दिव्य हनुमान कथा एवं भरत चरित्र : रामजी को अयोध्या लौटाने के लिए भरतजी का वन गमन प्रसंग का वर्णन

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मार्ग में आने वाली कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद भरत जी का संकल्प अडिग रहा। उनके हृदय में न सत्ता की इच्छा थी और न राजसुख का आकर्षण, उन्हें तो केवल अपने आराध्य और भ्राता श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा थी।

उदित भास्कर . जोधपुर 

कमला नेहरू नगर स्थित भारत समन्वय धाम श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर में ओम भगवत सत्संग परिवार के सान्निध्य में चल रही सात दिवसीय दिव्य श्री हनुमान कथा एवं भरत चरित्र में बुधवार को श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। कथा के तीसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संतवाणी का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ लिया। 14 से 20 सितंबर तक आयोजित यह कथा प्रतिदिन दोपहर 2 से शाम 6 बजे तक हो रही है।

कथा व्यास परम पूज्य रामस्नेही संत श्री अर्जुन राम जी महाराज ने राम नाम की महिमा के साथ भरत जी के उस प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया, जब वे भगवान श्रीराम को वापस अयोध्या लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद भरत जी का संकल्प अडिग रहा। उनके हृदय में न सत्ता की इच्छा थी और न राजसुख का आकर्षण, उन्हें तो केवल अपने आराध्य और भ्राता श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा थी।

महाराज श्री ने कहा कि भरत जी का चरित्र त्याग और निष्काम प्रेम की ऐसी मिसाल है, जिसमें अपने लिए कुछ पाने की अपेक्षा नहीं, बल्कि प्रभु के प्रति समर्पण ही सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर श्रद्धा, विश्वास और प्रभु के प्रति समर्पण हो तो वह हर बाधा को पार कर सकता है। राम नाम मनुष्य के अंतर्मन को संबल देता है और विपरीत समय में धैर्य बनाए रखने की शक्ति प्रदान करता है। महाराज श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने दैनिक जीवन में राम नाम का स्मरण करते हुए सदाचार, सेवा और परोपकार को अपनाएं।

भरत जी के श्रीराम के प्रति प्रेम और समर्पण के प्रसंग के दौरान कथा पंडाल का वातावरण भावमय हो गया। श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए और जय श्रीराम के जयकारों से परिसर गूंज उठा। कथा के दौरान भजनों एवं संगीतमय प्रस्तुतियों ने भी वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। कथा के समापन पर विधिवत संगीतमय आरती हुई। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से आरती में भाग लेकर भगवान श्रीराम एवं श्री हनुमान जी का स्मरण किया। विशेष रूप से, गुरुवार को कथा के उपरांत शाम 6:00 बजे श्री सुंदरकांड पाठ का आयोजन रखा गया है, जिसमें सभी श्रद्धालुओं को भाग लेने का आमंत्रण दिया गया है।

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