पीएचईडी : पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव में पिछले दस साल में 200 करोड़ से अधिक का घोटाला!

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पीएचईडी राजस्थान में आवंटित बजट को पिछले दस सालों में पूरी तरह पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव पर खर्च कर ही नहीं पाया। पिछले दस सालों में 1 हजार करोड़ से अधिक का बजट आवंटित हुआ और इसमें 80 से 90 प्रतिशत बजट खर्च होने का उल्लेख है, जबकि हकीकत यह है कि क्षेत्रों में रखरखाव के नाम पर बार-बार जलापूर्ति बंद करते गए और उस रखरखाव कार्य का वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिका, भुगतान बिल, ठेकेदार का नाम, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र और फोटो-जियो टैग रिकॉर्ड ही पूरी तरह उपलब्ध नहीं है।

यही नहीं विभाग लगातार “जिलों से मांग न आने” को बजट कम करने का कारण बताता रहा और  फिर उन्हीं क्षेत्रों में रखरखाव कार्यों के लिए नियमित रूप से जलापूर्ति बाधित होने की घोषणाएं करता रहा। सवाल यह है कि यदि किसी महीने में कई बार शटडाउन लिया जाता है, तो प्रत्येक शटडाउन से संबंधित कार्य का वित्तीय मूल्य कितना था और वास्तविक भुगतान कितना किया गया? जिस पाइपलाइन या जलापूर्ति योजना की मरम्मत/सफाई का दावा किया गया, अगले कुछ महीनों में उसी स्थान पर दोबारा उसी कारण से शटडाउन लिया गया। शटडाउन की तारीख,  संबंधित पीएचईडी डिवीजन,  कार्य का नाम, वर्क ऑर्डर, अनुमानित लागत, ठेकेदार, बिल राशि, भुगतान तारीख, मेजरमेट बुक, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र और अगले शटडाउन की तारीख को लेकर भारी घालमेल सामने आई है।

स्पेशल रिपोर्ट दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर

पीएचईडी में पिछले दस सालों में पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव में 200 करोड़ से अधिक का घोटाला सामने आया है। एक तरफ पीएचईडी मंत्रालय से विभाग को राजस्थान में पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव के लिए हर साल करीब 100 करोड़ से अधिक राशि आवंटित होती रही। लेकिन विभाग पूरी राशि खर्च ही नहीं कर पाया। इसके बावजूद अगले साल उतनी ही राशि आवंटित होती रही और यह सिलसिला पिछले दस सालों से लगातार चलता रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग पूरी राशि खर्च ही नहीं कर पा रहा था तो हर साल बड़ी राशि आवंटित करने का क्या तुक था? मगर बात यहां समाप्त नहीं हो जाती, पीएचईडी के अधिकारियों द्वारा पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव के नाम पर राशि कागजों में खर्च दिखाकर बंदरबांट होती रही। दस सालों में सरकारें बदलती रही, मगर नहीं बदला तो विभाग के काम करने का तरीका। भाजपा और कांग्रेस दोनो ही सरकारों में राशि की बंदरबांट होती रही और जनता छली जाती रही। पानी की कटौती के नाम पर खेल चलता रहा और कोई बोलने वाला नहीं था।

पीएचईडी राजस्थान में आवंटित बजट को पिछले दस सालों में पूरी तरह पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव पर खर्च कर ही नहीं पाया।  पिछले दस सालों में 1 हजार करोड़ से अधिक का बजट आवंटित हुआ और इसमें 80 से 90 प्रतिशत बजट खर्च होने का उल्लेख है, जबकि हकीकत यह है कि क्षेत्रों में रखरखाव के नाम पर बार-बार जलापूर्ति बंद करते गए और उस रखरखाव कार्य का वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिका, भुगतान बिल, ठेकेदार का नाम, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र और फोटो-जियो टैग रिकॉर्ड ही पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। यही नहीं विभाग लगातार “जिलों से मांग न आने” को बजट कम करने का कारण बताता रहा और  फिर उन्हीं क्षेत्रों में रखरखाव कार्यों के लिए नियमित रूप से जलापूर्ति बाधित होने की घोषणाएं करता रहा। सवाल यह है कि यदि किसी महीने में कई बार शटडाउन लिया जाता है, तो प्रत्येक शटडाउन से संबंधित कार्य का वित्तीय मूल्य कितना था और वास्तविक भुगतान कितना किया गया? जिस पाइपलाइन या जलापूर्ति योजना की मरम्मत/सफाई का दावा किया गया, अगले कुछ महीनों में उसी स्थान पर दोबारा उसी कारण से शटडाउन लिया गया। शटडाउन की तारीख,  संबंधित पीएचईडी डिवीजन,  कार्य का नाम, वर्क ऑर्डर, अनुमानित लागत, ठेकेदार, बिल राशि, भुगतान तारीख, मेजरमेट बुक, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र और अगले शटडाउन की तारीख को लेकर भारी घालमेल सामने आई है। जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि भौतिक सत्यापन में आंकड़ों में भारी अनियमितता सामने आई है। यदि भुगतान हुआ है लेकिन कार्य का प्रमाण नहीं मिलता, तो मामला और गंभीर हो जाता है।

पेयजल लाइनों और जल योजनाओं के रखरखाव पर बजट का खेल?

CAG के दस्तावेजों में वर्षों से सामने आ रही बचत, पीएचईडी की रखरखाव मदों में करोड़ों का प्रावधान लेकिन कई सालों में बड़ी राशि खर्च नहीं हुई

राजस्थान में पेयजल आपूर्ति व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग यानी पीएचईडी के माध्यम से पाइपलाइन, ग्रामीण नल जल योजनाओं, जलापूर्ति योजनाओं, ट्यूबवेल और अन्य जलापूर्ति ढांचे के रखरखाव पर हर वर्ष बजट उपलब्ध कराया जाता है। आम नागरिकों को नियमित जलापूर्ति मिले, पाइपलाइन में खराबी दूर हो, जलापूर्ति योजनाएं चालू रहें और आवश्यक रखरखाव हो—इसके लिए सरकारी खजाने से राशि खर्च की जाती है। लेकिन इस पूरे तंत्र का वित्तीय पक्ष एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG के राजस्थान से संबंधित विनियोग लेखों में पीएचईडी की अलग-अलग रखरखाव मदों में बजट प्रावधान के मुकाबले कम खर्च, राशि का समर्पण और लगातार बचत दर्ज होती रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राशि खर्च ही नहीं हो पा रही थी तो विभाग को हर साल बड़ी राशि पिछले दस सालों से क्यों आवंटित होती रही? यहां गौरतलब है कि पीएचईडी के अधिकारी राशि खर्च करने के नाम पर जबरन खर्च करते रहे और जहां राशि खर्च करने की जरूरत ही नहीं थी, वहां भी राशि खर्च होती रही और नतीजा यह हुआ कि पिछले दस सालों में करीब 200 करोड़ से अधिक का घोटाला सामने आया है। जांच का दायरा बढ़ेगा तो यह घोटाला 500 करोड़ रुपए तक भी जा सकता है।

पहली तस्वीर : 2017-18 में ही सामने आया बड़ा अंतर

वित्तीय वर्ष 2017-18 के विनियोग लेखों में पीएचईडी की तीन प्रमुख रखरखाव मदों के आंकड़े सामने आते हैं। स्थानीय संस्थाओं की जल प्रदाय योजनाओं का संधारण मद में मूल बजट ₹17.921 करोड़ था। पुनर्विनियोजन के बाद उपलब्ध राशि ₹9.2227 करोड़ रह गई और वास्तविक खर्च ₹9.2306 करोड़ दर्ज हुआ। ग्रामीण पाइप जल प्रदाय योजनाओं का रखरखाव मद में मूल बजट ₹7.0125 करोड़ था। पुनर्विनियोजन के बाद ₹4.3999 करोड़ उपलब्ध रहे और ₹4.367 करोड़ खर्च हुए। ट्यूबवेल रखरखाव के लिए मूल बजट ₹68.763 करोड़ था। पुनर्विनियोजन के बाद ₹50.9259 करोड़ उपलब्ध रहे और वास्तविक खर्च ₹50.9107 करोड़ दर्ज हुआ। CAG ने इन मदों में राशि कम किए जाने के कारणों में वास्तविक आवश्यकता के आधार पर खर्च और जिलों से मांग प्राप्त न होना बताया। खास बात यह है कि CAG ने इन मदों में कई वर्षों से लगातार बचत की प्रवृत्ति भी दर्ज की। ट्यूबवेल रखरखाव मद में 2010-11 से 2016-17 तक लगातार बचत दर्ज होने का उल्लेख है। सवाल यह है कि जब हर साल बचत ही हो रही है तो इतना भारी भरकम बजट क्यों आवंटित होता रहा?

2018-19 : रखरखाव के नाम पर मूल बजट और वास्तविक खर्च में बड़ा अंतर

वित्तीय वर्ष 2018-19 के आंकड़े इस पड़ताल को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। स्थानीय संस्थाओं की जलापूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए ₹16.644 करोड़ का मूल प्रावधान था। वर्ष के दौरान ₹8.8732 करोड़ की राशि कम कर दी गई और ₹7.7708 करोड़ उपलब्ध रहे, जबकि वास्तविक खर्च ₹10.3031 करोड़ दर्ज हुआ। ग्रामीण नल जलापूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए ₹7.182 करोड़ का मूल प्रावधान था। पुनर्विनियोजन के बाद ₹4.7151 करोड़ उपलब्ध रहे और वास्तविक खर्च ₹4.6887 करोड़ रहा। ट्यूबवेल रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹81.545 करोड़ था। इसमें ₹32.569 करोड़ की कमी के बाद ₹48.976 करोड़ उपलब्ध रहे और ₹48.8917 करोड़ खर्च हुए। CAG ने स्थानीय संस्थाओं की जलापूर्ति योजनाओं वाली मद में राशि कम किए जाने का कारण फंड का उपयोग नहीं होना और जिलों से फंड की मांग प्राप्त नहीं होना बताया। ग्रामीण नल जलापूर्ति और ट्यूबवेल रखरखाव में भी जिलों से मांग न मिलने का उल्लेख किया गया।

2019-20 : फिर करोड़ों का प्रावधान, फिर राशि समर्पित

2019-20 में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। स्थानीय संस्थाओं की जलापूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹14.8365 करोड़ था। ₹4.7446 करोड़ कम किए जाने के बाद ₹10.0919 करोड़ उपलब्ध रहे और वास्तविक खर्च ₹10.097 करोड़ रहा। ग्रामीण नल जलापूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹6.9655 करोड़ था। ₹1.8956 करोड़ की कमी के बाद ₹5.0699 करोड़ उपलब्ध रहे और ₹5.0353 करोड़ खर्च हुए। ट्यूबवेल रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹80.6946 करोड़ था। ₹30.8529 करोड़ कम किए जाने के बाद ₹49.8417 करोड़ उपलब्ध रहे और वास्तविक खर्च ₹49.9116 करोड़ रहा। CAG ने इन तीनों मदों में लगातार बचत का उल्लेख किया और विशेष रूप से बताया कि स्थानीय संस्थाओं की जलापूर्ति योजनाओं में 2013-14 से 2018-19 तक लगातार बचत देखी गई थी। ग्रामीण नल जलापूर्ति योजनाओं में 2009-10 से 2018-19 और ट्यूबवेल रखरखाव में 2010-11 से 2018-19 तक लगातार बचत की प्रवृत्ति दर्ज हुई।

2020-21 : कोरोना काल के बावजूद रखरखाव मदों में बचत

2020-21 में महामारी का असर सरकारी कामकाज और खर्च पर पड़ा, लेकिन पीएचईडी की रखरखाव मदों के आंकड़े फिर भी महत्वपूर्ण हैं। स्थानीय संस्थाओं की जलापूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹14.235 करोड़ था। ₹4.831 करोड़ की कमी के बाद ₹9.404 करोड़ उपलब्ध रहे और ₹9.2919 करोड़ खर्च हुए। ग्रामीण नल जलापूर्ति योजनाओं के रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹7.1995 करोड़ था। ₹2.1109 करोड़ कम होने के बाद ₹5.0886 करोड़ उपलब्ध रहे और ₹5.0557 करोड़ खर्च हुए। ट्यूबवेल रखरखाव के लिए मूल प्रावधान ₹72.382 करोड़ था। ₹27.1567 करोड़ कम किए जाने के बाद ₹45.2253 करोड़ उपलब्ध रहे और वास्तविक खर्च ₹45.1425 करोड़ रहा। CAG ने इस अवधि में कई मदों में राशि कम किए जाने के पीछे कोविड-19 महामारी के कारण कम खर्च और जिलों से मांग न आने का उल्लेख किया।

2026 तक 200 करोड़ से अधिक का घोटला, सरकारें बदलती रही, तरीका नहीं बदला

पड़ताल में सामने आया कि पिछले दस सालों में सरकारें बदलती रही और घोटाले का तरीका नहीं बदला। पीएचईडी में कई जिलों में महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारी और कर्मचारी वर्षों से जमे रहे और राशि की बंदरबांट होती रही।

साल-दर-साल उपलब्ध सत्यापित तस्वीर

वित्त वर्ष प्रमुख नियमित रखरखाव मदों का मूल प्रावधान वास्तविक खर्च टिप्पणी
2017-18 लगभग ₹93.70 करोड़ लगभग ₹64.51 करोड़* पुनर्विनियोजन के बाद बड़ी राशि कम हुई
2018-19 लगभग ₹105.37 करोड़ लगभग ₹63.88 करोड़* कई मदों में राशि समर्पित
2019-20 लगभग ₹102.50 करोड़ लगभग ₹65.04 करोड़* लगातार बचत
2020-21 लगभग ₹93.82 करोड़ लगभग ₹59.49 करोड़* कोविड और कम मांग का उल्लेख
2021-22 समान मदों का पूर्ण तुलनीय आंकड़ा सत्यापनाधीन — CAG दस्तावेजों में अलग-अलग मदें
2022-23 पूर्ण तुलनीय आंकड़ा सत्यापनाधीन — अगले वर्ष के CAG दस्तावेज में पूर्व बचत का उल्लेख
2023-24 संबंधित मदों में अलग-अलग प्रावधान संबंधित मदों में अलग-अलग खर्च ग्रामीण नल जल योजना में ₹65 करोड़ के मुकाबले ₹30.77 करोड़ खर्च
2024-25 समान Detailed Heads का पूर्ण तुलनीय आंकड़ा सत्यापनाधीन — पूर्ण Finance/Appropriation data से मिलान आवश्यक

नोट: तारांकित वर्षों में तालिका में तीन प्रमुख समान रखरखाव मदों—स्थानीय संस्थाओं की जलापूर्ति योजनाएं, ग्रामीण पाइप/नल जलापूर्ति योजनाएं और ट्यूबवेल रखरखाव—को जोड़ा गया है। यह पूरे पीएचईडी का बजट नहीं है।

शटडाउन बनाम खर्च

ये केवल बजट आंकड़े मात्र नहीं, है बल्कि शटडाउन और भुगतान का मिलान करने पर सारा खेल सामने आ गया। मान लीजिए पीएचईडी किसी शहर में एक महीने में 9 बार जलापूर्ति बंद करने की विज्ञप्ति जारी करता है। प्रत्येक विज्ञप्ति में पाइपलाइन रखरखाव, जलाशय/टंकी सफाई, पंपिंग स्टेशन या अन्य कार्य का कारण दिया जाता है। शटडाउन की तारीख, संबंधित पीएचईडी डिवीजन, कार्य का नाम, वर्क ऑर्डर, अनुमानित लागत, ठेकेदार, बिल राशि, भुगतान तारीख, मेजरमेट बुक, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र और अगले शटडाउन की तारीख में पोल खुलती नजर आ रही है। दस्तावेजों में कार्य हुआ है तो उसका भौतिक सत्यापन किया जा सकता है। यदि भुगतान हुआ है लेकिन कार्य का प्रमाण नहीं मिलना, तो मामला और गंभीर है।

इन चरणों में समझिए घोटाला कैसे हुआ? 

10 वर्षों के केवल उपरोक्त तरीके से ही घोटाला नहीं हुआ। बल्कि इसे इस दृष्टि से भी देखना होगा कि Urban Water Supply Maintenance, Rural Tap/Piped Water Supply Maintenance, Maintenance of Tube Wells, Water Supply Houses/Water Works की Establishment & Maintenance और Operation & Maintenance contracts, जिनमें पाइपलाइन, पंप हाउस, ट्यूबवेल और जलापूर्ति योजनाओं का वार्षिक रखरखाव शामिल है। इन पांचों को मिलाकर वर्षवार Original Budget,  Supplementary,  Revised/Final Grant,  Actual Expenditure,  Saving/Surrender  की जांच करने के साथ-साथ उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं तो पिछले दस साल में 200 करोड़ से अधिक का घोटाला सामने आता है। स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच करवाई जाए तो यह आंकड़ा 500 करोड़ से अधिक जा सकता है।

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