।
21 नवंबर 1993 को हुआ निधन
श्री लोंगमल भेरवानी का निधन 21 नवंबर 1993 को हुआ। उनके निधन के साथ एक ऐसे सार्वजनिक जीवन का अध्याय समाप्त हुआ, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत में समाज निर्माण तक कई महत्वपूर्ण पड़ाव देखे। उन्होंने अपने पीछे त्याग, समाजसेवा, सामुदायिक नेतृत्व और सिंधी समाज के कल्याण की ऐसी विरासत छोड़ी, जिसे आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान केवल उसके पद, संपन्नता या उपलब्धियों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसने अपने समय और सामर्थ्य का कितना हिस्सा समाज और जरूरतमंद लोगों के लिए समर्पित किया।
जयंती पर श्रद्धापूर्वक स्मरण
श्री लोंगमल भेरवानी की जयंती पर उन्हें श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ याद किया गया7 स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रियता, सामाजिक सुधार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और विभाजन के बाद सिंधी समाज के पुनर्निर्माण में उनकी भूमिका आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी है। उनका जीवन संघर्ष, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी का उदाहरण रहा। जब हम उनके जीवन को स्मरण करते हैं, तो यह भी समझने की आवश्यकता है कि समाज का निर्माण केवल सरकारों या संस्थाओं से नहीं होता। समाज को मजबूत बनाने में उन लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के अपना जीवन जनसेवा के लिए समर्पित कर देते हैं। श्री लोंगमल भेरवानी ऐसे ही कर्मशील व्यक्तित्व थे। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, जरूरतमंदों की मदद की, समाज सुधार के लिए कार्य किया और विभाजन की त्रासदी से प्रभावित सिंधी समाज को नए सिरे से खड़ा करने में योगदान दिया। उनकी स्मृति सिंधी समाज और समाजसेवा के क्षेत्र में सदैव सम्मान के साथ जीवित रहेगी।






