तसनीम खान का कहानी-संग्रह ‘बवालिस्तान’ : समकालीन समाज का आईना

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राजनीति, मीडिया, सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते कहानी-संग्रह पर संभावना के बैनर तले डॉ. मदन सावित्री डागा साहित्य भवन में पुस्तक संवाद कार्यक्रम 17 अक्टूबर को शाम 4:30 बजे

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

9783414079 uditbhaskarnews@gmail.com 

महिलाओं की संस्था संभावना के बैनर तले तसनीम खान के कहानी संग्रह बवालिस्तान पर पुस्तक संवाद कार्यक्रम 17 अक्टूबर को डॉ. मदन सावित्री डागा भवन में शाम 4:30 बजे आयोजित होगा। कार्यक्रम वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पद्मजा शर्मा के सान्निध्य में होगा। इस मौके पर तसनीम खान खुद जयपुर से मौजूद रहेंगी। जयपुर की लेखिका एवं पत्रकार उमा और अजमेर की कथाकार विनीता बाड़मेरा संवादकर्ता की भूमिका में रहेंगे।

कहानी-साहित्य समाज को समझने और उसके भीतर चल रहे अंतर्विरोधों को उजागर करने का सशक्त माध्यम है। ‘बवालिस्तान’ कहानी-संग्रह इसी दृष्टि से ध्यान आकर्षित करता है। इसकी कहानियों के शीर्षक और उपलब्ध अंश समकालीन जीवन की जटिलताओं, सामाजिक विभाजन, पारिवारिक संबंधों, आर्थिक असमानता तथा मानवीय संवेदनाओं की ओर संकेत करते हैं। संग्रह में कुल 15 कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें विविध विषयों और परिस्थितियों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास दिखाई देता है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बवालिस्तान’ मीडिया और राजनीति के संबंधों पर व्यंग्यात्मक दृष्टि डालती है। टेलीविजन स्टूडियो, राजनीतिक चेहरे और समाचार चैनलों की बेचैनी के माध्यम से यह कहानी उस व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जिसमें समाचारों की दिशा और महत्त्व कई बार जनहित के बजाय चर्चित राजनीतिक व्यक्तित्वों तथा टीआरपी से प्रभावित होते हैं। इस विषय की प्रासंगिकता आज के मीडिया परिवेश में विशेष रूप से महसूस की जा सकती है।

‘पैरों में फिर पीड़ उठी है’ जैसी कहानी घर, जमीन, स्मृतियों और बदलते सामाजिक संबंधों के सवाल सामने लाती प्रतीत होती है। वहीं ‘भाईसाब’ में पारिवारिक निर्णयों, सम्मान और रिश्तों के भीतर मौजूद अधिकार-बोध को समझने की संभावनाएँ दिखाई देती हैं। ‘नफा-नुकसान’ महामारी के दौरान आर्थिक संकट और श्रमिकों की असुरक्षा जैसे विषयों से जुड़ती है। व्यापारिक नुकसान के बीच मजदूरों की आजीविका का प्रश्न कहानी को सामाजिक और आर्थिक यथार्थ से जोड़ता है।

संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामाजिक विभाजन के बीच मानवीय संवेदना की संभावना है। त्योहार, परिवार और समुदाय से जुड़े प्रसंग यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि सामाजिक दूरियाँ मनुष्यों के बीच करुणा और अपनत्व को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकतीं। ‘अब्दुल की मौत’ जैसे शीर्षक भी पाठक को धार्मिक पहचान, मृत्यु और सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़े प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। संग्रह की विषय-विविधता इसकी उल्लेखनीय विशेषता है। हालांकि, किसी भी कहानी-संग्रह का प्रभाव केवल विषयों की गंभीरता से नहीं, बल्कि कथानक की कसावट, पात्रों की विश्वसनीयता, भाषा और अंत की प्रभावशीलता से भी निर्धारित होता है। उपलब्ध अंशों के आधार पर इन सभी पक्षों पर अंतिम निर्णय देना उचित नहीं होगा। निष्कर्षतः, ‘बवालिस्तान’ समकालीन समाज की विसंगतियों और मानवीय संबंधों पर विचार करने का अवसर देने वाला कहानी-संग्रह प्रतीत होता है। इसकी कहानियाँ पाठक को केवल घटनाओं से परिचित कराने के बजाय उनके पीछे मौजूद सामाजिक परिस्थितियों पर सोचने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।

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