18 साल पहले 216 मौतें हुई, 15 वर्ष बाद भी चोपड़ा आयोग की रिपोर्ट क्यों बंद है? राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश से न्याय, पारदर्शिता और सत्य के लिए हस्तक्षेप की अपील
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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सरकारें बदलती गई, सच सामने नहीं आया, क्यों?

माननीय श्री न्यायमूर्ति संजय कुमार अग्रवाल
मुख्य न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय
जोधपुर
विषय : मेहरानगढ़ चामुंडा माता मंदिर हादसे की न्यायिक जांच के लिए गठित जस्टिस जसराज चोपड़ा आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक कराने के संबंध में जनहित की मार्मिक अपील।
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
सादर प्रणाम।
मैं दिलीप कुमार पुरोहित, ग्रुप एडिटर, उदित भास्कर, यह पत्र केवल एक पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा को महसूस करने वाले एक नागरिक के रूप में लिख रहा हूं, जिनके घरों के दीपक 30 सितंबर 2008 को मेहरानगढ़ की पहाड़ी पर स्थित मां चामुंडा माता मंदिर में हुई भयावह भगदड़ में बुझ गए थे। वह घटना राजस्थान के इतिहास का ऐसा काला अध्याय है, जिसे समय की धूल में दबा देना संभव नहीं होना चाहिए। हजारों लोग नवरात्रि के पहले दिन मां के दर्शन के लिए पहुंचे थे। देखते ही देखते श्रद्धा का वह सैलाब त्रासदी में बदल गया। 216 लोगों की मौत हुई। इनमें बड़ी संख्या युवाओं की थी। राजस्थान ने एक साथ इतने परिवारों को उजड़ते देखा।ले किन इस त्रासदी का सबसे पीड़ादायक अध्याय शायद वह नहीं था कि इतने लोग मारे गए। सबसे पीड़ादायक अध्याय यह है कि आज 18 वर्ष बाद भी उन मौतों की जिम्मेदारी का पूरा सच जनता के सामने नहीं है। और यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि इस घटना की जांच के लिए सरकार ने स्वयं एक न्यायिक आयोग गठित किया था।
आयोग बना, जांच हुई, रिपोर्ट भी आई—फिर रिपोर्ट गई कहां?
30 सितंबर 2008 की इस त्रासदी के बाद तत्कालीन भाजपा की वसुंधरा सरकार ने अक्टूबर 2008 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस जसराज चोपड़ा की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया था। आयोग को घटना के कारणों की जांच करने और जिम्मेदारी तय करने का दायित्व दिया गया था। उसे प्रारंभिक रूप से तीन माह में रिपोर्ट देनी थी, लेकिन उसे छह बार समय-विस्तार मिला। अंततः आयोग ने मई 2011 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंप दी।
अर्थात एक बात निर्विवाद है—
रिपोर्ट बनी।
रिपोर्ट सरकार को मिली।
रिपोर्ट में हादसे की जांच हुई।
लेकिन रिपोर्ट जनता के सामने नहीं आई। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर जांच नहीं हुई होती तो अलग बात थी। अगर रिपोर्ट तैयार नहीं हुई होती तो अलग बात थी। अगर रिपोर्ट सरकार तक पहुंची ही नहीं होती तो अलग बात थी। लेकिन जब एक न्यायिक जांच आयोग अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुका है, तब आखिर ऐसी कौन-सी दीवार है जिसके पीछे उस रिपोर्ट को वर्षों से बंद रखा गया है?
क्या 216 मौतों का सच जानना जनता का अधिकार नहीं?
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, मैं आपसे कुछ सीधे सवाल पूछना चाहता हूं। क्या मेहरानगढ़ हादसे का पूरा सच कभी सामने आएगा? क्या उन 216 मृतकों के परिवारों को कभी यह पता चलेगा कि उनके अपनों की मौत के लिए किस स्तर पर चूक हुई थी? क्या यह पता चलेगा कि भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था में कहां कमी थी? क्या प्रशासनिक व्यवस्था में कोई खामी थी? क्या मंदिर प्रबंधन की कोई भूमिका थी? क्या पुलिस की व्यवस्था पर्याप्त थी? क्या रास्ते, बैरिकेडिंग, बिजली, प्रवेश और निकास व्यवस्था में ऐसी कमियां थीं जिनसे हादसा भयावह बना? और यदि किसी स्तर पर जिम्मेदारी निर्धारित की गई थी, तो वह जिम्मेदारी सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए? इन सवालों का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना नहीं है। दोष तय करना न्यायिक प्रक्रिया का विषय है। लेकिन सच जानने का अधिकार समाज का विषय है।
क्या मृतकों को इसलिए भुला दिया जाए कि समय बीत गया?
18 वर्ष कोई छोटी अवधि नहीं होती। जिस बच्चे या युवा की मृत्यु 30 सितंबर 2008 को हुई होगी, उसके माता-पिता आज वृद्ध हो चुके होंगे। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को उस दिन दर्शन के लिए भेजा होगा, उनके जीवन का वह सबसे बड़ा प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। कितने परिवारों ने वर्षों तक यह प्रश्न अपने भीतर दबाकर रखा होगा—“आखिर हमारे बच्चे की मौत कैसे हुई?” कितने माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं होंगे। कितने भाई-बहन बूढ़े हो चुके होंगे। लेकिन एक प्रश्न वही है—मेहरानगढ़ का सच कहां है? क्या केवल इसलिए कि पीड़ित परिवार वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा करते-करते थक गए, समाज भी थक जाए? क्या समय बीत जाने से जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? क्या किसी त्रासदी की तारीख कैलेंडर से हट जाने पर उसका नैतिक और संवैधानिक प्रश्न भी समाप्त हो जाता है?
रिपोर्ट पर सरकारें बदलती रहीं, लेकिन ताला नहीं खुला
इस प्रकरण का एक और पक्ष लोकतंत्र को असहज करने वाला है। जब आयोग की रिपोर्ट मई 2011 में सरकार को मिली, उस समय राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। उसके बाद भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार आई, फिर कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार और दिसंबर 2023 से भाजपा की भजनलाल शर्मा सरकार सत्ता में है। अर्थात रिपोर्ट आने के बाद सत्ता के तीन परिवर्तन हो चुके हैं और अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें राजस्थान पर शासन कर चुकी हैं, लेकिन रिपोर्ट अब भी सार्वजनिक नहीं हुई। 2017 और 2018 में राजस्थान हाईकोर्ट ने भी सरकार से पूछा था कि रिपोर्ट छह-सात वर्ष बाद भी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। 2019 में हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को बंद लिफाफे में पेश करने का निर्देश दिया था। सरकार की ओर से यह तर्क सामने आया था कि रिपोर्ट सार्वजनिक करने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। माननीय महोदय, यहीं लोकतंत्र का एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या किसी रिपोर्ट को इसलिए अनंतकाल तक रोका जा सकता है कि उसके सार्वजनिक होने से कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है? यदि ऐसी आशंका वास्तविक है तो उसका समाधान क्या है? क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और प्रशासन का दायित्व नहीं है? क्या सामाजिक सौहार्द की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी नहीं है? क्या संभावित असहमति या तनाव के डर से किसी सार्वजनिक त्रासदी के सत्य को हमेशा के लिए दबा देना उचित होगा?
सामाजिक सौहार्द सच छिपाने से नहीं, न्याय से मजबूत होता है
सरकारों द्वारा समय-समय पर सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था का तर्क दिया गया है। लेकिन एक नागरिक के रूप में मेरा विनम्र प्रश्न है—क्या सामाजिक सौहार्द का अर्थ सत्य को छिपाना है? यदि किसी रिपोर्ट में किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है, तो उसका निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए। यदि किसी पर कोई दोष नहीं है, तो रिपोर्ट सार्वजनिक होने से वह निर्दोषता भी सामने आएगी। यदि प्रशासन की भूमिका उचित थी, तो उसका रिकॉर्ड सामने आएगा। यदि व्यवस्था में खामी थी, तो भविष्य के लिए सुधार का रास्ता खुलेगा। और यदि किसी की लापरवाही सामने आती है, तो कानून अपना रास्ता तय कर सकता है। लेकिन सत्य को अनिश्चितकाल तक बंद रखने से न दोष सिद्ध होता है, न निर्दोषता। केवल संदेह बचता है। और लोकतंत्र में लंबे समय तक कायम रहने वाला संदेह स्वयं एक गंभीर समस्या बन जाता है।
क्या दोषी पक्षकारों की मृत्यु के बाद रिपोर्ट सार्वजनिक होगी?
एक और असहज लेकिन जरूरी प्रश्न है—क्या रिपोर्ट तब सार्वजनिक होगी, जब इस घटना से जुड़े सभी संभावित जिम्मेदार पक्षकार इस दुनिया में नहीं रहेंगे? यदि ऐसा हुआ तो यह न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवारों के साथ कैसी विडंबना होगी? कानून का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को दंडित करना नहीं है। कानून का उद्देश्य सत्य की स्थापना, जिम्मेदारी का निर्धारण और भविष्य में ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकना भी है। जस्टिस चोपड़ा आयोग ने केवल हादसे की जांच ही नहीं की थी, बल्कि बड़े धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े सुझाव भी दिए थे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने मजबूत पुलिसिंग, यातायात और प्रशासनिक नियंत्रण, मंदिर प्रबंधन और प्रशासन के बेहतर समन्वय तथा मेलों के सुरक्षित आयोजन से जुड़े सुझाव दिए थे। तो फिर सवाल यह है—यदि रिपोर्ट में भविष्य के लिए उपयोगी सुरक्षा उपाय भी हैं, तो उसे सार्वजनिक करने में इतनी लंबी देरी क्यों?
न्यायालय ने पहले भी सरकार से जवाब मांगा है
यह मामला ऐसा नहीं है जिस पर न्यायपालिका का ध्यान कभी गया ही नहीं। राजस्थान हाईकोर्ट ने 2017 में सरकार से पूछा था कि जस्टिस चोपड़ा आयोग की रिपोर्ट छह वर्ष बीतने के बाद भी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। 2018 में भी हाईकोर्ट ने सरकार से रिपोर्ट पर की गई कार्रवाई का विवरण मांगा था। 2019 में रिपोर्ट बंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई। इसका अर्थ यह है कि यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं है; यह वर्षों से न्यायिक विमर्श का हिस्सा रहा है।
आगामी नवरात्रि से पहले क्या सच का दरवाजा खुल सकता है?
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, नवरात्रि फिर सामने है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी राजस्थान के मंदिरों में लाखों श्रद्धालु जाएंगे। मेहरानगढ़ की चामुंडा माता के दरबार में भी श्रद्धालु जाएंगे। घंटियां बजेंगी। जयकारे लगेंगे। मां के दरबार में आस्था उमड़ेगी। लेकिन उसी पहाड़ी पर 30 सितंबर 2008 की वह चीख भी इतिहास में दर्ज है, जिसमें 216 लोग हमेशा के लिए चले गए। क्या इस नवरात्रि से पहले राजस्थान उन परिवारों से यह कह सकता है—“हम आपके दर्द को भूले नहीं हैं।” क्या इस नवरात्रि से पहले सरकार और न्याय व्यवस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि वर्षों से बंद रिपोर्ट का कानूनी परीक्षण पूरा हो और जो कुछ सार्वजनिक किया जाना विधिसम्मत है, वह जनता के सामने आए? मैं माननीय उच्च न्यायालय से किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने का आग्रह नहीं कर रहा हूं। मैं केवल यह आग्रह कर रहा हूं कि—सत्य सामने आए। जिम्मेदारी स्पष्ट हो। कानून अपना काम करे। और पीड़ित परिवारों को यह महसूस हो कि राज्य ने उन्हें भुलाया नहीं है।
राजनीति से ऊपर उठकर पीड़ितों को देखना होगा
इस पूरे मामले में सबसे दुखद बात यह है कि रिपोर्ट अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में रही, लेकिन पीड़ित परिवारों की प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं। राजनीतिक दल बदलते हैं। मुख्यमंत्री बदलते हैं। मंत्रिमंडल बदलते हैं। अधिकारी बदलते हैं। लेकिन मृतकों की स्मृति नहीं बदलती। उनके परिवारों का दर्द नहीं बदलता। उनका सवाल नहीं बदलता। इसलिए यह मामला कांग्रेस बनाम भाजपा का नहीं होना चाहिए। यह मामला किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष का नहीं होना चाहिए। यह मामला राज्य बनाम पीड़ितों का भी नहीं होना चाहिए। यह मामला होना चाहिए—सत्य बनाम मौन।
माननीय मुख्य न्यायाधीश से मेरी विनम्र लेकिन दृढ़ अपील
माननीय महोदय, मैं आपसे आग्रह करता हूं कि मेहरानगढ़ चामुंडा माता हादसे की चोपड़ा आयोग रिपोर्ट के संबंध में उपलब्ध न्यायिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड का परीक्षण कर इस विषय में उचित विधिसम्मत दिशा-निर्देश देने पर विचार किया जाए। यदि रिपोर्ट सार्वजनिक करने में कोई वैधानिक बाधा है तो वह भी स्पष्ट हो। यदि रिपोर्ट के किसी हिस्से को सार्वजनिक करने में वास्तविक और प्रमाणित कानूनी कठिनाई है तो उस हिस्से पर कानून के अनुसार निर्णय हो। लेकिन पूरे दस्तावेज को वर्षों तक अंधेरे में रखना क्या उचित है—इस प्रश्न पर एक स्पष्ट न्यायिक दृष्टि राजस्थान की जनता को मिलनी चाहिए। मैं यह भी आग्रह करता हूं कि आगामी नवरात्रि से पहले इस मामले में ऐसी न्यायिक पहल पर विचार हो, जिससे 2008 की उस त्रासदी का सत्य और आयोग की सिफारिशें विधिसम्मत सीमा में सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन सकें। क्योंकि कभी-कभी न्याय केवल सजा का नाम नहीं होता। कभी-कभी न्याय का पहला कदम होता है—सच को सामने आने देना।
216 दीपक फिर जलाने होंगे
30 सितंबर 2008 को 216 परिवारों के जीवन में अंधेरा उतर आया था। आज 18 वर्ष बाद हम उन मृतकों को वापस नहीं ला सकते। जो युवा उस दिन चले गए, वे वापस नहीं आएंगे। जो माता-पिता अपने बच्चों की अर्थियां उठाकर लौटे, उनके जीवन की वह पीड़ा वापस नहीं ली जा सकती। लेकिन राज्य कम से कम इतना तो कर सकता है कि उनके जाने का सच इतिहास के अंधेरे में न रहे। उनकी मौत किसी आंकड़े में सिमटकर न रह जाए। उनके परिवारों की प्रतीक्षा अनंत न हो। और आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि उस दिन क्या हुआ था, क्यों हुआ था और उससे राजस्थान ने क्या सीखा। 216 मौतें केवल 216 आंकड़े नहीं हैं। वे 216 अधूरे जीवन हैं। वे सैकड़ों परिवारों की अधूरी कहानियां हैं।वे हजारों लोगों की सामूहिक स्मृति हैं। और वे राजस्थान की व्यवस्था से आज भी एक प्रश्न पूछ रहे हैं—“हमारे जाने का सच क्या था?” माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, इस प्रश्न का उत्तर शायद किसी एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरी राजस्थान की आत्मा को चाहिए। इसलिए मेरी आपसे विनम्र लेकिन दृढ़ प्रार्थना है—मेहरानगढ़ की चुप्पी को हमेशा के लिए चुप्पी मत बनने दीजिए। चोपड़ा आयोग की रिपोर्ट को इतिहास की बंद अलमारी में पड़े दस्तावेज से आगे बढ़ाकर न्याय, पारदर्शिता और जनहित के विमर्श में लाइए। सच को सामने आने का अवसर दीजिए। क्योंकि सरकारें बदल सकती हैं, सत्ता बदल सकती है, राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं—लेकिन न्याय की आवश्यकता कभी पुरानी नहीं होती। और शायद इस नवरात्रि में मां चामुंडा के दरबार में जाने वाले लाखों श्रद्धालुओं के मन में एक नई प्रार्थना हो—“हे मां, जिन 216 आत्माओं ने यहां प्राण गंवाए, उनके परिवारों को कम से कम सच का प्रकाश मिले।” यही लोकतंत्र की गरिमा है। यही कानून के शासन की कसौटी है। और यही उन 216 मृतकों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सादर,
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर
उदित भास्कर
जोधपुर, राजस्थान








