पिता पर दो कविताएं

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वालिद की वफ़ात पर 

निदा फाजली 

 

तुम्हारी  क़ब्र पर

मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया

मुझे मालूम था

तुम मर नहीं सकते

तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थी

वो झूटा था

वो तुम कब थे

कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा था

मिरी आँखें

तुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तक

मैं जो भी देखता हूँ

सोचता हूँ

वो वही है

जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी

कहीं कुछ भी नहीं बदला

तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं

मैं लिखने के लिए

जब भी क़लम काग़ज़ उठाता हूँ

तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँ

बदन में मेरे जितना भी लहू है

वो तुम्हारी

लग़्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता है

मिरी आवाज़ में छुप कर

तुम्हारा ज़ेहन रहता है

मिरी बीमारियों में तुम

मिरी लाचारियों में तुम

तुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा है

वो झूटा है

तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँ

तुम मुझ में ज़िंदा हो

कभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना

000

 

पापा से

डॉ. अरविन्द कुमार पुरोहित

कभी कभी
तुम बहुत याद आते हो
तो खुद को आईने
में देख लेता हूँ
वही चेहरा
नाक नक्श
शक्लो सूरत
इतनी कार्बन कॉपी
कि तुम्हारे
दोस्त
मुझ से न मिलने
की शिकायत करते हैं
जब मैं
उन्हें बताता हूँ
उनकी शिकायत जायज़ है
वो अब नहीं मिलते
चाहते तो होंगें
मिलना
मगर मिल नहीं सकते
आप कहो
तो मैं
मिल लिया करूंगा
माफ़ी मांगते
शर्मिंदा से वे रुखसत
होते हैं
शायद जिस ‘साब ‘
या ‘बास्सा  ‘ की
उन्हें ज़रुरत थी
उसकी झलक
तो मिली
वो खुद नहीं

वही
तकलीफ
मेरी भी है
मैं तुम्हारा
अक्स तो हूँ
तुम नहीं

आईने में खुद मुझे
मेरी आँखों में
मेरे लिए
वह मुहब्बत
नहीं दिखती
न उतना सुकून
ही मिलता है
जो तुम्हारे होने से था

इतना ज़रूर है
तुम्हारा कुछ
मुझ में जिन्दा है
जैसे
मेरा कुछ
तुम्हारे साथ
वफात पा गया

जैसे शेल्फ
में ज़्यादा किताबें
तुम्हारी हैं
ज़ेहन में ख़याल
भी तुम्हारे हैं

बाल तो
आपके
पोते के भी
उड़ गए
और वो भी
जीना चाहता है
ईमानदारी खुद्दारी से

हम सब
आपकी तरह
लेट सोते हैं
देर से उठते हैं
पर ऑफिस
वक्त पर जाते हैं

आपने किसी
भगवान् खुदा को
नहीं माना
न किसी आत्मा को
आप विद्यार्थी आर्ट्स
के थे
माना सदा विज्ञान को

अब क्या कहते हो?
वो कौन है
जो नहीं रहा
वो क्या है
जो रह गया?
कोई चेतना
ऊर्जा
या डीएनए?

तुम मुझ
में जिन्दा हो
मेरे अक्स में
मेरे नक्श में
मेरे रक्स में
फिर भी
आई मिस यू
पापा!

000

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