भजनलाल सरकार में ग्रामीण सड़क निर्माण के बजट पर उठे सवाल; IAS प्रवीण गुप्ता से जुड़े भुगतान विवाद की निष्पक्ष जांच की मांग
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
राजस्थान में ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए आवंटित बजट, निर्माण कार्यों की वास्तविक प्रगति और ठेकेदारों के लंबित भुगतानों को लेकर राजनीतिक विवाद गहराने लगा है। जोधपुर के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2022 और 2023 में कांग्रेस शासन के दौरान ग्रामीण सड़कों के लिए अपेक्षाकृत कम बजट आवंटित हुआ, जबकि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में ग्रामीण सड़क निर्माण के नाम पर बजट में अप्रत्याशित वृद्धि की गई।
कांग्रेस नेता का दावा है कि बजट में भारी वृद्धि के बावजूद जमीनी स्तर पर सभी कार्यों की स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 40 प्रतिशत सड़कें कागजों में ही बन गईं और इसी तरह के मामलों की जानकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी IAS प्रवीण गुप्ता को भी है। नेता ने भुगतान को लेकर सामने आए विवाद को इसी पृष्ठभूमि में देखने की मांग की है।
परियोजना-वार दस्तावेज, अधूरी सड़कों की सूची, कागजी निर्माण का आंकड़ा चौंकाने वाला है.
बजट के आंकड़े क्या बताते हैं?
राजस्थान सरकार के बजट दस्तावेजों में ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग राशि का प्रावधान दर्ज है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:
वित्तीय वर्ष| ग्रामीण सड़क निर्माण से संबंधित बजट प्रावधान
2022-23| ₹150 करोड़
2023-24| ₹300 करोड़
2024-25| ₹4,000 करोड़
2025-26| ₹7,150 करोड़
2026-27| ₹2,000 करोड़
स्रोत: राजस्थान सरकार के संबंधित वर्षों के बजट दस्तावेज। वर्ष 2026-27 की ₹2,000 करोड़ की राशि में नॉन-पैचेबल और मिसिंग लिंक सड़कों के लिए क्रमशः ₹1,400 करोड़ और ₹600 करोड़ का प्रावधान शामिल है।
2024-25 में ₹4,000 करोड़, अगले वर्ष ₹7,150 करोड़
आधिकारिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, वर्ष 2024-25 में ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए ₹4,000 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया था। इस योजना के तहत 13,796 किलोमीटर सड़क विकास का लक्ष्य रखा गया था। दिसंबर 2024 तक उपलब्ध विभागीय विवरण के अनुसार, 5,606 किलोमीटर सड़क का निर्माण ₹3,511.25 करोड़ के व्यय से पूरा किया गया था। इसी अवधि तक 3,030 किलोमीटर लंबाई की 1,043 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई थी, जिनकी अनुमानित लागत ₹2,149.50 करोड़ थी।
वर्ष 2025-26 में ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए ₹7,150 करोड़ का प्रावधान किया गया। यह पिछले वर्ष के ₹4,000 करोड़ के प्रावधान से ₹3,150 करोड़ अधिक था। प्रतिशत के हिसाब से यह लगभग 78.75 प्रतिशत की वृद्धि है।
इतनी बड़ी वृद्धि के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बजट का उपयोग किस गति से हुआ, कितनी सड़कें निर्धारित समय पर बनीं और कितनी परियोजनाओं की गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण कराया गया।
कांग्रेस नेता का दावा—40 प्रतिशत सड़कें कागजों में
जोधपुर के वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार में ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए भारी बजट आवंटित होने के बावजूद बड़ी संख्या में कार्यों की वास्तविक स्थिति संदिग्ध है। नेता के अनुसार, कथित तौर पर लगभग 40 प्रतिशत सड़कें कागजों में बनाकर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सड़क निर्माण का पूरा रिकॉर्ड सही है तो विभाग प्रत्येक स्वीकृत कार्य की लंबाई, निर्माण की स्थिति, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं करता? नेता ने आरोप लगाया कि उन सड़कों की सूची जिनके निर्माण का भुगतान हो चुका है, लेकिन मौके पर सड़क नहीं बनी।
दूसरा, संबंधित कार्यों के कार्यादेश, माप पुस्तिका और भुगतान आदेश। तीसरा, तकनीकी निरीक्षण तथा गुणवत्ता परीक्षण की रिपोर्ट। चौथा, संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों का पक्ष। पांचवां, स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण के निष्कर्ष।
IAS प्रवीण गुप्ता और भुगतान विवाद
राजस्थान PWD में लंबित भुगतानों को लेकर ठेकेदारों और विभागीय अधिकारियों के बीच विवाद सार्वजनिक रूप से सामने आया है। 14 अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जयपुर स्थित PWD मुख्यालय पर ठेकेदारों ने लंबित बिलों के भुगतान को लेकर प्रदर्शन किया और मुख्य गेट पर तालाबंदी की। ठेकेदारों ने वरिष्ठ IAS अधिकारी प्रवीण गुप्ता की कार्यशैली पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि भुगतान की फाइलें लंबे समय से अटकी हुई हैं।
विभाग ने लंबित बिलों और संबंधित शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति को सात दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए जाने की खबर भी प्रकाशित हुई।
यह घटनाक्रम विभाग में भुगतान प्रक्रिया को लेकर असंतोष का संकेत देता है।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया है कि कथित कागजी निर्माण और भुगतान विवाद के बीच संबंध की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विवादित भुगतान किन परियोजनाओं से जुड़े हैं, उन परियोजनाओं का निर्माण कितना हुआ और भुगतान की फाइलें किस स्तर पर लंबित हैं। यदि भुगतान किसी तकनीकी आपत्ति, अधूरे काम, बजट की कमी या आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में रुका है, तो उसकी वजह अलग होगी। यदि काम पूरा होने और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध होने के बावजूद भुगतान लंबित है, तो उस देरी की प्रशासनिक जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
क्या बढ़े हुए बजट का जमीन पर दिखा लाभ?
ग्रामीण सड़कों का महत्व केवल बजट खर्च करने तक सीमित नहीं है। इनसे किसानों को मंडियों तक पहुंचने, विद्यार्थियों को स्कूल-कॉलेज जाने, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और गांवों को बाजारों से जोड़ने में मदद मिलती है। इसलिए सरकार के सामने केवल यह बताने की जिम्मेदारी नहीं है कि कितना बजट आवंटित हुआ, बल्कि यह भी बताना जरूरी है कि उससे कितने गांवों को बेहतर सड़क संपर्क मिला।
यदि किसी परियोजना की लागत बढ़ी है, तो उसका कारण स्पष्ट होना चाहिए। यदि निर्माण में देरी हुई है, तो यह बताया जाना चाहिए कि देरी ठेकेदार की वजह से हुई या प्रशासनिक कारणों से। यदि सड़क बनने के कुछ समय बाद ही क्षतिग्रस्त हो गई, तो गुणवत्ता जांच और दोष दायित्व अवधि के अंतर्गत क्या कार्रवाई हुई, इसका विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए।
इसी प्रकार, जिन परियोजनाओं के भुगतान हो चुके हैं, उनकी भौतिक स्थिति का नमूना-आधारित स्वतंत्र निरीक्षण कराया जा सकता है।
जांच के लिए उदित भास्कर के पांच प्रमुख सवाल
Udit Bhaskar की इस पड़ताल में राजस्थान सरकार और PWD के सामने पांच सवाल महत्वपूर्ण हैं:
1. वर्ष 2022-23 से 2026-27 तक ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए प्रत्येक वर्ष कितना बजट आवंटित हुआ और वास्तविक खर्च कितना रहा?
2. इन पांच वर्षों में कितनी सड़क परियोजनाएं स्वीकृत हुईं, कितनी पूरी हुईं और कितनी अधूरी हैं?
3. कितनी परियोजनाओं में निर्धारित लागत से अधिक भुगतान हुआ और उसके पीछे क्या कारण थे?
4. क्या किसी स्वतंत्र जांच में सड़क निर्माण के भुगतान और मौके पर उपलब्ध निर्माण के बीच अंतर पाया गया?
5. IAS प्रवीण गुप्ता से जुड़े भुगतान विवाद में लंबित बिलों की कुल राशि, देरी के कारण और जांच समिति के निष्कर्ष क्या हैं?
इन सवालों का जवाब मिलने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बजट में वृद्धि के अनुपात में ग्रामीण सड़क निर्माण का वास्तविक लाभ कितना मिला और कहीं सार्वजनिक धन के उपयोग में गंभीर अनियमितताएं तो नहीं हुईं।
राजस्थान में ग्रामीण सड़क निर्माण के बजट में वृद्धि सार्वजनिक धन के उपयोग और उसके परिणामों की समीक्षा को महत्वपूर्ण बनाती है। कांग्रेस नेता का 40 प्रतिशत सड़कें कागजों में बनने का आरोप गंभीर है. इसी तरह, PWD में ठेकेदारों के लंबित भुगतानों का विवाद भी निष्पक्ष जांच की मांग करता है. जनता के पैसे से बनने वाली प्रत्येक सड़क का हिसाब जनता को मिलना चाहिए। बजट, टेंडर, निर्माण और भुगतान—चारों स्तरों पर पारदर्शिता ही इस विवाद की सच्चाई सामने ला सकती है।







