आजादी के 79 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन इन वर्षों में महिलाओं में साक्षरता की दर में भले वृद्धि हो गई हो, उन्हें आर्थिक स्वावलम्बन भी प्राप्त हो गया हो. किन्तु समाज आज भी उन्हं दोयम दर्जे की नजर से देखता है।
शोध आलेख : प्रो. डॉ. मुमताज सैयद,
मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी, बुझावड़, जोधपुर
प्रस्तुत शोध अध्ययन बालिकाओं और महिलाओं के लिए संचालित की जा रही सरकारी योजनाओं का सशक्तिकरण की दिशा में योगदान के अध्ययन से संबंधित है। किसी शोध कार्य का उद्देश्य महिलाओं के लिए संचालित की जा रही सरकारी योजनाओं के द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की दिशा में सरकारी योजनाओं का अपना एक योगदान रहा है। प्रस्तुत अध्ययन राजस्थान के जोधपुर जिले में किया गया है। अध्ययन के लिये द्रितीयक ऑकड़ों का प्रयोग किया गया है। प्राप्त परिणामों में प्रदर्शित हुआ महिलाओं के लिए संचालित की जा रही सरकारी योजनाओं का सशक्तिकरण की दिशा योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज में रहता है और समाज में रहकर ही अपने परिवार और अपने समाज का सर्वांगीण विकास करता है। यह सभी शिक्षा के द्वारा ही संभव हो पाता है। शिक्षा का इतिहास सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति का स्रोत होता है। ऐतिहासिक रूप से प्राचीन काल से वर्तमान समय तक देखा जाए तो शिक्षा ने समस्त मानव समाज का पाठ इस प्रकार प्रशस्त किया है कि उसकी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रोशनी नजर आती है ।
इस प्रकार शिक्षा की प्रक्रिया आदिकाल से जब से समय-समय पर अलग-अलग सभ्यताएं आई इस समय से यह प्रक्रिया शुरू है और जुड़ी हुई है तथा मानव जीवन की सहायता शिक्षा के द्वारा ही संभव हुई है। जैसे-जैसे समाज में शिक्षा की आवश्यकता में वृद्धि होती गई, वैसे-वैसे शिक्षा का औपचारिक रूप सामने आया और समाज के लोगों ने विद्यालयों और स्कूलों की व्यवस्था की विद्यालयों के रूप में समझ में इस तरह से स्थापित हो गए जो कि समाज की ही एक संस्था कहलाती है जिसको हम शिक्षा का मंदिर कहते हैं। यही से व्यक्ति का चहुंमुखी विकास संभव होता है।
शिक्षा मानव चेतना के लिए न केवल स्वयं में एक प्रकाश है बल्कि यह प्रकृति की अन्य वस्तुओं को देखने और उन्हें सही दिशा में व्यवस्थित करने के लिए उपयुक्त मानवीय साधन भी होता है इसके द्वारा मानव का संपूर्ण विकास होता है जिसके अंतर्गत सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक राजनीतिक मनोवैज्ञानिक बौद्धिक इत्यादि विकास होता है अर्थात शिक्षा मानव विकास एवं सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक होता है । वैसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति और हर वर्ग के लिए शिक्षा जरूरी होती है लेकिन महिलाओं के लिए इसका महत्व कुछ अधिक ही होता है शिक्षा एक ऐसा सशक्त उपकरण है जो नए समाज की व्यवस्था का सृजन करने के लिए महिलाओं को सक्षम बनाता है। किसी भी देश का वास्तव में विकास तभी संभव होता है जब वहां की संपूर्ण आबादी में महिलाओं का भी योगदान होता हो। देश में दहेज प्रथा, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति जैसी कुरीतियों के पीछे शिक्षा की कमी भी कारण है। अगर शिक्षा संपूर्ण महिलाओं तक पहुंच जाए तो बुराइयां दूर हो सकती है। बालिका शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बालिका शिक्षित होगी तो वह अपने स्वास्थ्य का बेहतर तरीके से ध्यान रख सकेंगी। जब महिला स्वस्थ रहेगी तो पूरा परिवार और विशेष कर बच्चे भी स्वस्थ होंगे। खाने का मतलब यह है कि महिला शिक्षा पर अधिक से अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार के अंदर शिक्षित महिला होनी चाहिए। शिक्षा को लेकर सरकार के द्वारा नई-नई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है । इन योजनाओं के माध्यम से महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह योजनाएं महिला शिक्षा को बढ़ाने के लिए और उनको आत्मनिर्भर बनाने के लिए और महिला सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही है, जिससे कि महिला आत्मनिर्भर बने। अपने फैसले खुद ले। स्वयं निर्णय ले और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सके तो इस तरह से समय-समय पर भारत सरकार के अंतर्गत केंद्र सरकार है और राज्य सरकार मिशन मुहिम चलाकर इन योजनाओं का क्रियान्वयन और कार्यान्वयन कर रही है। यह योजनाएं गांव और शहरों सभी महिलाओं के उत्थान की बात करती है।
संबंधित साहित्य का अध्ययन
डॉ. शीतल शर्मा (2022) ने भारत में महिला सशक्तिकरण एवं योजनाएं : एक अध्ययन विषय पर शोध कार्य किया। उन्होने अपने अध्ययन के सारांश में लिखा है, कि यह शोध भारत में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता का विश्लेषण करने का प्रयास करता है और महिला सशक्तिकरण के तरीकों और योजनाओं पर प्रकाश डालता है। सशक्तिकरण सामाजिक विकास की मुख्य प्रक्रिया है. जो महिलाओं को ग्रामीण समुदायों के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सतत विकास में भाग लेने में सक्षम बनाती है। आज महिलाओं का सशक्तिकरण 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण चिताओं में से एक बन गया है, लेकिन व्यावहारिक रूप से महिला सशक्तिकरण अभी भी वास्तविकता का एक भ्रम है। महिलाओं का सशक्तिकरण अनिवार्य रूप से समाज में पारंपरिक रूप से वंचित महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के उत्थान की प्रक्रिया है। हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि कैसे महिलाएं विभिन्न सामाजिक बुराइयों का शिकार बनती है। महिला सशक्तिकरण संसाधनों के लिए महिलाओं की क्षमता का विस्तार करने और रणनीतिक जीवन विकल्प बनाने का महत्वपूर्ण साधन है। यह उन्हें सभी प्रकार की हिंसा से बचाने की प्रक्रिया है। यह अध्ययन विशुद्ध रूप से द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है। भारत की महिलाएं अपेक्षाकृत अशक्त है और सरकार द्वारा किए गए कई प्रयासों के बावजूद वे पुरुषों की तुलना में कुछ कम स्थिति का आनंद लेती है। यह पाया गया है कि महिलाओं द्वारा असमान लैंगिक मानदंडों की स्वीकृति अभी भी समाज में प्रचलित है। अध्ययन का निष्कर्ष इस अवलोकन से निकला है कि बुनियादी सुविधाए प्रदान करना और विभिन्न योजनाओं को लागू करना महिला सशक्तिकरण के लिए सक्षम कारक है।
डॉ. रमेश प्रसाद द्विवेदी (2022) ने भारत में महिला सशक्तिकरण हेतु प्रयास विषय पर शोध पत्र लिखा। उन्होने अपने शोध पत्र के सारांश में लिखा है, कि महिला सशक्तिकरण व विकास की स्थिति पर विवेचन से पूर्व हमारे मस्तिष्क में विविध प्रकार के प्रश्न उत्पन्न होते हैं जैसे भारत में महिला सशक्तिरण विकास की स्थिति के अध्ययन की क्या आवष्यकता है। भारतीय महिलाओं की स्थिति के सम्बन्ध में प्रचलित भान्त धारणाएँ क्या है? क्या धारणाएँ भान्त हैं या इनकी अपनी सत्यता भी है? यदि भारतीय समाज में प्रचलित धारणाएँ गलत है, तो समाज में उनकी वास्तविक स्थिति क्या है। इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए हमें भारतीय इतिहास का अध्ययन करना होगा. इसी के माध्यम से भारतवर्ष में महिलाओं की स्थिति का इस मूल्यांकन किया जा सकेगा। आजादी के 79 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन इन वर्षों में महिलाओं में साक्षरता की दर में भले वृद्धि हो गई हो, उन्हें आर्थिक स्वावलम्बन भी प्राप्त हो गया हो. किन्तु समाज आज भी उन्हं दोयम दर्जे की नजर से देखता है।
संदीप चौरसिया और डॉ. शाहेवा सिद्दीकी (2021) ने नगरीय महिला सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका का एक अध्ययन (रीवा नगर के विशेष सन्दर्भ में) विषय पर शोध कार्य किया। उन्होने अपने शोध अध्ययन में पाया कि समाज के विकास के लिए नगरीय महिलाओं के सशक्तिकरण से प्रभावी तरीका कुछ नहीं हैं। दुनिया की 50 प्रतिशत आबादी नगरीय महिलाओ की है। ‘महिला सशक्तिकरण की आठवें सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों में प्रमुखत से शामिल किया गया है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि जब तक महिलाओ की स्थिति नहीं सुधरती तब तक विश्व कल्याण की महिलाओ की कोई सभावना नहीं है। पक्षी के लिए एक ही पंख से उड़ना संभव नहीं है।” महिला विकास एवं आर्थिक सुधार द्वारा ही समाज सशक्त हो सकता है। स्वय प्रधानमंत्री ने भी कहा कि “एक राष्ट्र हमेशा ही अपने यहाँ की महिलाओं से सशक्त बनता है। वह मी, बहन और पत्नी की भूमिकाओं में अपने नागरिकों का पालन-पोषण करती है और तब जाकर ये सशक्त राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका निभाते है। इस शोध शोध पत्र को तैयार करने में अध्ययन क्षेत्र के रूप में रीवा नगर को चुना गया है। 50 उत्तरदाताओं का चयन सविचार निदर्शन के माध्यम से करके साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से तथ्य एकत्र किये गये है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि महिला सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका अति महत्वपूर्ण है।
समस्या कथन
महिलाओं के लिए संचालित की जा रही सरकारी योजनाओं का सशक्तिकरण की दिशा योगदान का अध्ययन।
अध्ययन के उद्देश्य
महिलाओं के लिए संचालित की जा रही भारत सरकार के द्वारा सरकारी योजनाओं का सशक्तिकरण की दिशा योगदान में महिलाओं की भूमिका योगदान का योगदान का अध्ययन किया जा रहा है।
1.महिलाओं के लिए संचालित की जा रही सरकारी योजनाओं का अध्ययन।
2.महिलाओं के लिए सरकारी योजनाओं के द्वारा महिला सशक्तिकरण की दिशा का अध्ययन।
3.महिलाओं के लिए संचालित की जा रही दिशा योजनाओं का अध्ययन।
शोध विधि एवं प्रक्रिया
प्रस्तुत शोध अध्ययन में वर्णनात्मक सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है। जोधपुर जिले की ग्रामीण महिलाएं और शहरी महिलाओं को अध्ययन की जनसंख्या माना गया है। यह पेपर मूल रूप से वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक प्रकृति का है। इस पत्र में भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। इसमे उपयोग किया गया डेटा इस अध्ययन की आवश्यकता के अनुसार विशुद्ध रूप से द्वितीयक स्रोतों से लिया गया है। भारत में महिलाओं की वर्तमान स्थिति, अपने पुरुष समकक्षो के बराबर होना अभी भी भारतीय महिलाओं के लिए बहुत दूर की कौड़ी है। न केवल वे हाशिए पर है क्योंकि सार्वजनिक हस्तियां औसत भारतीय महिलाएं शायद ही घर या बाहर निर्णय ले सकती है। पिछली जनगणना 2011 में भारत का लिगानुपात 940 है और पुरुषों की 80 प्रतिशत की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है। भारत में साक्षरता दर और लिगानुपात हमेशा चिंता का विषय रहा है. क्योंकि दोनों ही मामलो में हमारी महिलाओं की जनसंख्या पुरुष जनसंख्या के सबंध में दौड़ में पीछे है।
महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता के फायदे
भारत में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति को महिलाओं को सशक्त बनाने के मुद्दे पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 66 प्रतिशत महिला आबादी अप्रयुक्त है। यह मुख्य रूप से मौजूदा सामाजिक रीति-रिवाजों के कारण है। कृषि और पशु देखभाल में महिलाएं कुल कार्यबल का 90 प्रतिशत योगदान करती हैं। महिलाएं लगभग आधी आबादी का गठन करती है, अपने कुल समय के लगभग 2/3 घंटे काम करती हैं, दुनिया की आय का 1/10वां हिस्सा प्राप्त करती है और दुनिया की संपत्ति के 1/100वें हिस्से से कम की मालिक है। भारतीय संस्कृति के अतीत के “वेद पुराण” में, महिलाओं की पूजा लक्ष्मी माँ, धन की देवी के रूप में की जाती है, सरस्वती माँ, ज्ञान के लिए, सत्ता के लिए दुर्गा माँ की पूजा होती है। दुनिया के 900 मिलियन निरक्षर लोगों में से 70 प्रतिशत गरीबी में रहने वाली महिलाएं हैं। कम लिंग अनुपात यानी 933, विश्व संसद में केवल 10 प्रतिशत सीटें और I राष्ट्रीय मंत्रिमंडल में 6 प्रतिशत सीटें महिलाओं के पास है। मौजूदा अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत कम स्वस्थ है, हालांकि वे एक ही वर्ग से संबंधित है। वे विकासशील देशों में प्रशासकों और प्रबंधकों के पदों पर 1/7 से भी कम है। कम उम्र की लडकियों को परिवार में एक बड़ा बोझ माना जाता है। आधुनिक समय में बलात्कार के मामले बढ़ रहे है जो हमें महिला आबादी की सुरक्षा के बारे में पहल करने के लिए मजबूर करते हैं।
महिलाओं के सशक्तीकरण के तरीकेः
1-हर क्षेत्र में शिक्षा प्रदान करना।
2-निर्णय लेने पर महिलाओं का नियंत्रण शामिल करना।
3-उनकी शिकायतों के लिए महिला पुलिस स्टेशन उपलब्ध कराना।
4-महिलाओं की गतिशीलता और सामाजिक संपर्क में बदलाव किया है।
5-उनकी जाच के लिए अलग अस्पताल उपलब्ध कराना।
6-महिलाओं के श्रम पैटर्न में बदलाव किया है।
7-उनकी सुरक्षा के लिए अलग स्कूल/कॉलेज प्रदान करवायें है।
8-समान अधिकार प्रदान करना।
9-अलग परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
10-संसाधनों तक महिलाओं की पहुंच और नियत्रण में बदलाव किया है।
11-स्वरोजगार और स्वय सहायता समूह है।
12-समान संपति अधिकार प्रदान करना है।
13-खेल और अन्य गतिविधियों में समान अवसर प्रदान करना है।
14-पोषण, स्वास्थ्य स्वच्छता और आवास जैसी न्यूनतम आवश्यकताओं को प्रदान करना है।
15-समान संपत्ति अधिकार प्रदान करना है।
16-पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और आवास जैसी न्यूनतम आवश्यकताओं को प्रदान करना है।
17-खेल और अन्य गतिविधियों में समान अवसर प्रदान करना है।
18-इसके अलावा समाज को महिला शब्द के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए।
महिला सशक्तिकरण के लिए सरकारी योजनाएं:
भारत सरकार ने विभिन्न गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को लागू किया। इन कार्यक्रमों में महिला सशक्तिकरण के लिए विशेष घटक है। वर्तमान में, भारत सरकार के पास विभिन्न विभागों और मंत्रालयों द्वारा संचालित महिलाओं के लिए 37 से अधिक योजनाएं है। इन कार्यक्रमों/योजनाओं के कार्यान्वयन की विशेष रूप से महिलाओं की कवरेज के संदर्भ में निगरानी की जाती है। इनमें से कुछ इस प्रकार है-
1 महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा)।
2. लगभग 9000 गाँवों में महिला समाख्या क्रियान्वित की जा रही है।
3. (आजीविका) और इंदिरा आवास योजना (IAY)
4. जेंडर बजटिंग योजना (ग्यारहवी पचवर्षीय योजना)।
5-महिला उद्यम निधि महिला विकास निधि।
6 एनजीओ की क्रेडिट योजनाए।
7 कामकाजी और बीमार मा के बच्चों के लिए क्रैच डे केयर सेंटर।
8 राष्ट्रीय महिला अधिकारिता मिशन।
9 राष्ट्रीय महिला कोष (आर एम.के.) 1992-19931
10 किशोर लडकियों के सशक्तिकरण के लिए राजीव गाधी योजना (आर.जी.एस.ई.ए.जी.) (2010)।
11. महिलाओं के लिए प्रशिक्षण और रोजगार कार्यक्रम (STEP) के लिए सहायता।
12. एकीकृत बाल संरक्षण योजना (आई.सी.पी. एस.) (2009-2010)1
13. स्वाधार योजना है।
14 स्वयंसिद्धा योजना है
15. कृषि और ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए राष्ट्रीय बैंक।
16. खादी और ग्रामोद्योग आयोग।
17. कामकाजी महिलाओ के लिए छात्रावास।
18. उज्जवला (2007) योजना है।
19. कामकाजी महिला मंच सम्मेलन।
20. महिला समृद्धि योजना (MSY) अक्टूबर, 1993|
21. एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (आई आर डी पी.)।
22. स्वं शक्ति समूह।
23. कामकाजी माताओं के बच्चों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय क्रेच योजना।
24. महिला विकास निगम योजना (डब्ल्यू डी.सी.एस.)।
25 इंदिरा महिला योजना (आई.एम. वाई)।
26 स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण (TRYSEM)।
27- इंदिरा प्रियदर्शनी योजना.
28. प्रधानमंत्री रोजगार योजना (पी.एम.आर.वाई.)।
29. बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना।
महिला सशक्तिकरण की आवश्यकताः
भारत सरकार ने भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई पहल की है। लेकिन समाज के हर स्तर पर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें हाशिए पर रखा जाता है. चाहे वह सामाजिक भागीदारी हो. राजनीतिक भागीदारी हो, आर्थिक भागीदारी हो, शिक्षा तक पहुंच हो. और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल भी हो। पूरे भारत में महिलाओं को आर्थिक रूप से बहुत गरीब पाया जाता है। कुछ महिलाए सेवाओं और अन्य गतिविधियों में लगी हुई है। इसलिए, उन्हें पुरुषों के साथ-साथ खड़े होने के लिए समान आर्थिक शक्ति की आवश्यकता है। बलात्कार लड़की के अपहरण, दहेज प्रताडना आदि के न जाने कितने मामले है। इन कारणों से, उन्हें अपनी सुरक्षा और अपनी पवित्रता और गरिमा को सुरक्षित रखने के लिए सभी प्रकार के सशक्तिकरण की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, यह देखा गया है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम साक्षर पाई जाती है। इस प्रकार, महिलाओं के बीच बढ़ती शिक्षा उन्हें सशक्त बनाने में बहुत महत्वपूर्ण है। ग्रामीण भारत में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा शारीरिक रूप से इतना कमजोर है कि वे अपने द्वारा खाए जाने वाले भोजन से अधिक काम करती है। इस भेदभाव को समाज के कमजोर वर्ग के सशक्तिकरण को संबोधित करने की जरूरत है ताकि उन्हे शक्तिशाली और सम्मानित बनाया जा सके। एक और समस्या कार्यस्थलपर महिलाओं का उत्पीडन है। संक्षेप में, महिला सशक्तिकरण तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक महिलाए साथ नहीं आती और स्वयं को सशक्त बनाने में मदद नहीं करती। नारीकृत गरीबी को कम करने, महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने, महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रोकथाम और उन्मूलन और देश की महिला आबादी को सशक्त बनाने के लिए बुनियादी संपत्ति बनाने की आवश्यकता है।
अध्ययन से हमने निष्कर्ष निकाला है कि वर्तमान परिदृश्य में भारतीय महिलाओं की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है जितनी होनी चाहिए और ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है जो महिलाओं की आबादी के अधिकारों और बुनियादी जरूरतों को समायोजित करने में मदद करें। इस प्रकार, आय, रोजगार और शैक्षिक मोर्चे पर उपलब्धि के क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण का परिदृश्य तुलनात्मक रूप से खराब प्रतीत होता है और इसकी जाँच करने की आवश्यकता है। क्योंकि महिलाओं के सशक्तिकरण से लैंगिक भेदभाव के उन्मूलन और पुरुषों और महिलाओं के बीच शक्ति संतुलन का निर्माण न केवल महिलाओं के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि पूरे समाज को राजनीतिक, आर्थिक और सास्कृक्तिक रूप से लाभान्वित करेगा। महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जब महिलाए आगे बढ़ती है तो परिवार आगे बढ़ता है, गांव कुयुगे बढ़ता है और देश आगे बढ़ता है। सशक्तिकरण आवश्यक है, क्योंकि उनके विचार और उनकी मूल्य प्रणालिया एक अच्छे परिवार, अच्छे समाज और अंततः एक अच्छे राष्ट्र के विकास का नेतृत्व करती है। महिला सशक्तिकरण न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण चिताओं में से एक बन गया है। समाज को समाज के उत्थान और समग्र रूप से समाज की भलाई के लिए दोनों लिंगों को समान अवसर प्रदान करना चाहिए। महिलाए दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं और हर देश में लैंगिक असमानता मौजूद है। जब तक महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर नहीं दिए जाते, तब तक पूरे समाज को उनकी वास्तविक क्षमता से कम प्रदर्शन करने के लिए नियत किया जाएगा। सशक्तिकरण का सबसे अच्छा तरीका महिलाओं को विकास की मुख्य धारा में शामिल करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अकेले सरकार की पहल पर्याप्त नहीं होगी क्योंकि सशक्तिकरण तभी वास्तविक और प्रभावी होगा जब वे आय और संपत्ति से संपन्न होगी. ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सके और समाज में अपनी पहचान बना सकें। समाज को एक ऐसा माहौल बनाने की पहल करनी चाहिए जिसमें सरकार द्वारा महिला विकास के लिए बनाई गई योजनाओं से उन्हें उचित लाभ मिल सके। कोई लैगिक भेदभाव नहीं होना चाहिए और महिलाओं को समानता की भावना के साथ देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में स्वय निर्णय लेने और भाग लेने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।







