जोधपुर जिले की छह नगर पालिकाओं के नतीजों ने बदला सियासी गणित, पांच निकायों में बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीय-‘अन्य’ निर्णायक; नगर पालिका अध्यक्ष की चाबी भी इन्हीं के हाथ
दिलीप कुमार पुरोहित. शिव वर्मा. जोधपुर
नगर निकाय चुनाव के परिणामों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि स्थानीय राजनीति का मिजाज समझना आसान नहीं है। बड़े राजनीतिक दलों के चुनावी गणित, संगठन की ताकत और सत्ता के प्रभाव से अलग स्थानीय मतदाता अपने स्तर पर फैसला करता है। जोधपुर जिले की बिलाड़ा, पीपाड़ सिटी, भोपालगढ़, तिंवरी, मथानिया और बालेसर नगर पालिकाओं के उपलब्ध परिणामों पर नजर डालें तो तस्वीर बेहद दिलचस्प बनकर सामने आती है।
इन छह नगर पालिकाओं के कुल 175 वार्डों में भाजपा को 52, कांग्रेस को 40 और शेष निर्दलीय व अन्य प्रत्याशियों को सीटें मिली है। यानी अकेले निर्दलीय और अन्य का आंकड़ा भाजपा-कांग्रेस दोनों से आगे है। भाजपा का हिस्सा करीब 29.7 प्रतिशत, कांग्रेस का करीब 22.9 प्रतिशत और निर्दलीय-‘अन्य’ का करीब 50.3 प्रतिशत बैठता है। यही आंकड़ा इस पूरे चुनावी विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
जनता का संदेश साफ है—स्थानीय चुनाव में पार्टी का नाम नहीं, उम्मीदवार और स्थानीय भरोसा ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
राजस्थान में 2026 के नगर निकाय चुनावों की मतगणना 14 सितंबर को हो रही है और जोधपुर जिले की ये छह नगर पालिकाएं भी इसी चरण में परिणाम दे रही हैं।
छह नगर पालिकाओं का पूरा गणित
| नगर पालिका | भाजपा | कांग्रेस | निर्दलीय/अन्य | कुल |
|---|---|---|---|---|
| बिलाड़ा | 12 | 9 | 19 | 40 |
| पीपाड़ सिटी | 10 | 8 | 17 | 35 |
| भोपालगढ़ | 7 | 6 | 12 | 25 |
| तिंवरी | 6 | 6 | 13 | 25 |
| मथानिया | 7 | 6 | 12 | 25 |
| बालेसर | 10 | 5 | 10 | 25 |
| कुल | 52 | 40 | 83 | 175 |
सबसे बड़ा सवाल—बोर्ड किसका?
यही वह सवाल है जो इन परिणामों को सामान्य चुनाव परिणाम से अलग बनाता है। छह में से पांच नगर पालिकाओं में निर्दलीय और अन्य सबसे बड़े समूह के रूप में उभरे हैं। बिलाड़ा में 19, पीपाड़ सिटी में 17, भोपालगढ़ में 12, तिंवरी में 13 और मथानिया में 12 सीटें इसी वर्ग के खाते में गई हैं। बालेसर में भाजपा और निर्दलीय/अन्य दोनों के खाते में 10-10 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस 5 पर है। अर्थात भाजपा किसी भी नगर पालिका में अपने दम पर स्पष्ट बहुमत की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस की स्थिति भी ऐसी ही है। इसके उलट निर्दलीय और अन्य प्रत्याशियों का समूह लगभग हर जगह सत्ता की चाबी अपने पास रखता दिखाई देता है। लेकिन यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि सबसे बड़ा समूह होना अपने आप में बोर्ड बनने की गारंटी नहीं है। अध्यक्ष का चुनाव पार्षदों के समर्थन और राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा। इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि अध्यक्ष बनाने और बोर्ड का समीकरण तय करने में निर्दलीय एवं अन्य पार्षद निर्णायक भूमिका में रहेंगे।
बिलाड़ा : 40 में 19 ने बनाया सबसे बड़ा समूह
बिलाड़ा की 40 सदस्यीय नगरपालिका में भाजपा को 12, कांग्रेस को 9 और निर्दलीय एवं अन्य को 19 सीटें मिली हैं। यहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बहुमत के लिए 21 पार्षदों की जरूरत होगी। भाजपा 12 पर और कांग्रेस 9 पर है। ऐसे में 19 निर्दलीय/अन्य पार्षदों का समूह सत्ता के समीकरण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। यह परिणाम राजनीतिक दलों के लिए भी संदेश है कि टिकट वितरण और पार्टी संगठन के बावजूद स्थानीय मतदाता किसी एक दल के पीछे पूरी तरह नहीं गया। बिलाड़ा का संदेश—सबसे बड़ा दल नहीं, सबसे बड़ा निर्णायक समूह महत्वपूर्ण है।
पीपाड़ सिटी : 17 पार्षदों के साथ ‘अन्य’ सबसे आगे
पीपाड़ सिटी में भाजपा को 10, कांग्रेस को 8 और निर्दलीय एवं अन्य को 17 सीटें मिली हैं। 35 सदस्यीय बोर्ड में बहुमत के लिए 18 सीटों की आवश्यकता होगी। यानी निर्दलीय/अन्य बहुमत से सिर्फ एक कदम दूर हैं। यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों को अपने-अपने खेमे से बाहर देखना होगा। 17 पार्षदों का समूह किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पीपाड़ सिटी का परिणाम इस बात का उदाहरण है कि मतदाता ने सत्ता की चाबी किसी एक पार्टी को सौंपने के बजाय राजनीतिक विकल्पों को मजबूत किया है।
भोपालगढ़ : भाजपा-कांग्रेस से आगे ‘अन्य’
भोपालगढ़ की 25 सीटों में भाजपा 7, कांग्रेस 6 और निर्दलीय/अन्य 12 पर हैं। बहुमत के लिए 13 सीटें चाहिए। यानी यहां भी निर्दलीय/अन्य समूह बहुमत से केवल एक सीट पीछे है। भाजपा और कांग्रेस मिलकर भी 13 सीटों का आंकड़ा छूते हैं, लेकिन चुनाव परिणाम का राजनीतिक अर्थ यह नहीं कि दोनों दलों का कोई स्वाभाविक गठबंधन है। वास्तविक बोर्ड गठन के समय व्यक्तिगत संबंध, स्थानीय समीकरण, अध्यक्ष पद की दावेदारी और पार्षदों के बीच सहमति निर्णायक हो सकती है।
तिंवरी : यहां ‘अन्य’ ने हासिल किया बहुमत
छह नगर पालिकाओं में तिंवरी का परिणाम सबसे अलग है। 25 में से 13 सीटें निर्दलीय एवं अन्य के खाते में गई हैं। भाजपा और कांग्रेस को 6-6 सीटें मिली हैं। 25 सदस्यीय बोर्ड में 13 सीटें स्पष्ट बहुमत बनाती हैं। इसलिए उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तिंवरी में निर्दलीय/अन्य समूह बहुमत की स्थिति में है। यह परिणाम उस धारणा को सबसे ज्यादा चुनौती देता है कि स्थानीय चुनाव में दो प्रमुख राजनीतिक दल ही बोर्ड की दिशा तय करते हैं। तिंवरी का संदेश बहुत सीधा है—स्थानीय मतदाता ने इस बार तीसरे विकल्प को केवल मौका नहीं दिया, बल्कि बहुमत भी दिया।
मथानिया : 12 सीटों के साथ निर्णायक स्थिति
मथानिया में भाजपा को 7, कांग्रेस को 6 और निर्दलीय/अन्य को 12 सीटें मिली हैं। 25 सीटों में बहुमत के लिए 13 चाहिए। यानी निर्दलीय/अन्य समूह एक सीट के अंतर से बहुमत से दूर है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों से आगे है। यहां अध्यक्ष पद का समीकरण खास तौर पर दिलचस्प रहेगा। हालांकि मथानिया में अध्यक्ष पद एससी महिला के लिए आरक्षित है, इसलिए अध्यक्ष पद के लिए पात्रता और पार्षदों का समर्थन दोनों महत्वपूर्ण होंगे।
बालेसर : बराबरी का सबसे बड़ा पेंच
बालेसर में परिणाम और भी दिलचस्प है। भाजपा—10, कांग्रेस—5, निर्दलीय/अन्य—10। यहां भाजपा और निर्दलीय/अन्य बराबरी पर हैं। किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसलिए बालेसर में एक-एक पार्षद का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। यहां कांग्रेस के पांच पार्षद भी पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं होंगे। बोर्ड गठन के समय समर्थन, सहमति और स्थानीय समीकरणों के आधार पर तस्वीर बदल सकती है। बालेसर अध्यक्ष पद भी ओबीसी महिला के लिए आरक्षित है। इसलिए बोर्ड गठन के साथ अध्यक्ष पद के लिए पात्र चेहरों और उनके समर्थन का समीकरण महत्वपूर्ण होगा।
किसके पास कितनी ताकत?
कुल 175 वार्डों का आंकड़ा
भाजपा — 52
कांग्रेस — 40
निर्दलीय/अन्य — 83
प्रतिशत हिस्सेदारी
निर्दलीय/अन्य — 47.4%
भाजपा — 29.7%
कांग्रेस — 22.9%
दोनों प्रमुख दलों की कुल सीटें = 92
निर्दलीय/अन्य = 83
यानी भाजपा और कांग्रेस अलग-अलग देखें तो निर्दलीय/अन्य से काफी पीछे हैं, लेकिन दोनों दलों को एक साथ जोड़ दें तो संख्या 92 हो जाती है। इसलिए बोर्ड गठन का वास्तविक खेल स्थानीय समर्थन और पार्षदों के बीच बनने वाले समीकरण पर निर्भर करेगा।
‘सत्ता का डंडा’ भी जनता के मिजाज को नहीं मोड़ सकता
इन परिणामों की सबसे बड़ी राजनीतिक व्याख्या यही हो सकती है कि जनता को सत्ता का प्रभाव हमेशा प्रभावित नहीं करता। भाजपा आज केंद्र में सत्ता में है और राजस्थान में भी सत्ता में है। कांग्रेस देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी है और राजस्थान की राजनीति में उसका अपना मजबूत आधार है। दोनों दलों के पास संगठन, कार्यकर्ता, बड़े नेता और चुनावी संसाधन हैं। लेकिन नगर पालिका का चुनाव आते ही मतदाता का नजरिया अलग दिखाई देता है। यह चुनाव यह याद दिलाता है कि लोकसभा और विधानसभा की राजनीति तथा नगरपालिका की राजनीति एक जैसी नहीं होती। नगर पालिका में मतदाता अपने वार्ड की सड़क, नाली, सफाई, पानी, रोशनी, स्थानीय संपर्क, व्यक्तिगत व्यवहार और उम्मीदवार की उपलब्धता को भी महत्व देता है। यही कारण है कि कोई उम्मीदवार पार्टी के बड़े नाम के बिना भी जीत सकता है और कोई मजबूत पार्टी उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर सकता।
जनता का फैसला—पार्टी से पहले प्रत्याशी?
स्थानीय चुनाव का नया मंत्र
- पार्टी का चिन्ह महत्वपूर्ण, लेकिन हमेशा निर्णायक नहीं।
- व्यक्तिगत संपर्क की भूमिका बढ़ी।
- स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों पर भारी पड़ सकते हैं।
- निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए अवसर बढ़ा।
- टिकट से नाराजगी का असर परिणामों में दिख सकता है।
- स्थानीय मतदाता अपना स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय ले सकता है।
‘जनता जिसके साथ, वही सिकंदर’
इन परिणामों को एक पंक्ति में समेटना हो तो कहा जा सकता है—“जनता जिसके साथ, वही सिकंदर।” राजनीति में कोई स्थायी विजेता नहीं होता। चुनाव के मैदान में सबसे बड़ा नेता, सबसे बड़ा दल या सबसे मजबूत संगठन भी मतदाता के अंतिम फैसले से बड़ा नहीं हो सकता। नगर पालिका के इन परिणामों में यही संदेश दिखाई देता है। भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का विषय है कि सत्ता में रहते हुए भी स्थानीय स्तर पर उसे अपेक्षित स्पष्ट बहुमत क्यों नहीं मिला। कांग्रेस के लिए सवाल और बड़ा है कि वह कई जगह दूसरे स्थान पर रहने के बावजूद निर्णायक स्थिति क्यों नहीं बना सकी। और निर्दलीय व अन्य प्रत्याशियों के लिए यह परिणाम अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। अवसर इसलिए कि जनता ने उन्हें ताकत दी है। जिम्मेदारी इसलिए कि अब जनता उनके प्रदर्शन को देखेगी।
असली परीक्षा अब शुरू होगी
चुनाव परिणाम आना राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं, बल्कि बोर्ड गठन के साथ एक नई शुरुआत है। निर्दलीय और अन्य पार्षदों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल शहर के विकास के लिए करें। यदि बोर्ड गठन के दौरान केवल अध्यक्ष पद, सत्ता समीकरण या व्यक्तिगत हित केंद्र में रहे तो जनता का यह फैसला निराशा में बदल सकता है। लेकिन यदि निर्दलीय और अन्य पार्षद अपने-अपने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर विकास का साझा एजेंडा बनाते हैं, तो यह चुनाव स्थानीय लोकतंत्र के लिए सकारात्मक उदाहरण बन सकता है।
अब किसकी होगी परीक्षा?
भाजपा की परीक्षा
स्थानीय संगठन और निर्वाचित पार्षदों के बीच बेहतर समन्वय कितना है?
कांग्रेस की परीक्षा
क्या पार्टी विपक्ष में रहते हुए स्थानीय स्तर पर मजबूत रणनीति बना पाएगी?
निर्दलीय/अन्य की परीक्षा
क्या वे अपनी संख्या को विकास की शक्ति में बदल पाएंगे?
जनता की भूमिका
अब जनता की निगाह बोर्ड के कामकाज पर होगी।
यह केवल हार-जीत नहीं, राजनीतिक संदेश है
इन छह नगर पालिकाओं के परिणामों को केवल इस नजरिए से देखना कि भाजपा को कितनी सीटें मिलीं और कांग्रेस कितनी सीटों पर जीती, अधूरा विश्लेषण होगा। इस चुनाव का बड़ा संदेश सीटों की तीसरी श्रेणी में छिपा है—निर्दलीय और अन्य। जब किसी छह निकायों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता और निर्दलीय/अन्य लगातार सबसे बड़ा समूह बनकर सामने आते हैं, तो इसे स्थानीय मतदाता की स्वतंत्र राजनीतिक सोच का संकेत माना जा सकता है। यह जरूरी नहीं कि हर निर्दलीय या अन्य प्रत्याशी किसी एक राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता हो। लेकिन इतना स्पष्ट है कि मतदाता ने बड़ी पार्टियों के विकल्प के रूप में स्थानीय चेहरों को भी पर्याप्त समर्थन दिया। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
बोर्ड की चाबी जनता ने अपने पास रखी
जोधपुर जिले की इन छह नगर पालिकाओं के परिणामों का सबसे बड़ा राजनीतिक निष्कर्ष यही है कि न भाजपा अकेले निर्णायक है, न कांग्रेस। बिलाड़ा में निर्दलीय/अन्य 19, पीपाड़ सिटी में 17, भोपालगढ़ में 12, तिंवरी में 13 और मथानिया में 12 सीटों के साथ सबसे बड़े समूह के रूप में सामने आए हैं। बालेसर में भाजपा और निर्दलीय/अन्य बराबरी पर हैं। इसलिए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि इन निकायों में बोर्ड गठन की चाबी निर्दलीय और अन्य पार्षदों के हाथ में है। हालांकि अंतिम बोर्ड और अध्यक्ष का फैसला समर्थन, पात्रता, आरक्षण और पार्षदों के बीच बनने वाले वास्तविक राजनीतिक समीकरणों से होगा। लेकिन जनता ने अपना संदेश दे दिया है। सत्ता का डंडा हो या संगठन की ताकत, चुनाव के अंतिम क्षण में फैसला मतदाता ही करता है। और इस बार जो तस्वीर सामने आई है, वह यही कह रही है—“न भाजपा… न कांग्रेस…जनता ने दिखाया अपना रास्ता। जनता जिसके साथ, वही सिकंदर!”






