उम्दा शायरी आधुनिक सोच नए दरवाजे खोलती है : प्रो. नईम

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‘क़िंदील-ए-हुनर’, ‘बूँद बूँद समंदर’ और ‘कर्ब-ए-एहसास’ का लोकार्पण

उदित भास्कर. जयपुर

अंजुमन अरबाब-ए-क़लम, जयपुर की ओर से राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति, जयपुर में मशहूर शायर प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की ‘क़िंदील-ए-हुनर’ और ‘बूँद बूँद समंदर’ और वकील अहमद सागर की ‘कर्ब-ए-एहसास’ पुस्तकों का रविवार को लोकार्पण और उन पर चर्चा का आयोजन हुआ। समारोह में उर्दू और हिंदी के अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों, शाइरों, आलोचकों और गणमान्य नागरिकों ने शिरकत की।

अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर मोहम्मद काज़िम ने प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की शायरी को जज़्बा-ओ-एहसास, फ़िक्र और कलात्मक अभिव्यक्ति के सम्मिश्रण की उत्कृष्ट मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की शायरी वर्तमान उर्दू कविता के परिदृश्य में अपना महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान रखती है।उन्होंने वकील अहमद सागर की पुस्तक ‘कर्ब-ए-एहसास’ की भी सराहना की और उसमें जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति तथा प्रेम और मानवीय संवेदना के संदेश को विशेष रूप से रेखांकित किया।

मुख्य अतिथि प्रो. मोहम्मद नईम ने प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की शायरी को ऐसी शायरी बताया जो केवल वर्तमान ही नहीं, बल्कि भविष्य में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगी। उन्होंने कहा कि उनकी शायरी बड़े-बड़े सवाल खड़े करती है और आधुनिक सोच के नए दरवाज़े खोलती है।डॉ. अरशद अब्दुल हमीद ने अपनी आलोचनात्मक विवेचना में प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की शायरी को विचारपूर्ण भावानुभूति) और भावनात्मक चिंतन की शायरी बताया। उन्होंने इसके उच्च कलात्मक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि वे प्रो. हुसैन को बिंब-विधान एवं चित्रात्मक अभिव्यक्ति का विशिष्ट शाइर मानते हैं।

विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ व्यंग्यकार फ़ारूक़ आफ़रीदी ने कहा कि लेखकों को अपने सृजन से समाज में बढ़ती टूटन और नफरत को समाप्त कर सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाना उर्दू साहित्यकारों को इस चुनौती का सामना करना होगा। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की शायरी में मौजूद समय की अनेक सामाजिक समस्याओं और चुनौतियों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्ति मिली है। उर्दू और हिंदी के साहित्यकारों को मिलकर काम करने की जरूरत है।

प्रोफेसर ई.ए.हैदरी ने कहा कि प्रो. मोहम्मद हुसैन की शायरी का आधुनिक ग़ज़ल के परिदृश्य में महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने कहा कि उनकी शायरी में नई दृष्टि मौजूद हैं तोशास्त्रीय परंपरा को समकालीन समय की अनुभूति से जोड़ा है। उर्दू के जाने-माने आलोचक, शोधकर्ता और शाइर शाहिद पठान ने शोध-पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने पुस्तक में प्रयुक्त लघुत्तम छंदों की विशेषता पर प्रकाश डाला। अंजुमन अरबाब-ए-क़लम के अध्यक्ष उर्दू शाइर एवं आलोचक सैयद साबिर हसन रईस ने प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। अरूज़दान हसन इक़बाल ने ‘बूँद बूँद समंदर’ में किए गए छंद-संबंधी प्रयोगों की विवेचना की।उर्दू शाइर, आलोचक एवं पत्रकार

एम.आई.ज़ाहिर, उर्दू, हिंदी और राजस्थानी के कवि, लेखक एवं आलोचक इरशाद अज़ीज़, शाइर शकील आदिल, श्रीमती दीपा गुप्ता, ज़ेबा ज़ीनत, और लेखिका-कवयित्री डॉ. सीमा भाटी , शाइर शम्सुद्दुहा ख़ान हाकिम ने प्रोफेसर मोहम्मद हुसैन की इल्मी और अदबी ख़िदमात पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। वकील अहमद सागर की शायरी और उनके जीवन पर तारिक़ राना ने पत्र-वाचन किया।

समारोह में उर्दू और हिंदी के शाइर, कवि, साहित्यकार, शिक्षाविद् राजेंद्र बोड़ा, राघवेंद्र रावत,डॉ. विशाल विक्रम,तालिब धौलपुरी, आज़म ज़ेदी, आरिफ़ अजमेरी, अनीस नियाज़ी, सलाम जलीली, असर शैदाई, राजस्थान उर्दू अकादमी के पूर्व अध्यक्ष हुसैन रज़ा ख़ान, जाने-माने समाजसेवी मोहम्मद रफ़ीक़ गार्नेट, उच्च शिक्षा के पूर्व संयुक्त सचिव फ़िरोज़ अख़्तर, शिक्षक नेता घासीराम, प्रोफेसर आर पी गर्ग, संपादक महमूद ख़ान, प्राचार्या नुज़हत फातिमा, शाइर क़ासिम बीकानेरी, डॉ. बदर अहमद, सैयद आबिद शाह, हफ़ीजुल्लाह ख़ान और मोहम्मद राशिद खान (बेहतेड़), शरीफ़ अहमद पटेल भी मौजूद थे।कार्यक्रम का संचालन हातिम जयपुरी ने किया।

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