12 साल बाद सूखी गड़ीसर झील को पर्यटन की नई पहचान देने का प्रस्ताव
दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर
स्वर्णनगरी जैसलमेर की ऐतिहासिक गड़ीसर झील को लेकर एक नई पर्यटन परिकल्पना सामने आई है। यदि झील में बारिश की कमी के कारण जलस्तर असाधारण रूप से घटा है और उसका बड़ा हिस्सा सूख गया है, तो इस स्थिति को केवल प्राकृतिक संकट के रूप में देखने के बजाय जल संरक्षण, ऐतिहासिक विरासत, मरु संस्कृति और पर्यटन के समन्वित विकास के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। इसी सोच के साथ उदित भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने जैसलमेर के जिला कलेक्टर के समक्ष दिसंबर 2026 से मई 2027 तक छह महीने का विशेष ‘गड़ीसर मरु एवं विरासत महोत्सव’ आयोजित करने का प्रस्ताव रखने का सुझाव दिया है।
इस प्रस्ताव की मूल भावना यह है कि गड़ीसर झील को केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि जैसलमेर की ऐतिहासिक पहचान, पारंपरिक जल प्रबंधन, लोककलाओं, ग्रामीण खेलों और रेगिस्तान की विशिष्ट जीवनशैली के जीवंत केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। महोत्सव में दिन और रात के पर्यटन के लिए अलग-अलग कार्यक्रम तैयार किए जाएं। देशी और विदेशी पर्यटकों के लिए निर्धारित प्रवेश टिकट, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के टिकट, स्थानीय हस्तशिल्प बाजार तथा अन्य अनुमत पर्यटन गतिविधियों के माध्यम से राजस्व अर्जित करने की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाए।
यह प्रस्ताव अभी एक पर्यटन संबंधी सुझाव और विकास परिकल्पना के रूप में देखा जाना चाहिए। महोत्सव की स्वीकृति, आयोजन की तारीखें, टिकट दरें, बजट और प्रशासनिक व्यवस्थाएं संबंधित सरकारी विभागों के निर्णय तथा व्यवहार्यता अध्ययन पर निर्भर होंगी।
गड़ीसर की चुनौती को अवसर में बदलने की परिकल्पना
जैसलमेर की गड़ीसर झील ऐतिहासिक जल संरचना होने के साथ-साथ शहर के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में शामिल है। इसके आसपास की ऐतिहासिक छतरियां, प्रवेश द्वार, स्थापत्य और मरुस्थलीय परिवेश पर्यटकों को विशिष्ट अनुभव प्रदान करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में झील का जल, उसके किनारे का वातावरण और नौकायन जैसी गतिविधियां इसके आकर्षण का हिस्सा बनती हैं।
यदि किसी वर्ष पर्याप्त वर्षा नहीं होने से झील का जलस्तर बहुत नीचे चला जाए, तो पर्यटन गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में केवल झील में पानी लौटने की प्रतीक्षा करने के बजाय उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक महत्व को सामने लाने वाले कार्यक्रम विकसित करने पर विचार किया जा सकता है।
दिलीप कुमार पुरोहित की प्रस्तावित परिकल्पना के अनुसार, दिसंबर 2026 से मई 2027 तक छह महीने की अवधि में गड़ीसर के आसपास चरणबद्ध पर्यटन गतिविधियां संचालित करने की योजना बनाई जा सकती है। इस अवधि में शीतकालीन पर्यटन, नए वर्ष के दौरान आने वाले सैलानी, वसंत ऋतु और गर्मियों के शुरुआती महीनों को ध्यान में रखकर कार्यक्रमों का कैलेंडर बनाया जा सकता है।
हालांकि, छह महीने का आयोजन लगातार चलने वाले एक ही मेले के रूप में करने के बजाय इसे साप्ताहिक कार्यक्रमों, विशेष उत्सवों, सांस्कृतिक संध्याओं, खेल प्रतियोगिताओं और सीमित अवधि के बड़े आयोजनों में बांटना अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
इससे प्रशासन को भीड़ प्रबंधन, खर्च, सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और पर्यटकों की प्रतिक्रिया के अनुसार योजना में सुधार करने का अवसर मिलेगा।
जिला कलेक्टर के समक्ष पांच आयामों वाली पर्यटन योजना का सुझाव
प्रस्तावित महोत्सव में पांच प्रमुख विचारों को एकीकृत किया जा सकता है।
पहला, राजस्थान की लोकसंस्कृति और पारंपरिक खेलों को सामने लाने वाला मरु मेला। दूसरा, गड़ीसर की ऐतिहासिक स्थापत्य विरासत पर केंद्रित फोटोग्राफी और विरासत पर्यटन। तीसरा, पारंपरिक जल प्रबंधन और जल संरक्षण को समझाने वाला अनुभव केंद्र। चौथा, सुरक्षित स्थानों पर खगोल दर्शन और रात्रिकालीन पर्यटन। पांचवां, स्थानीय नागरिकों, विद्यार्थियों और पर्यटकों की भागीदारी से चलने वाला जल संरक्षण अभियान।
इन सभी गतिविधियों को एक साझा पहचान दी जा सकती है—‘गड़ीसर मरु एवं विरासत महोत्सव 2026-27’।
इस नाम के अंतर्गत पर्यटन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक गतिविधियों का एकीकृत कैलेंडर तैयार किया जा सकता है। आयोजन की ब्रांडिंग में गड़ीसर की ऐतिहासिक पहचान को प्रमुखता दी जाए, न कि केवल झील के सूखने को आकर्षण के रूप में प्रचारित किया जाए।
दिन का पर्यटन: इतिहास, खेल, फोटोग्राफी और मरु संस्कृति
प्रस्ताव में दिन के कार्यक्रमों को इस तरह विकसित करने की परिकल्पना है कि पर्यटक जैसलमेर की विरासत को समझ सकें, पारंपरिक गतिविधियों में भाग ले सकें और स्थानीय लोगों की कला तथा आजीविका से परिचित हो सकें।
1. गड़ीसर हेरिटेज वॉक
सुबह के समय ऐतिहासिक स्थापत्य और झील के आसपास के स्वीकृत मार्गों पर निर्देशित विरासत भ्रमण आयोजित किए जा सकते हैं।
स्थानीय प्रशिक्षित गाइड पर्यटकों को गड़ीसर के इतिहास, उसकी जल व्यवस्था, स्थापत्य और जैसलमेर की सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराएं। भ्रमण के दौरान ऐतिहासिक तथ्यों और स्थानीय लोककथाओं के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए, ताकि पर्यटकों को विश्वसनीय जानकारी मिल सके।
हिंदी और अंग्रेजी के अलावा विदेशी पर्यटकों की मांग के अनुसार अन्य भाषाओं में भी जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।
विरासत भ्रमण के लिए निर्धारित समूह आकार, समय और मार्ग तय किए जाएं। ऐतिहासिक स्मारकों तथा संवेदनशील हिस्सों में अनधिकृत प्रवेश पर रोक होनी चाहिए।
इस गतिविधि से स्थानीय गाइडों, इतिहास के जानकारों, विद्यार्थियों और छोटे पर्यटन व्यवसायों के लिए रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
2. पारंपरिक राजस्थानी खेलों का विशेष मैदान
गड़ीसर महोत्सव की विशिष्टता केवल संगीत और खानपान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें राजस्थान की पारंपरिक खेल संस्कृति को भी प्रमुख स्थान दिया जा सकता है।
प्रशासन और खेल विशेषज्ञों की सहमति से उपयुक्त, सुरक्षित और अस्थायी खेल क्षेत्र में निम्न गतिविधियां आयोजित करने पर विचार किया जा सकता है:
- सात पत्थर: स्थानीय नियमों के अनुसार टीम प्रतियोगिता।
- रस्साकशी: अलग-अलग आयु वर्गों और टीमों के लिए मुकाबले।
- कंचे और गिल्ली-डंडा: सुरक्षित क्षेत्र में पारंपरिक खेलों का प्रदर्शन।
- कबड्डी: प्रशिक्षित निर्णायकों की देखरेख में प्रतियोगिताएं।
- खो-खो: स्थानीय स्कूलों और खेल समूहों की भागीदारी।
- पारंपरिक दौड़ प्रतियोगिताएं: निर्धारित आयु वर्ग और सुरक्षित मैदान के अनुसार।
- लोक खेल प्रदर्शनी: राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित पारंपरिक खेलों का परिचय।
खेलों की अंतिम सूची स्थानीय परंपराओं, उपलब्ध स्थान और सुरक्षा व्यवस्था के आधार पर तय की जानी चाहिए। जहां चोट का जोखिम हो, वहां प्रशिक्षित निर्णायक, प्राथमिक उपचार, पर्याप्त दूरी और आवश्यक सुरक्षा इंतजाम अनिवार्य हों।
स्कूलों, कॉलेजों, ग्रामीण खेल समूहों और स्थानीय संस्थाओं को आमंत्रित कर खेलों को प्रतियोगिता के साथ सांस्कृतिक अनुभव भी बनाया जा सकता है।
विजेताओं को प्रमाणपत्र, स्मृति चिह्न और प्रायोजकों की सहायता से पुरस्कार दिए जा सकते हैं। इससे स्थानीय युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिलेगा।
3. मरु हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पाद बाजार
मेले में जैसलमेर और पश्चिमी राजस्थान के हस्तशिल्प, वस्त्र, कढ़ाई, पारंपरिक सजावटी वस्तुएं, स्थानीय कलाकृतियां और क्षेत्रीय खाद्य उत्पादों के लिए निर्धारित स्टॉल लगाए जा सकते हैं।
स्टॉल आवंटन में स्थानीय कारीगरों, महिला स्वयं सहायता समूहों और छोटे उद्यमियों को प्राथमिकता देने का सुझाव है।
इस बाजार को सामान्य व्यावसायिक मेले से अलग पहचान देने के लिए प्रत्येक स्टॉल पर उत्पाद की उत्पत्ति, उसे बनाने की पारंपरिक विधि और कारीगर का परिचय प्रदर्शित किया जा सकता है।
स्थानीय कारीगरों को डिजिटल भुगतान, पैकेजिंग और ऑनलाइन बिक्री संबंधी जानकारी देने के लिए कार्यशालाएं भी आयोजित की जा सकती हैं।
स्टॉलों की संख्या और स्थान तय करते समय ऐतिहासिक संरचनाओं, पैदल मार्गों और आपातकालीन रास्तों को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
4. गड़ीसर हेरिटेज फोटोग्राफी प्रतियोगिता
गड़ीसर के ऐतिहासिक प्रवेश द्वार, छतरियां और आसपास का स्थापत्य फोटोग्राफी के लिए विशेष आकर्षण प्रस्तुत कर सकते हैं। महोत्सव के अंतर्गत देशी और विदेशी फोटोग्राफरों के लिए प्रतियोगिता आयोजित करने की योजना बनाई जा सकती है।
प्रतियोगिता में चार विषय रखे जा सकते हैं:
- गड़ीसर की ऐतिहासिक विरासत।
- जैसलमेर की लोकसंस्कृति।
- मरुस्थल का प्राकृतिक परिवेश।
- जल संरक्षण और बदलते पर्यावरण की कहानी।
प्रतिभागियों से वास्तविक दृश्य और प्रामाणिक फोटोग्राफी को प्राथमिकता देने का अनुरोध किया जा सकता है। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार चित्रों की श्रेणी रखी जाए, तो उन्हें वास्तविक फोटोग्राफी से स्पष्ट रूप से अलग प्रदर्शित करना होगा।
चयनित तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई जा सकती है। ऑनलाइन प्रतियोगिता और डिजिटल गैलरी के माध्यम से उन लोगों को भी जोड़ा जा सकता है, जो आयोजन के दौरान जैसलमेर नहीं आ सकते।
इस गतिविधि से गड़ीसर की पहचान देश-विदेश के डिजिटल माध्यमों तक पहुंचाने की संभावना है।
जल विरासत केंद्र: सूखी झील को इतिहास और विज्ञान की पाठशाला बनाना
गड़ीसर की पर्यटन योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जल संरक्षण होना चाहिए। यदि झील का जलस्तर कम होने की पुष्टि होती है, तो इस स्थिति को सनसनीखेज प्रचार का विषय बनाने के बजाय जल प्रबंधन को समझने के अवसर के रूप में विकसित किया जा सकता है।
इसके लिए झील के आसपास किसी उपयुक्त, स्वीकृत स्थान पर अस्थायी ‘गड़ीसर जल विरासत अनुभव केंद्र’ स्थापित करने का प्रस्ताव रखा जा सकता है।
इस केंद्र में निम्न विषय शामिल किए जा सकते हैं:
- गड़ीसर का ऐतिहासिक परिचय और उपलब्ध प्रामाणिक दस्तावेज।
- पारंपरिक जल संग्रहण और वर्षा जल संचयन की विधियां।
- राजस्थान की बावड़ियों, तालाबों और अन्य जल संरचनाओं की जानकारी।
- जलग्रहण क्षेत्र का सरल मानचित्र।
- वर्षा और जलस्तर के उपलब्ध आंकड़ों का प्रदर्शन।
- जल संरक्षण में नागरिकों और प्रशासन की भूमिका।
केंद्र में पुराने चित्रों और वर्तमान परिस्थितियों की तुलना करते समय तारीख, स्रोत और उपलब्ध आंकड़ों की विश्वसनीयता स्पष्ट की जानी चाहिए।
विद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए विशेष शैक्षणिक भ्रमण आयोजित किए जा सकते हैं। विद्यार्थी जल संरक्षण के मॉडल तैयार कर सकेंगे और स्थानीय विशेषज्ञों से सवाल पूछ सकेंगे।
इस गतिविधि का उद्देश्य यह संदेश देना होगा कि जलाशय का सूखना केवल पर्यटन की समस्या नहीं, बल्कि जल प्रबंधन, वर्षा और पर्यावरण से जुड़ा विषय भी है।
गड़ीसर के जलस्तर में सुधार के लिए किसी भी निर्माण, खुदाई या अन्य भौतिक हस्तक्षेप से पहले संबंधित विभागों और विशेषज्ञों की अनुमति आवश्यक होगी। पर्यटन गतिविधियों को झील के प्राकृतिक पुनर्भरण और जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण में बाधा नहीं बनना चाहिए।
रात का पर्यटन: लोकसंगीत, रोशनी और मरु आकाश
प्रस्तावित महोत्सव में रात्रिकालीन पर्यटन को विशेष स्थान दिया जा सकता है। हालांकि, रात के कार्यक्रमों की रूपरेखा स्थानीय मौसम, सुरक्षा, प्रकाश व्यवस्था, वन्यजीवों और ऐतिहासिक धरोहर की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए।
1. राजस्थानी लोकसंगीत की सांस्कृतिक संध्या
शाम के समय निर्धारित और अनुमति प्राप्त मंच पर मांड गायन, लोकसंगीत, कठपुतली कला तथा पारंपरिक नृत्यों की प्रस्तुतियां आयोजित की जा सकती हैं।
स्थानीय कलाकारों और लोक संगीतकारों को प्राथमिकता देने से उन्हें नियमित मंच और पारिश्रमिक मिलने की संभावना बढ़ेगी।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राजस्थान की विभिन्न लोक परंपराओं को स्थान दिया जा सकता है। प्रस्तुतियों के साथ कलाकारों और लोककला की संक्षिप्त जानकारी भी दी जाए, ताकि दर्शक केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि उस कला की पृष्ठभूमि भी समझ सकें।
बड़े कार्यक्रमों को सप्ताहांत और विशेष पर्यटन अवसरों पर रखा जा सकता है, जबकि छोटे कार्यक्रम नियमित अंतराल पर आयोजित किए जा सकते हैं।
2. धरोहर पर आधारित प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम
गड़ीसर की ऐतिहासिक पहचान को सामने लाने के लिए सीमित अवधि का प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम विकसित करने पर विचार किया जा सकता है।
इसमें जैसलमेर के इतिहास, पारंपरिक जल व्यवस्था, लोककला और मरुस्थलीय जीवन की कहानी प्रस्तुत की जा सकती है।
हालांकि, किसी भी प्रकाश व्यवस्था को ऐतिहासिक संरचनाओं की सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव के मानकों के अनुरूप होना चाहिए। तेज रोशनी, अत्यधिक ध्वनि और ऐसे उपकरणों से बचना होगा, जो धरोहर या आसपास के जीव-जंतुओं को प्रभावित कर सकते हैं।
प्रस्तुति की पटकथा ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित होनी चाहिए। स्थानीय इतिहासकारों और संबंधित विभागों से तथ्य सत्यापित कराना उपयोगी रहेगा।
3. मरु आकाश दर्शन
जैसलमेर का आकाश खगोल पर्यटन के लिए संभावनाएं प्रस्तुत कर सकता है। महोत्सव में विशेषज्ञों की देखरेख में रात्रिकालीन तारामंडल दर्शन आयोजित करने पर विचार किया जा सकता है।
इसके अंतर्गत दूरबीन से खगोलीय पिंडों का अवलोकन, तारामंडलों की जानकारी और खगोल विज्ञान पर सरल व्याख्यान आयोजित किए जा सकते हैं।
लेकिन झील के सूखे तल को स्वतः रात्रिकालीन आयोजन स्थल मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए भूमि की स्थिति, पहुंच मार्ग, सुरक्षा, धूल, पर्यावरण और संबंधित विभागों की अनुमति का आकलन आवश्यक है।
यदि झील का परिसर उपयुक्त न हो, तो आसपास के किसी स्वीकृत सुरक्षित स्थान का चयन किया जा सकता है।
कार्यक्रम का समय भी मौसम और खगोलीय परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
4. रात्रिकालीन विरासत भ्रमण
विशेष अवसरों पर सीमित समूहों के लिए गाइड के साथ रात्रिकालीन विरासत भ्रमण की संभावना तलाश की जा सकती है।
इसके लिए निर्धारित मार्ग, पर्याप्त सुरक्षा प्रकाश, प्रशिक्षित गाइड, आपातकालीन संपर्क और समूहों की संख्या तय करनी होगी।
ऐसे भ्रमण में ऐतिहासिक इमारतों के भीतर अनधिकृत प्रवेश, ऊंचे या असुरक्षित हिस्सों तक पहुंच और संरक्षित क्षेत्रों में भीड़ से बचना आवश्यक होगा।
रात्रिकालीन पर्यटन को केवल अधिक टिकट बेचने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि पर्यटकों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण अनुभव देने के लिए विकसित किया जाना चाहिए।
देशी और विदेशी पर्यटकों से टिकट: राजस्व का मॉडल
छह महीने के महोत्सव को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए टिकट व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि, गड़ीसर के आसपास प्रवेश शुल्क लगाने से पहले यह स्पष्ट करना होगा कि किस क्षेत्र का प्रबंधन किस विभाग या संस्था के पास है और वहां शुल्क वसूलने की कानूनी अनुमति किसे प्राप्त है।
दिलीप कुमार पुरोहित के प्रस्ताव के अनुसार, जिला प्रशासन संबंधित विभागों के साथ विचार-विमर्श कर एक पारदर्शी टिकट मॉडल तैयार कर सकता है।
इस मॉडल में तीन अलग-अलग श्रेणियां रखी जा सकती हैं।
पहली श्रेणी—सामान्य महोत्सव प्रवेश टिकट: इससे केवल उन निर्धारित आयोजन क्षेत्रों और गतिविधियों में प्रवेश मिले, जिनके लिए शुल्क लगाने की अनुमति प्राप्त हो।
दूसरी श्रेणी—विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम टिकट: बड़े लोकसंगीत कार्यक्रमों, विशेष प्रस्तुतियों या सीमित क्षमता वाले आयोजनों के लिए अलग टिकट रखा जा सकता है।
तीसरी श्रेणी—विशेष अनुभव टिकट: प्रशिक्षित गाइड के साथ विरासत भ्रमण, खगोल दर्शन या विशेष कार्यशालाओं के लिए अलग शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।
इससे पर्यटक अपनी रुचि के अनुसार गतिविधियां चुन सकेंगे और प्रत्येक कार्यक्रम की लागत तथा आय का आकलन अलग-अलग किया जा सकेगा।
संभावित टिकट दरों का प्रारंभिक सुझाव
व्यवहार्यता अध्ययन के लिए निम्न दरों पर विचार किया जा सकता है। ये केवल चर्चा के लिए प्रस्तावित दरें हैं, स्वीकृत सरकारी शुल्क नहीं।
| गतिविधि | भारतीय पर्यटकों के लिए प्रस्तावित दर | विदेशी पर्यटकों के लिए प्रस्तावित दर |
|---|---|---|
| सामान्य महोत्सव क्षेत्र का एक दिन का प्रवेश | ₹50 | ₹150 |
| विरासत भ्रमण | ₹100 | ₹250 |
| विशेष सांस्कृतिक संध्या | ₹100 से ₹300 | ₹200 से ₹500 |
| खगोल दर्शन कार्यक्रम | ₹150 | ₹300 |
| विशेष कार्यशाला या अनुभव | लागत के अनुसार | लागत के अनुसार |
अंतिम दरें आयोजन की लागत, स्थानीय पर्यटन बाजार, भुगतान की क्षमता, अनुमतियों और प्रशासनिक निर्णय के आधार पर तय होनी चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि जिस ऐतिहासिक परिसर में पहले से कोई वैधानिक प्रवेश शुल्क लागू है, वहां नया शुल्क लगाने से पहले दोहरे शुल्क की स्थिति का परीक्षण किया जाए। यदि महोत्सव क्षेत्र के प्रवेश के लिए शुल्क अधिकृत न हो, तो टिकट केवल अलग, स्वीकृत कार्यक्रमों के लिए रखा जा सकता है।
स्थानीय निवासियों, स्कूल समूहों, विद्यार्थियों, दिव्यांग पर्यटकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए रियायती या निःशुल्क प्रवेश की व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है।
टिकट ऑनलाइन और अधिकृत काउंटरों से उपलब्ध कराए जाएं। प्रत्येक टिकट पर गतिविधि, समय, शुल्क और प्रवेश संबंधी शर्तें स्पष्ट हों। राजस्व का हिसाब सार्वजनिक किया जाए और भुगतान की डिजिटल व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए।
छह महीने का संभावित आयोजन कैलेंडर
दिसंबर 2026 से मई 2027 तक की अवधि को अलग-अलग चरणों में बांटने से आयोजन को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सकता है।
दिसंबर 2026: उद्घाटन और विरासत परिचय
पहले महीने में महोत्सव का उद्घाटन, गड़ीसर के इतिहास पर प्रदर्शनी, विरासत भ्रमण, फोटोग्राफी प्रतियोगिता और स्थानीय हस्तशिल्प बाजार शुरू करने का प्रस्ताव रखा जा सकता है।
इस चरण में पर्यटकों की संख्या, स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया, टिकट व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंधन का परीक्षण भी किया जा सकता है।
जनवरी 2027: लोकसंस्कृति और पारंपरिक खेल
जनवरी में लोकसंगीत, कठपुतली, राजस्थानी व्यंजनों, हस्तशिल्प और पारंपरिक खेलों पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
स्कूलों, कॉलेजों, ग्रामीण खेल समूहों और स्थानीय कलाकारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पहले से पंजीकरण की व्यवस्था बनाई जा सकती है।
फरवरी 2027: मरु विरासत और सांस्कृतिक उत्सव
फरवरी में जैसलमेर की ऐतिहासिक पहचान, पारंपरिक कला, लोकनृत्य और मरु जीवन पर आधारित विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की संभावना तलाश की जा सकती है।
यदि शहर में अन्य प्रमुख पर्यटन आयोजन हो रहे हों, तो उनके कैलेंडर के साथ तालमेल रखकर कार्यक्रम तय किए जाएं, ताकि पर्यटकों को एक से अधिक आकर्षणों का अनुभव मिल सके।
मार्च 2027: जल संरक्षण और शैक्षणिक पर्यटन
मार्च में जल विरासत केंद्र, विद्यार्थियों की कार्यशालाएं, पारंपरिक जल प्रबंधन पर संवाद और पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
जल संरक्षण विशेषज्ञों, इतिहासकारों और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी से झील के जलग्रहण क्षेत्र और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर चर्चा आयोजित की जा सकती है।
अप्रैल 2027: फोटोग्राफी और खगोल पर्यटन
अप्रैल में मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होने पर फोटोग्राफी प्रतियोगिता, विरासत प्रदर्शनी और विशेषज्ञों की देखरेख में खगोल दर्शन कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
गर्मी बढ़ने की स्थिति में दिन के खुले कार्यक्रमों का समय सुबह रखा जाए। दोपहर की गर्मी से बचाव, पेयजल, छाया और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था आवश्यक होगी।
मई 2027: समापन और मूल्यांकन
मई में महोत्सव की प्रमुख उपलब्धियों, चयनित तस्वीरों, स्थानीय कलाकारों और पारंपरिक खेलों के प्रतिभागियों को सम्मानित किया जा सकता है।
समापन से पहले टिकट से प्राप्त आय, आयोजन पर हुए खर्च, स्थानीय रोजगार, पर्यटकों की प्रतिक्रिया और पर्यावरणीय प्रभाव की समीक्षा की जाए।
इस मूल्यांकन के आधार पर यह निर्णय लिया जा सकता है कि अगले पर्यटन सत्र में कौन-सी गतिविधियां जारी रखी जाएं और किनमें सुधार आवश्यक है।
स्थानीय रोजगार और जैसलमेर की अर्थव्यवस्था को लाभ
प्रस्तावित महोत्सव की सफलता का आकलन केवल पर्यटकों की संख्या से नहीं होना चाहिए। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय के अवसर बढ़ाना भी होना चाहिए।
गाइड, लोक कलाकार, हस्तशिल्पी, फोटोग्राफर, आयोजन सहायक, खानपान विक्रेता, वाहन चालक और छोटे पर्यटन व्यवसाय इससे लाभान्वित हो सकते हैं।
हालांकि, वास्तविक रोजगार और आय का अनुमान लगाने के लिए पर्यटकों की संभावित संख्या, टिकट दर, स्टॉल शुल्क, कार्यक्रमों की लागत और स्थानीय बाजार की क्षमता का अध्ययन जरूरी होगा।
स्थानीय विक्रेताओं को उचित स्थान आवंटित किया जाए और स्टॉल शुल्क पारदर्शी रखा जाए। किसी भी ठेके या आयोजन संबंधी खरीद में लागू नियमों का पालन किया जाना चाहिए।
महोत्सव के नाम पर स्थानीय व्यापारियों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए। छोटे कारोबारियों को प्राथमिकता देने के लिए अलग नीति बनाई जा सकती है।
पर्यटन से होने वाली आय का कुछ हिस्सा, नियमानुसार और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी से, विरासत संरक्षण, सफाई, संकेतक बोर्ड, जल संरक्षण जागरूकता और सार्वजनिक सुविधाओं में लगाया जा सकता है।
प्रशासन के सामने प्रमुख चुनौतियां
गड़ीसर महोत्सव की परिकल्पना आकर्षक हो सकती है, लेकिन इसे लागू करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर जरूरी होंगे।
पहला, झील की वास्तविक स्थिति क्या है? जलस्तर, जलग्रहण क्षेत्र और सूखने के कारणों की पुष्टि संबंधित विभागों के उपलब्ध आंकड़ों तथा विशेषज्ञों के अध्ययन से होनी चाहिए।
दूसरा, आयोजन के लिए उपयुक्त स्थान कौन-सा होगा? सूखे तल पर अस्थायी मंच, स्टॉल या भीड़ जुटाने से पहले भूमि की स्थिति, ऐतिहासिक महत्व और पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन जरूरी है।
तीसरा, वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे? आयोजन के संभावित खर्च, प्रायोजन, अधिकृत टिकट आय और प्रशासनिक संसाधनों का विस्तृत बजट बनाया जाए। सरकारी धन का उपयोग संबंधित वित्तीय नियमों के अनुसार ही होना चाहिए।
चौथा, सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी? भीड़ प्रबंधन, अग्नि सुरक्षा, प्राथमिक चिकित्सा, आपातकालीन निकास, पेयजल, स्वच्छता और यातायात नियंत्रण के लिए जिम्मेदारियां निर्धारित की जाएं।
पांचवां, झील के संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? पर्यटन गतिविधियों और जलाशय के दीर्घकालीन संरक्षण के बीच संतुलन सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभागों के बीच समन्वय जरूरी होगा।
इन प्रश्नों पर स्पष्ट योजना तैयार होने के बाद ही आयोजन की अंतिम रूपरेखा और तारीखें घोषित की जानी चाहिए।
उदित भास्कर का सुझाव: पर्यटन के साथ संरक्षण भी हो प्राथमिकता
उदित भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित की ओर से जिला कलेक्टर जैसलमेर के समक्ष विचारार्थ रखे जाने योग्य इस प्रस्ताव का मूल उद्देश्य गड़ीसर झील को अस्थायी पर्यटन आकर्षण तक सीमित रखने के बजाय उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय पहचान को व्यापक स्तर पर सामने लाना है।
दिसंबर 2026 से मई 2027 तक प्रस्तावित छह महीने के महोत्सव में दिन के समय विरासत भ्रमण, फोटोग्राफी, हस्तशिल्प, पारंपरिक खेल और जल संरक्षण संबंधी गतिविधियां आयोजित करने की परिकल्पना है। वहीं शाम और रात में लोकसंगीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, सुरक्षित विरासत भ्रमण और खगोल दर्शन जैसे कार्यक्रमों की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।
देशी और विदेशी पर्यटकों के लिए अलग-अलग टिकट दरों का सुझाव भी इसी योजना का हिस्सा है। लेकिन शुल्क लगाने, आयोजन क्षेत्र निर्धारित करने और राजस्व का उपयोग करने के सभी निर्णय संबंधित प्राधिकरणों की अनुमति तथा लागू नियमों के अनुसार ही किए जाने चाहिए।
इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन पर्यटन विभाग, नगर निकाय, पुरातत्व एवं धरोहर संरक्षण से जुड़े विभागों, स्थानीय कलाकारों, व्यापारिक संगठनों और जल संरक्षण विशेषज्ञों के साथ बैठक कर सकता है। बैठक में महोत्सव की व्यवहार्यता, बजट, आयोजन स्थल, सुरक्षा, टिकट व्यवस्था और स्थानीय रोजगार संबंधी पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।
गड़ीसर की पहचान उसके ऐतिहासिक महत्व और जैसलमेर की जल संस्कृति से जुड़ी है। इसलिए इस प्रस्ताव की सफलता केवल भीड़ जुटाने या टिकट बेचने में नहीं, बल्कि पर्यटकों को गुणवत्तापूर्ण अनुभव देने, स्थानीय अर्थव्यवस्था को अवसर उपलब्ध कराने और ऐतिहासिक जल संरचना के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में निहित होगी।







