हिंदी संवाद की भाषा मात्र नहीं,यह सोचने, समझने और स्वयं को व्यक्त करने का सहज माध्यम

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विश्व में सात हजार से अधिक भाषाएँ प्रचलित हैं। हर भाषा के पीछे किसी समाज का इतिहास, अनुभव, लोकगीत, साहित्य, ज्ञान और स्मृतियाँ छिपी हैं। इसलिए भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं है। वह सामूहिक स्मृति भी है।

केबी व्यास. दुबई

भाषाएं हमे पहचान देती है परन्तु सुंदर विचार हमें मनुष्य बनाते है। मैंने अपनी शिक्षा हिंदी माध्यम से प्राप्त की है। इसलिए हिंदी मेरे लिए केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि सोचने, समझने और स्वयं को व्यक्त करने का सहज माध्यम भी है। हिंदी के शब्द और ध्वनियाँ मेरे लिए आत्मीय हैं। आज हिंदी दिवस है। यह दिन हिंदी के महत्व, उसकी साहित्यिक समृद्धि, विस्तार और संरक्षण पर विचार करने का अवसर देता है। हिंदी का प्रचार-प्रसार होना चाहिए। नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य, विज्ञान, तकनीक, दर्शन और आधुनिक ज्ञान से जोड़ने वाली उत्कृष्ट सामग्री भी उपलब्ध होनी चाहिए।

लेकिन इस अवसर पर एक प्रश्न भी उठता है—आखिर भाषा क्या है? क्या भाषा मन में उठने वाले विचारों को व्यक्त करने का माध्यम नहीं है? यदि कोई व्यक्ति हिंदी नहीं जानता, फिर भी उसके हृदय में हिंदी बोलने वालों के प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान है, तो क्या उसका भाव कम मूल्यवान हो जाएगा? दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति अत्यंत शुद्ध हिंदी बोलता हो, लेकिन उसके विचारों में घृणा, अहंकार या संकीर्णता हो, तो क्या केवल भाषा की शुद्धता उसे महान बना देगी?

शायद नहीं। यहीं भाषा और विचार का अंतर स्पष्ट होता है—भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, लेकिन विचार उसका मूल हैं। मनुष्य पहले अनुभव करता है। फिर सोचता है। उसके बाद अपने विचारों को भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है। भाषा, शब्द और लिपि बदल सकते हैं। लेकिन करुणा, प्रेम, सम्मान और मानवता का भाव हर भाषा में समान रहता है। विश्व में सात हजार से अधिक भाषाएँ प्रचलित हैं। हर भाषा के पीछे किसी समाज का इतिहास, अनुभव, लोकगीत, साहित्य, ज्ञान और स्मृतियाँ छिपी हैं। इसलिए भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं है। वह सामूहिक स्मृति भी है।

भारत स्वयं भाषाओं का अद्भुत संसार है। संस्कृत ने वेदों, उपनिषदों, दर्शन, काव्य, नाट्य, गणित, चिकित्सा और अनेक ज्ञान-परंपराओं को अभिव्यक्ति दी। पालि ने बौद्ध शिक्षाओं के संरक्षण और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राकृतों ने विभिन्न क्षेत्रों और साहित्यिक परंपराओं को स्वर दिया। आगे चलकर अपभ्रंशों, क्षेत्रीय बोलियों और अनेक भाषायी धाराओं के संपर्क से आधुनिक उत्तर भारतीय भाषाओं का विकास हुआ।

हिंदी का निर्माण भी किसी एक सीधी वंश-रेखा का परिणाम नहीं है। पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, पहाड़ी और अन्य भाषाओं तथा बोलियों ने हिंदी की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध किया। आधुनिक मानक हिंदी का आधार मुख्यतः खड़ी बोली है। फिर भी हिंदी का व्यापक संसार अनेक भाषायी धाराओं से बना है।

इस पूरी यात्रा में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—भाषा कभी स्थिर नहीं रहती। वह नदी की तरह बहती है। नए शब्द ग्रहण करती है। पुराने रूपों को बदलती है। समाज के साथ विकसित होती रहती है। आज की हिंदी हजार वर्ष पहले की हिंदी जैसी नहीं थी। भविष्य की हिंदी भी आज जैसी नहीं रहेगी। यही उसकी जीवंतता है। लेकिन वर्णों, शब्दों और व्याकरण से भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इनके पीछे क्या है?

वह है—विचार। विचार मनुष्य के भीतर जन्म लेते हैं। भाषा उन्हें बाहर आने का मार्ग देती है। कोई विचार हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, बंगला, मराठी, अरबी या किसी भी भाषा में व्यक्त हो सकता है। भाषा बदल सकती है। लेकिन करुणा, प्रेम और मानवता का अर्थ नहीं बदलता। माँ अपने बच्चे को किसी भी भाषा में पुकारे, उसकी ममता वही रहती है। सहायता करने वाला व्यक्ति पहले यह नहीं पूछता कि पीड़ित कौन-सी भाषा बोलता है। करुणा को अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। मुस्कान के लिए शब्दकोश नहीं चाहिए। आँसू किसी व्याकरण का पालन नहीं करते।

इसलिए भाषा के महत्व के साथ हमें विचारों की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना चाहिए। विचार सकारात्मक, रचनात्मक और करुणामय हों। हम जैसा सोचते हैं, वैसा बोलते हैं। जैसा बोलते हैं, वैसा व्यवहार करते हैं। हमारा व्यवहार धीरे-धीरे व्यक्तित्व और समाज की संस्कृति का निर्माण करता है। सभ्यता केवल भाषाओं से नहीं बनती। वह उन भाषाओं में व्यक्त विचारों से बनती है। इतिहास के महान विचारकों ने अलग-अलग भाषाओं में मानवता का संदेश दिया। फिर भी उनके विचारों का मूल भाव एक ही था—मनुष्य का कल्याण।

हिंदी से प्रेम करना सुंदर बात है। लेकिन हिंदी का सम्मान तभी पूर्ण होगा, जब हम तमिल, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत और संसार की सभी भाषाओं का भी सम्मान करें। किसी एक भाषा को ऊँचा उठाने के लिए दूसरी भाषा को छोटा करना आवश्यक नहीं है। भाषाओं का सम्मान वास्तव में मानव विविधता का सम्मान है। हिंदी दिवस केवल यह कहने का दिन नहीं होना चाहिए कि हमें हिंदी बोलनी चाहिए। यह सोचने का अवसर भी होना चाहिए कि—हम हिंदी में क्या बोल रहे हैं? क्या हमारे शब्दों में प्रेम, करुणा, सम्मान और सकारात्मकता है? यदि भाषा सुंदर हो, लेकिन विचार कटु हों, तो उसकी सुंदरता अधूरी रह जाती है। इसके विपरीत, साधारण शब्द भी महान विचारों के कारण हृदय को छू सकते हैं।

भाषा का वास्तविक गौरव कठिन शब्दों में नहीं, बल्कि सुंदर विचारों में है। हिंदी का प्रचार हो। हिंदी साहित्य आगे बढ़े। हिंदी में विज्ञान, दर्शन और तकनीक का विकास हो। नई पीढ़ी हिंदी में अपने विचार व्यक्त करे। साथ ही, उन्नत विचारों का भी प्रचार हो। ऐसे विचार समाज को जोड़ते हैं। वे मतभेद को शत्रुता में बदलने से रोकते हैं और मानवता को मजबूत करते हैं। हिंदी मेरी सहज भाषा है, इसलिए मुझे प्रिय है। किसी अन्य व्यक्ति को उसकी मातृभाषा उतनी ही प्रिय हो सकती है। अपनी भाषा से प्रेम करना और दूसरी भाषाओं का सम्मान करना—दोनों एक साथ संभव हैं। भाषा अभिव्यक्ति है, विचार उसका मूल हैं। भाषा हमें बोलना सिखाती है। विचार तय करते हैं कि हम क्या बोलेंगे। भाषा मनुष्य को मनुष्य तक पहुँचाती है। करुणा उसे मनुष्य से जोड़ती है। इसलिए हिंदी दिवस पर हिंदी के साथ सुंदर विचारों का भी उत्सव मनाएँ। महान भाषा वही है, जिसमें महान विचार व्यक्त हों। महान मनुष्य वह है, जिसकी भाषा चाहे कोई भी हो, लेकिन जिसके विचारों में प्रेम हो, व्यवहार में करुणा हो और दृष्टि में संपूर्ण मानवता के प्रति सम्मान हो। हिंदी दिवस पर मेरा यही निवेदन है—भाषा कोई भी हो, विचार ऊँचे हों; शब्द कोई भी हों, उनमें करुणा हो; लिपि कोई भी हो, उसमें मानवता लिखी जाए। क्योंकि भाषाएँ हमें पहचान देती हैं, पर सुंदर विचार हमें मनुष्य बनाते हैं।

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