उनके मन में महत्वाकांक्षाएं पल रही थी और वे कुछ नया करना चाहते थे। हम बचपन में एक ही गली में बड़े हुए और लक्ष्मीनारायण खत्री आम बच्चों की तरह नहीं थे। वे ना ता गली-गवाड़ में खेलते नजर आते थे और ना ही अपना समय बर्बाद करते। शुरुआत से ही अपने पिता के कार्य में हाथ बंटाते और मौका मिलता तो पढ़ाई करते और अखबारों में लेख और कविताएं आदि लिखते। जैसलमेर में एक लेखक और पत्रकार के रूप में लक्ष्मीनारायण खत्री स्थापित हो चुके थे। लेकिन सफर अभी बाकी था।
दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर
भाई आनंद एम. वासु से खबर मिली कि लक्ष्मीनारायण खत्री नहीं रहे। सहसा विश्वास नहीं हुआ। जैसलमेर अपने रिश्तेदारों के फोन लगाकर कन्फर्म किया। खबर पक्की थी। कुछ समय पहले ही उन्होंने अपनी नई शॉप का पूरे उत्साह और जुनून के साथ उद्घाटन किया था। उस उद्घाटन की तस्वीरों से उनके उत्साह को मैंने भी महसूस किया था। लक्ष्मीनारायण खत्री मेरे पड़ोसी थे। उनके पिता का नाम प्रभुदयाल खत्री था। प्रभुदयाल जी खत्री सीजनल ठेला चलाया करते थे और आर्थिक हालत कोई खास नहीं थी।
मगर चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े लक्ष्मीनारायण खत्री शुरू से होशियार रहे हैं। उन्होंने अपनी एमकॉम तक की पढ़ाई विकट परिस्थितियों में पूरी की। उन्हें सरकारी नौकरियों के मौके मिले, लेकिन वे सरकारी नौकरी के पक्ष में नहीं थे और स्वतंत्रता और वैचारिक आजादी के पक्षधर थे। उनके मन में महत्वाकांक्षाएं पल रही थी और वे कुछ नया करना चाहते थे। हम बचपन में एक ही गली में बड़े हुए और लक्ष्मीनारायण खत्री आम बच्चों की तरह नहीं थे। वे ना ता गली-गवाड़ में खेलते नजर आते थे और ना ही अपना समय बर्बाद करते। शुरुआत से ही अपने पिता के कार्य में हाथ बंटाते और मौका मिलता तो पढ़ाई करते और अखबारों में लेख और कविताएं आदि लिखते। जैसलमेर में एक लेखक और पत्रकार के रूप में लक्ष्मीनारायण खत्री स्थापित हो चुके थे। लेकिन सफर अभी बाकी था।
उन्होंने 90 के दशक में कचहरी रोड पर एक हैंडीक्राफ्ट की शॉप प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत लोन लेकर स्थापित की। यहीं से उनकी किस्मत पलटी। मेहनती तो वे थे ही और बिजनेस के गुर खून में थे। अपनी मेहनत के बल पर कुछ ही समय में वे आगे बढ़ते गए। धीरे-धीरे उन्होंने अपने भाइयों को भी खड़ा किया और सभी भाइयों की अलग-अलग शॉप स्थापित हो गई। शून्य से शुरुआत करके वे जैसलमेर में सफल बिजनेसमैन बन गए। बड़ी बात यह थी कि उनका सृजन कार्य जारी रहा।
उन्होंने अपने प्रयासों से पुरानी वस्तुओं, एंटिक आइटमों, लोक कला की वस्तुओं, संग्रहालय में रखने योग्य वस्तुओं, बहियों, पांडुलिपियों और कलाकृतियों के साथ प्राचीन तस्वीरों आदि का कलेक्शन किया और कई सालों तक अपने घर में ही म्यूजियम स्थापित किया। वे अपने घर पर ही बड़ी-बड़ी हस्तियों को आमंत्रित करते और अपना संग्रहालय का कलेक्शन दिखाते और अपने संग्रहालय के सपने के बारे में बात करते। इधर बिजनेस परवान पर था और धीरे-धीरे उन्होंने अपने संग्रहालय के सपने को मूर्त रूप दिया और जिला प्रशासन के सहयोग से थार हेरिटेज म्यूजियम की स्थापना की। पहले यह संग्रहालय कुछ समय तक रामगढ़ रोड पर पर भी चला। फिर अपनी शॉप के पास में ही स्थापित किया। इस तरह एक ऐसा बचपन जो शुरू से संघर्षपूर्ण पथ पर चला और जैसलमेर में अपने आपको सफल बिजनेसमैन के रूप में स्थापित किया। धीरे-धीरे लक्ष्मीनाराध खत्री के संग्रहालय की सौरभ सात समंदर पार फैलने लगी और कला, साहित्य, संस्कृति और प्रशासन की बड़ी-बड़ी हस्तियां उनके म्यूजियम को देखने को आने लगी। लक्ष्मीनारायण खत्री की उम्र होगी कोई 55 से 57 साल के आस-पास। यह उम्र कोई बड़ी नहीं कही जा सकती। अचानक खबर आती है कि लक्ष्मीनारायण खत्री नहीं रहे। खबर ऐसी थी कि सहसा भरोसा नहीं हुआ। लेकिन ईश्वर की मर्जी को समझना आसान नहीं है। यहां उल्लेखनीय है कि लक्ष्मीनारायण खत्री की कुछ साहित्यिक और सांस्कृतिक विषयों के अलावा पर्यटन आधारित पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है। मैं पिछले 23 साल से जोधपुर में निवासरत हूं और इस कारण लक्ष्मीनारायण खत्री से कभी-कभार ही मुलाकात हो पाती थी। लेकिन जब भी जैसलमेर में उनसे मुलाकात होती बड़ी ही आत्मीय मुलाकात होती और कभी-कभार लक्ष्मीनारायण का फोन और मैसेज भी आ जाता था। लेकिन अब बस यादें शेष है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और परिवार को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। ओम शांति।






