दरअसल विदेशी ताकतों की शह पर देश में एक नया षड़यंड रचा जा रहा है और उसके मायने केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाना और देश को अस्थिर करना है। ऐसे ही दुष्चक्र पाकिस्तान, बांग्लादेश और दुनिया के कई देशों में हो चुके हैं। हालत यह है कि दिल्ली दो-तीन दिन से ठप है। जंतर-मंतर जैसे कबड्डी का मैदान बना दिया है। क्या लोकतंत्र की रचना इसीलिए की थी, कि कानून हाथ में लेकर किसी भी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया जाए।
अगर आपको आंदोलन करना है तो अपने-अपने घरों की छतों पर बैठकर थाली-कटौरी बजाते हुए भी तो प्रोटेस्ट किया जा सकता है।जरूरी तो नहीं कि आप बच्चों, किशोरों, युवाओं की भावनाओं का भड़काकर देश की राजधानी में कर्फ्यू जैसे हालात कर दो। मेट्रो बंद हो जाए, ट्रेनें बंद हो जाए, रास्ते बंद हो जाए, जगह-जगह बैरिकेड लग जाए, इलाके छावनियों में तब्दिल हो जाए…क्या ऐसा जरूरी है? जब हजारों की भीड़ आएगी और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की आशंका हो तो सरकार कोई आमंत्रण पत्र तो बांटेगी नहीं कि आओ और ऐसा करते जाओ।
कॉकरोच जनता पार्टी के 50 हजार कार्यकर्ता अपने घर के बाहर ही दरी बिछाकर 20 दिन अन्न-जल त्यागकर उपवास कर लो। अगर सरकार को झुकाना है तो ऐसा भी तो कर सकते हैं। जरूरी तो नहीं कि आप जंतर-मंतर और दिल्ली ठप कर दो।
दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
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जिस कांग्रेस ने देश पर करीब 54 साल राज किया, उसे लंबे समय से सत्ता नहीं मिल रही है तो पेट में मरोड़े उठ रहे हैं…प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में सार्वजनिक जीवन में अपने 25 साल पूरे किए हैं और विपक्ष की आंखों में वो किरकिरी बने हुए हैं…मगर बात इतने तक ही सीमित नहीं है, विदेशी ताकतों की शह पर देश में एक नया दुष्चक्र चल रहा है और वोट चोरी के आरोप लगाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर को कबड्डी का मैदान बना दिया गया है…दरअसल विदेशी ताकतों की शह पर देश में एक नया षड़यंड रचा जा रहा है और उसके मायने केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाना और देश को अस्थिर करना है। ऐसे ही दुष्चक्र पाकिस्तान, बांग्लादेश और दुनिया के कई देशों में हो चुके हैं। हालत यह है कि दिल्ली दो-तीन दिन से ठप है। जंतर-मंतर जैसे कबड्डी का मैदान बना दिया है। क्या लोकतंत्र की रचना इसीलिए की थी, कि कानून हाथ में लेकर किसी भी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया जाए।
पिछले दिनों कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लिया गया। यह तो अब परिपाटी बन पड़ी है। देश में जिस किसी का इस्तीफा लेना हो तो जंतर-मंतर पहुंच जाओ और उग्र आंदोलन के नाम पर सरकार को झुका दो। सुप्रीट कोर्ट को चाहिए कि जंतर मंतर पर ऐसे आंदोलनों को बढ़ावा नहीं दे, नहीं तो देश चलाना मुश्किल हो जाएगा। हर कोई आए दिन जंतर-मंतर पहुंच जाएंगे और आंदोलन के नाम पर रोज सरकार के सामने और देश के सामने अराजग माहौल खड़ा कर देंगे। सवाल यह है कि जिस कांग्रेस पार्टी ने करीब 54 साल देश पर राज किया और उनके शासन में बैलट पेपर लूट कर, बूथ कैप्चरिंग कर और तानाशाही से चुनाव जीते जाते रहे, क्या उस लोकतंत्र में नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए यह षड़यंत्र होते देश की जनता को चुप रहना चाहिए।
कुछ देर पहले कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका का एक वीडियो जारी हुआ है। रांका ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक प्रोटेस्ट जंतर-मंतर पर ही होगा। आज 10 लोग आए हैं, कल 1000 आएंगे, परसों 10,000 आएंगे…। यह सरकार को ही नहीं देश की 140 करोड़ जनता को खुली चेतावनी है। अगर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में 10,000 लोग आ सकते हैं तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता सौंपने वाली 140 करोड़ जनता की भावना अगर उबाल भर गई तो कॉकरोच जनता पार्टी के लिए अपना बचाव करना मुश्किल हो जाएगा। अभी तक तो सरकार केवल पुलिस और सुरक्षा एजेंसी की मदद ले रही है। गनीमत यह है कि यहां विचारधाराओं की टकराहट नहीं हो रही है। कहीं ऐसा नहीं हो जाए कि विचारधाराओं की टकराहट हो जाए और देश में अराजग माहौल नहीं हो जाए और देश को अस्थिर करने की मंशा रखने वाली ताकतें अपने उद्देश्य में सफल हो जाए। अभी भी वक्त है देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे आंदोलनों को सख्ती से कुचल देना चाहिए। लोकतंत्र का मतलब यह नहीं है कि आप जब जाओ प्रोटेस्ट के नाम पर जिसका चाहो इस्तीफा लेने का हठ करते हुए सड़कों पर उतर जाओ। अगर सड़कों पर ही सब फैसला करना है तो सरकार को भी गोली से फैसला करने से क्यों सुप्रीम कोर्ट रोक रहा है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि आंदोलनकारियों पर दया दिखाने की बजाय ऐसे प्रोटेस्ट को अवैध घोषित किया जाए।
अपने-अपने घरों की छतों पर थाली-कटौरी बजाते हुए भी तो प्रोटेस्ट हो सकता है…
माननीय सुप्रीम कोर्ट…! लोकतंत्र में विरोध के तरीके पर फिर से विचार करने की जरूरत :
अब जरूरत इस बात कि है कि आए दिन दिल्ली को ठप करना, बिहार को ठप करना, उत्तर प्रदेश को ठप करना या राजस्थान को ठप करना…यही नहीं कहीं भी कोई आंदोलन करके सरकार को झुकाने का षड़यंत्र रचना कहां तक उचित है। अगर आपको आंदोलन करना है तो अपने-अपने घरों की छतों पर बैठकर थाली-कटौरी बजाते हुए भी तो प्रोटेस्ट किया जा सकता है।जरूरी तो नहीं कि आप बच्चों, किशोरों, युवाओं की भावनाओं का भड़काकर देश की राजधानी में कर्फ्यू जैसे हालात कर दो। मेट्रो बंद हो जाए, ट्रेनें बंद हो जाए, रास्ते बंद हो जाए, जगह-जगह बैरिकेड लग जाए, इलाके छावनियों में तब्दिल हो जाए…क्या ऐसा जरूरी है? जब हजारों की भीड़ आएगी और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की आशंका हो तो सरकार कोई आमंत्रण पत्र तो बांटेगी नहीं कि आओ और ऐसा करते जाओ। निसंदेह सरकार सख्ती बरतेगी। तब सरकार के सामने एक ही रास्ता होगा कि दिल्ली को छावनी में बदल दिया जाए। हाल ही के कुछ वर्षों में आंदोलन के तरीके बदल गए हैं। देश की सुप्रीम कोर्ट को जो करना होता है उसकी ओर अभी तक प्रमुख रूप से ध्यान नहीं दे रही है। हमारा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह है कि अब इस बात पर विचार करे कि लोकतंत्र को बचाना है तो क्या देश में आंदोलन का तरीका भी नहीं बदलना चाहिए? क्या जरूरी है कि बसों पर पथराव हो, टायर जलाए जाए, पुलिस के कपड़े फाड़े जाए, ट्रेनों से यात्रियों को उतारे जाए और जगह-जगह आगजनी की जाए। हाल ही के कुछ समय में आंदोलन के नाम पर ऐसा ही नंगा नाच होता जा रहा है। क्या सुप्रीम कोर्ट ने अराजग हो रहे लोकतंत्र की ओर ध्यान दिया है।
विदेशी ताकतों के दुष्चक्र से देश को बचाना जरूरी…
देश ने वो स्थिति भी देखी है जब अटल बिहारी वाजपेयी संसद में एक तरफ बैठे लाचार थे और भाजपा को सत्ता से रोकने के लिए कांग्रेस सहित सारा विपक्ष एकजुट हो गया और किसी ने भाजपा को समर्थन नहीं दिया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिन में ही गिर गई। हमने अटल बिहारी वाजपेयी का वो ऐतिहासिक भाषण सुना था। कांग्रेस और विपक्ष के साथ फिर से यही हो रहा है। इतने सालों से सत्ता से बाहर रहने की वजह से उनका हाजमा खराब हो गया है। यही नहीं कांग्रेस सहित विपक्ष कुंठित हो गया है। यही बात है कि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को कमजोर करने के लिए विदेशी ताकतों की शह पर देश में दुष्चक्र चल रहा है। हम जब ये पंक्तियां लिख रहे हैं तो पाठकों का सवाल होगा कि हम किस आधार पर यह बात कह रहे हैं। तो जनाब कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म एक एक्सीडेंटल घटना के बाद हुआ और सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर यह आगे बढ़ा और जब फॉलोवर बढ़े तो कुछ ताकतों ने फंडिंग कर और शह देकर इन्हें पॉलिटिक्स में उतार दिया। पर्दे के पीछे की ताकतों को समझना जरूरी है। यह वही ताकतें हैं जो सत्ता से बाहर है। मगर इन ताकतों को विदेशी ताकतें भी फंडिंग कर रही हैं।
मोदी जी 140 करोड़ जनता आपके साथ है घबराने की जरूरत नहीं…
ऐसे आंदोलनों से घबराने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी देश की 140 करोड़ जनता आपके साथ है। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा भी देने की जरूरत नहीं है। उन्हें अपना पूरा कार्यकाल पूरा करने दो। अगर यही परिपाटी शुरू हो गई तो आए दिन जंतर-मंतर ठप कर किसी का इस्तीफा ले लिया जाएगा। आज ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगा जा रहा है, पिछले दिनों केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लिया और क्या गांरटी की कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इी इस्तीफा मांग लिया जाए। देश में आंदोलनों के नाम पर यह सिलसिला अब थमना चाहिए। अभी आठ-दस हजार लोगों को पूरा देश का जनमत समझना भूल है। देश का जनमत जिस जाग जाएगा, उस दिन सरकारें अपने आप बदल जाएगी। मोदी जी आप अपना काम सहजता से करते रहें। आपको इस देश की खातिर अभी लंबा जीना है। जब तक सांस चलती रहे देश का नेतृत्व करते रहें। कुछ लोग देश में शांति पसंद नहीं करते। देश में शांति कैसे है? देश में प्रगति कैसे हो रही है? देश विकास कैसे छू रहा है? लोगों को यह हजम नहीं हा रहा।
याद करो कोरोना की वो त्रासदी और मोदी जी का नेतृत्व…
जब पूरी दुनिया कोरोना की वैश्विक त्रासदी झेल रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सूझबूझ और हिम्मत से देश इस महामारी से उबरा। ना केवल उबरा वरन रिकॉर्ड समय में वैक्सीन बनी और देश को त्राण मिला। मोदी जी सही मायनों में देश के लीडर हैं। वे ईश्वरीय चेतना से ओतप्रोत एक ऐसी ताकत है जो भारत भूमि के लिए ही बनी है। मोदी जी आप घबराओ मत। कुछ ताकतों को अपना काम करने दो। आप अपना काम नेचुरल ढंग से करते जाओ। ऐसे आंदोलन आपकी राह नहीं रोक सकते।
मोदी जी के नेतृत्व में देश बढ़ेगा…भारत वैश्विक ताकत बनेगा, दुनिया झुकेगी
मोदी जी के नेतृत्व में देश बढ़ेगा…भारत वैश्विक ताकत बनेगा और दुनिया झुकेगी। यह बातें केवल हवा हवाई नहीं है। हमारी देश के 140 करोड़ देशवासियों से अपील है कि भारत को बांग्लादेश और पाकिस्तान ना बनने दें। विदेशी ताकतें देश को कमजोर करने में जुटी है। कांग्रेस का तो इतिहास रहा है विदेशी सरकारों से हाथ मिलाने का। कांग्रेस और गांधी जी के रास्ते पर चलकर देश पता नहीं कब आजाद होता। देश आजाद कराने में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और न जाने कितने शहीदों का रक्त काम आया है। केवल अहिंसा के भरोसे और सत्य की दुहाई देकर अंग्रेजों को भारत से निकालना इस जन्म में संभव नहीं था।
दुनिया गांधी जी की तस्वीर पर माला चढ़ाती है और हिंसा का तांडव पूरी दुनिया में हो रहा है…दो मुंही बातें बंद करो…
हमने ऊपर लिखा है कि गांधी जी की नीतियों पर चलकर भारत इस जन्म में आजाद नहीं होता। इसका कई पाठक विरोध कर सकते हैं। मगर हम पाठकों से ही पूछना चाहते हैं कि आज गांधी जी केवल तस्वीर में ही अच्छे लगते हैं। भारत की ही नहीं दुनिया की मजबूरी है कि वो गांधी जी नीतियों की प्रशंसा करती है…लेकिन गांधी जी की नीतियों पर दुनिया चलती कितनी है? अमरेरिका, रूस और चीन या अन्य वीटो पॉवर देश कितना अहिंसा पर चल रहे हैं। पूरी दुनिया में हिंसा का नंगा नाच चल रहा है। कृपया गांधी के नाम को बदनाम करना बंद करें। बंद करें गांधी जी की तस्वीरों पर माला चढ़ाकर हिंसा की आग में दुनिया को झोकना। दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है। दुनिया के वीटो पॉवर देशों के पास सबसे ज्यादा परमाणु बम है। अगर गांधी जी के भक्त हैं तो परमाणु बमों को नष्ट क्यों नहीं करते? खुद तो परमाणु बमों को गोदी में लिए फिरते हैं और बात गांधी जी नीतियों की करते हैं। बंद करो, यह नाटक। भारत में गांधी जी पैदा हुए और उनका संदेश पूरी दुनिया ने अपनाया। लेकिन चला कोई नहीं। ना भारत के लोग गांधी जी की नीतियों पर चले और ना ही दुनिया गांधी जी नीतियों पर चली। गांधी को उसके हाल पर छोड़ दो। गांधी को अब पूजना बंद कर दो। गांधी को किताबों में ही रहने दो। हो सके तो अब गांधी जी और दुनिया में शांति की तलाश पर नई दृष्टि सामने लाओ। क्योंकि केवल अहिंसा का झुनझुना बजाकर और झूठी सत्य की दुहाई देकर हम गांधी जी को कब तक जिंदा रखेंगे। हकीकत यह है कि गांधी जी को गोडसे ने नहीं हम सबने कब का मार दिया है।
अगर गांधी जिंदा है तो यह प्रोटेस्ट का तरीका बदलो…
हम पाठकों से ही सवाल करते हैं कि अगर वाकई गांधी जिंदा है तो यह उग्र आंदोलन क्यों? जैसा कि हमने कहा- क्या भीड़ एकत्रित करके ही आंदोलन किया जा सकता है। गांधी जी तो उपवास करते थे। हम कहते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी के 50 हजार कार्यकर्ता अपने घर के बाहर ही दरी बिछाकर 20 दिन अन्न-जल त्यागकर उपवास कर लो। अगर सरकार को झुकाना है तो ऐसा भी तो कर सकते हैं। जरूरी तो नहीं कि आप जंतर-मंतर और दिल्ली ठप कर दो। सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए स्टंटबाजी करना आसान है और जमीनी नेता बनना मुश्किल। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने न जाने कितनी तकलीफें सही, कितने कष्ट सहे और कितने पापड़ बेले तब जाकर आज देश का नेतृत्व कर रहे हैं और कॉकरोच जनता पार्टी का कल जन्म हुआ और आज मलाई खाना चाहते हैं। हम तो यह कहते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी अपने प्रोटेस्ट का तरीका बदले नहीं तो सुप्रीम कोर्ट को सख्त आदेश देना चाहिए कि देखते ही गोली मार दो। देश को अराजग स्थिति से बचाना जरूरी है।








