मशहूर एक्टर इरफान खान कैंसर का इलाज करवाने जा रहे थे, एयरपोर्ट से उन्होंने खिड़कियां कहानी संग्रह के लिए मार्मिक संदेश भेजा, वो मेरे जेहन में आज भी ताजा है, यही एक लेखक की उपलब्धि : दिलीप केसानी

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मेरा सपना है कि मैं साहित्य के माध्यम से कुछ ऐसा रच सकूँ, जो समय के साथ पुराना न हो, और युवाओं के लिए भी कुछ ऐसा कर सकूँ जिससे उन्हें सही दिशा और आगे बढ़ने का अवसर मिले। आखिरकार, इंसान की असली विरासत उसकी संपत्ति या पद नहीं, बल्कि वे भावनाएँ और अच्छे बदलाव हैं, जो वह दूसरों के जीवन में छोड़ जाता है।

मेरे लिए साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, संघर्षों, रिश्तों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। मैंने हमेशा महसूस किया है कि तकनीक हमें बेहतर साधन दे सकती है, लेकिन उन साधनों का उपयोग किस उद्देश्य से करना है, यह हमारी मानवीय चेतना तय करती है। मेरे लिए सफलता केवल तार्किक रूप से सही होना नहीं, बल्कि मानवीय रूप से संवेदनशील बने रहना भी है। मैं चाहता हूँ कि मेरे भीतर का पेशेवर मेरे भीतर के लेखक को अनुशासन दे और मेरे भीतर का लेखक मेरे पेशेवर जीवन को संवेदना। अगर मैं इन दोनों के बीच संतुलन बना पाता हूँ, तो यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

जब आदरणीय ज़फ़र ख़ान सिंधी साहब हमें छोड़कर चले गए। नगर प्रभा ने उन पर विशेषांक निकालने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी। उनके जाने के बाद उनकी यादों, उनसे जुड़े लेखों और पत्रों को सँजोते हुए संपादकीय लिखना ऐसा अनुभव था, मानो हर शब्द के साथ मैं उनसे दोबारा रूबरू हो रहा हूँ। दूसरा कठिन दौर तब आया, जब मैंने अपनी माताजी को खो दिया। इस घटना ने मुझे भीतर से तोड़ दिया था, लेकिन क्लास में बच्चों के सामने पहले की तरह सामान्य रहना मेरी मजबूरी भी थी और ज़िम्मेदारी भी। इसके कुछ समय बाद मैंने अपने सबसे करीबी मित्र और अपने गीतों के संगीतकार कुलदीप माथुर को भी खो दिया। उनके निधन के दिन भी मैंने बच्चों की क्लास ली। उस समय मेरे भीतर क्या चल रहा था, यह शायद वही समझ सकता है जिसने ऐसे दर्द के बीच अपनी जिम्मेदारियाँ निभाई हों।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 uditbhaskarnews@gmail.com

बियोंड द फेस। इस प्रोग्राम के लिए उदित भास्कर कार्यालय में एक विशिष्ट हस्ती पहुंची। जी हां यह विशिष्ट हस्ती मशहूर गीतकार है और उपन्यासकार होने के साथ प्रखर लेखक हैं। आप उदित भास्कर प्राइवेट लिमिटेड के तकनीकी सलाहकार भी हैं। आपका परिचय प्रोग्राम के अंत में विस्तार से दिया गया है। अब पाठकों के बीच अवरोध न बनते हुए सीधे विषय में प्रवेश करते हैं और इस विशिष्ट हस्ती श्री दिलीप केसानी से बातचीत करते हैं।

1- दिलीप जी, आपकी पहचान एक ओर 18 वर्षों से कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान का संचालन करने वाले पेशेवर की है, तो दूसरी ओर आप 10 पुस्तकें लिख चुके हैं और 50 से अधिक गीतों में आपका योगदान रहा है। कंप्यूटर की तार्किक दुनिया और साहित्य की भावनात्मक दुनिया—इन दोनों के बीच आप अपने भीतर कैसे संतुलन बनाते हैं? क्या कभी ऐसा हुआ कि दिल ने कुछ और कहा और दिमाग ने कुछ और?

उत्तर :  मेरे लिए कंप्यूटर और साहित्य दो अलग-अलग दुनियाएं नहीं, बल्कि जीवन
को समझने के दो अलग-अलग माध्यम हैं। कंप्यूटर ने मुझे तर्क करना, समस्याओं का समाधान खोजना और हर परिस्थिति को व्यवस्थित ढंग से देखना सिखाया है, जबकि साहित्य ने मुझे संवेदनशील होना, मानवीय भावनाओं को समझना और उन अनकहे एहसासों को शब्द देना सिखाया है, जिन्हें अक्सर इंसान अपने भीतर ही दबाकर रख लेता है। पिछले 18 वर्षों से कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान का संचालन करते हुए मैंने तकनीक के साथ-साथ युवाओं के सपनों, उनकी चुनौतियों और उनकी संभावनाओं को भी करीब से देखा है। वहीं, लेखन ने मुझे जीवन के उन पहलुओं तक पहुँचाया, जिन्हें केवल तर्क के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

मेरे लिए कंप्यूटर दिमाग को प्रशिक्षित करता है और साहित्य हृदय को समृद्ध बनाता है।
जहाँ तक दिल और दिमाग के बीच टकराव की बात है, तो ऐसा जीवन में कई बार हुआ है। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी आईं, जब दिमाग ने व्यावहारिक होने की सलाह दी, लेकिन दिल ने मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया। मेरा मानना है कि जीवन में हर निर्णय केवल भावनाओं से नहीं लिया जा सकता, लेकिन हर निर्णय से भावनाओं को बाहर भी नहीं रखा जा
सकता। इसलिए मैं कोशिश करता हूँ कि दिमाग मुझे सही रास्ता दिखाए और दिल यह तय करने में मदद करे कि उस रास्ते पर चलते हुए मुझे अपनी मानवीयता नहीं खोनी है। शायद यही संतुलन मेरी लेखनी में भी दिखाई देता है। मेरे लिए साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, संघर्षों, रिश्तों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। मैंने हमेशा महसूस किया है कि तकनीक हमें बेहतर साधन दे सकती है, लेकिन उन साधनों का उपयोग किस उद्देश्य से करना है, यह हमारी मानवीय चेतना तय करती है। मेरे लिए सफलता केवल तार्किक रूप से सही होना नहीं, बल्कि मानवीय रूप से संवेदनशील बने रहना भी है। मैं चाहता हूँ कि मेरे भीतर का पेशेवर मेरे भीतर के लेखक को अनुशासन दे और मेरे भीतर का लेखक मेरे पेशेवर जीवन को संवेदना। अगर मैं इन दोनों के बीच संतुलन बना पाता हूँ, तो यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

2. किसी संस्थान को 18 वर्षों तक चलाना केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और लगातार बदलती परिस्थितियों से मुकाबला करना भी है। इस लंबे सफर में ऐसा कौन-सा दौर आया, जब बाहर से सब सामान्य दिख रहा था, लेकिन भीतर आप किसी बड़ी चुनौती से जूझ रहे थे? उस अनुभव ने आपको क्या सिखाया?

उत्तर :  मेरे जीवन में कई ऐसे दौर आए, जब बाहर से सब सामान्य दिखता था, लेकिन भीतर मैं आर्थिक और व्यक्तिगत चुनौतियों से जूझ रहा था। ऐसे समय में भी संस्थान की जिम्मेदारियाँ निभाना और विद्यार्थियों के भविष्य पर ध्यान देना मेरे लिए जरूरी था। मेरे जीवन में दो ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने मुझे भीतर तक प्रभावित किया। पहला, जब आदरणीय ज़फ़र ख़ान सिंधी साहब हमें छोड़कर चले गए। नगर प्रभा ने उन पर विशेषांक निकालने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी। उनके जाने के बाद उनकी यादों, उनसे जुड़े लेखों और पत्रों को सँजोते हुए संपादकीय लिखना ऐसा अनुभव था, मानो हर शब्द के साथ मैं उनसे दोबारा रूबरू हो रहा हूँ। दूसरा कठिन दौर तब आया, जब मैंने अपनी माताजी को खो दिया। इस घटना ने मुझे भीतर से तोड़ दिया था, लेकिन क्लास में बच्चों के सामने पहले की तरह सामान्य रहना मेरी मजबूरी भी थी और ज़िम्मेदारी भी। इसके कुछ समय बाद मैंने अपने सबसे करीबी मित्र और अपने गीतों के संगीतकार कुलदीप माथुर को भी खो दिया। उनके निधन के दिन भी मैंने बच्चों की क्लास ली। उस समय मेरे भीतर क्या चल रहा था, यह शायद वही समझ सकता है जिसने ऐसे दर्द के बीच अपनी जिम्मेदारियाँ निभाई हों। इन अनुभवों ने मुझे सिखाया कि इंसान का सबसे गहरा संघर्ष अक्सर वह
होता है, जिसे दुनिया देख नहीं पाती। इस सफर ने मुझे सिखाया कि धैर्य का अर्थ कठिनाइयों का न होना नहीं, बल्कि उनके बीच भी अपनी जिम्मेदारियों और मूल्यों पर कायम रहना है। मैंने
जाना कि हर संघर्ष हमें कुछ नया सिखाता है और हर मुश्किल के बाद आगे बढ़ने की एक नई वजह मिल सकती है।

3. आप कंप्यूटर प्रशिक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं पहला और युवाओं के साथ काम करने का अनुभव भी रखते हैं। आज जब तकनीक तेजी से बदल रही है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पारंपरिक नौकरियों के स्वरूप को बदल रहा है, तो आप युवाओं को क्या सलाह देंगे? क्या भविष्य में डिग्री से अधिक महत्व हुनर, रचनात्मकता और सीखते रहने की क्षमता का होगा?

उत्तर :  मेरी युवाओं को यही सलाह है कि डिग्री ज़रूर हासिल करें, लेकिन उसके साथ हुनर और सीखने की ललक भी विकसित करें। पिछले 18 वर्षों से कंप्यूटर प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करते हुए मैंने महसूस किया है कि केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं है; युवाओं के लिए व्यावहारिक ज्ञान, रचनात्मकता और बदलती तकनीक के साथ खुद को अपडेट रखना भी बेहद ज़रूरी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को खतरे के बजाय एक अवसर के रूप में देखना
चाहिए। जो युवा इसका सही उपयोग करना सीखेंगे, अपनी सोचने-समझने की क्षमता विकसित करेंगे और लगातार नया सीखते रहेंगे, वे भविष्य की चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकेंगे।
मेरे विचार से डिग्री आपको अवसर तक पहुँचा सकती है, लेकिन आपका हुनर, आपकी रचनात्मकता और सीखते रहने की क्षमता आपको आगे बढ़ाती है।

4. आप श्री जागृति संस्थान में चार वर्ष सचिव और दो वर्ष अध्यक्ष रहे हैं। युवाओं के बीच काम करते हुए आपने उनकी आकांक्षाओं, उलझनों और बदलती सोच को करीब से देखा होगा। क्या आज के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या अवसरों की कमी है, दिशा का अभाव है या धैर्य की कमी? और क्या समाज वास्तव में युवाओं को समझ रहा है, या केवल उन्हें उपदेश दे रहा है?

उत्तर  श्री जागृति संस्थान में चार वर्ष सचिव और दो वर्ष अध्यक्ष रहते हुए मुझे युवाओं के बीच काम करने और उन्हें करीब से समझने का अवसर मिला। मेरे विचार से युवाओं की समस्या केवल अवसरों की कमी नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन और अपनी क्षमताओं को पहचानने की भी है। कई युवा प्रतिभाशाली होते हैं, लेकिन उन्हें सही दिशा और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। श्री जागृति संस्थान में चार वर्ष सचिव और दो वर्ष अध्यक्ष रहते हुए मुझे युवाओं के बीच काम करने और उन्हें करीब से समझने का अवसर मिला। मेरे विचार से युवाओं की समस्या केवल अवसरों की कमी नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन और अपनी क्षमताओं को पहचानने की भी है। कई युवा प्रतिभाशाली होते हैं, लेकिन उन्हें सही दिशा और प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। मुझे लगता है कि समाज युवाओं को सलाह तो बहुत देता है, लेकिन उनकी बात सुनने और उनकी परिस्थितियों को समझने का धैर्य कम दिखाता है। युवाओं को उपदेश से ज्यादा विश्वास, मार्गदर्शन और अवसरों की जरूरत है। जब हम उन्हें सुनना शुरू करेंगे, तभी वास्तव में उनकी समस्याओं को समझ पाएँगे। मुझे लगता है कि समाज युवाओं को सलाह तो बहुत देता है, लेकिन उनकी बात सुनने और उनकी परिस्थितियों को समझने का धैर्य कम दिखाता है। युवाओं को उपदेश से ज्यादा विश्वास, मार्गदर्शन और अवसरों की जरूरत है। जब हम उन्हें सुनना शुरू करेंगे, तभी वास्तव में उनकी समस्याओं को समझ पाएँगे।

5. आपने दस पुस्तकें प्रकाशित की हैं और 50 से अधिक व्यावसायिक रूप से जारी गीतों में योगदान दिया है। जब कोई रचना पाठक या श्रोता तक पहुंचती है, तो लेखक को प्रसिद्धि मिल सकती है; लेकिन रचना लिखते समय उसके भीतर कौन-सी भावना सबसे प्रबल होती है—अपनी बात कहने की बेचैनी, समाज को बदलने की इच्छा या अपने अनुभवों को अमर करने का प्रयास? आपकी अब तक की कौन-सी रचना आपके दिल के सबसे करीब है और क्यों?

उत्तर :  मेरे लिए लेखन प्रसिद्धि पाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर की आवाज़ को अभिव्यक्त करने का जरिया है। कभी कोई अनुभव लिखने के लिए बेचैन करता है, तो कभी समाज की कोई विसंगति या किसी का दर्द शब्दों में उतरने लगता है। मैं मानता हूँ कि रचना का असली उद्देश्य पाठक या श्रोता के दिल तक पहुँचना है। एक लेखक के रूप में तीन ऐसे किस्से हैं, जो हमेशा मेरे दिल के करीब रहेंगे। पहली घटना तब की है, जब पॉकेट FM पर मेरी कहानी पढ़ने के बाद एक अनजान पाठक का ईमेल आया। उसने न केवल मेरी कहानी की तारीफ़ की,
बल्कि उसके कई ऐसे बारीक पहलुओं का ज़िक्र किया, जिन्हें पढ़कर मैं खुद भी हैरान रह गया। उसने मुझे पॉकेट FM के लिए और लिखने का आग्रह भी किया। इसी तरह, एक दिन एक अनजान पाठक का फोन आया, जिसने मेरी पुस्तक खिड़कियाँ पढ़ी थी। उसने किताब की दसों कहानियों का इतनी बारीकी से ज़िक्र किया कि मुझे एहसास हुआ कि मेरी रचनाएँ अनजान लोगों के दिलों तक भी पहुँच रही हैं। एक लेखक के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है! तीसरा किस्सा खिड़कियाँ के प्रकाशन के समय का है। किताब छपने के लिए तैयार थी, तभी जोधपुर के जाने-माने चिकित्सक डॉ. श्री साजिद निसार साहब ने मुझसे कहा, “तुम कहो तो हम इरफ़ान ख़ान साहब से बात करें। वे तुम्हारी किताब के लिए अपना संदेश भेज देंगे।” मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी, इसलिए मैंने हामी भर दी। डॉ. साहब ने मेरे सामने ही इरफ़ान ख़ान साहब को फोन किया। उस समय इरफ़ान साहब ने बताया कि उन्हें कैंसर का पता चला है, वे इलाज के लिए
विदेश जा रहे हैं और इस वक्त हवाई अड्डे पर हैं। मुझे लगा कि ऐसी परिस्थिति में शायद संदेश मिल पाना संभव नहीं होगा। लेकिन मैं हैरान रह गया, जब महज़ पंद्रह मिनट के भीतर उनका संदेश आ गया। इसके बाद उन्होंने फोन करके डॉ. साहब से यह भी पूछा कि संदेश ठीक है या वे दूसरा भेजें। सोचिए, एक व्यक्ति अपनी ज़िंदगी के इतने कठिन दौर से गुजर रहा हो और उस समय भी मेरे जैसे छोटे-से लेखक की किताब के लिए अपना समय निकालकर संदेश भेजे—यह मेरे लिए बेहद भावुक कर देने वाला अनुभव था। इन घटनाओं ने मुझे सिखाया कि लेखक की असली कमाई प्रसिद्धि नहीं, बल्कि पाठकों का प्रेम और उन लोगों का अपनापन है, जो बिना किसी व्यक्तिगत परिचय के भी आपकी रचना से जुड़ जाते हैं। मेरी पुस्तक पानी सा ठहरा मुझ में और मेरे गीतों में भी मेरे अनुभवों और संवेदनाओं की झलक मिलती है। हालाँकि, किसी एक रचना को सबसे करीब बताना मुश्किल है, क्योंकि हर रचना मेरे जीवन के किसी अलग दौर और
भावना से जुड़ी है। मेरे लिए मेरी सबसे अच्छी रचना वह है, जिसमें पाठक या श्रोता को अपने जीवन की कोई सच्चाई दिखाई दे।

6. व्यवसाय में समय, लागत, परिणाम और लाभ का हिसाब रखना पड़ता है, जबकि साहित्य में संवेदना, कल्पना और स्वतंत्रता का महत्व होता है। आपने इन दोनों क्षेत्रों में काम किया है। क्या व्यावसायिक जिम्मेदारियां कभी आपकी रचनात्मकता के रास्ते में आईं? या फिर आपने पाया कि कारोबार के अनुभव ही आपकी रचनाओं को अधिक वास्तविक बनाते हैं?

उत्तर :  मैं मानता हूँ कि व्यावसायिक जिम्मेदारियों के कारण समय का अभाव ज़रूर होता है, लेकिन उन्होंने मेरी रचनात्मकता को रोका नहीं, बल्कि जीवन को करीब से देखने का अवसर दिया। अपनी क्लास के माध्यम से युवाओं से सीधे मिलने, उनके दिल तक पहुँचने और उनके सपनों व संघर्षों को समझने का मौका मिलता है। ये अनुभव कहीं न कहीं मेरी लेखनी का हिस्सा बन जाते हैं। कारोबार ने मुझे अनुशासन सिखाया और साहित्य ने संवेदनशीलता। मेरा
मानना है कि जब लेखक जीवन को जितना करीब से देखता और समझता है, उसकी रचनाएँ उतनी ही वास्तविक और दिल के करीब होती हैं।

7. एक प्रशिक्षण संस्थान का संचालन, कर्मचारियों के साथ समन्वय और सामाजिक संस्था में नेतृत्व—इन सभी भूमिकाओं में लोगों को साथ लेकर चलना पड़ता है। आपके अनुसार एक अच्छे नेता की असली पहचान क्या है? वह जो हर निर्णय स्वयं लेता है, या वह जो दूसरों को निर्णय लेने योग्य बनाता है? क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति रहा, जिसने आपके नेतृत्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया?

उत्तर :  मेरे विचार से एक अच्छे नेता की पहचान यह नहीं है कि वह हर निर्णय स्वयं ले, बल्कि यह है कि वह दूसरों को इतना सक्षम बनाए कि वे सही निर्णय ले सकें। संस्थान चलाने और सामाजिक कार्यों के दौरान मैंने सीखा है कि लोगों को साथ लेकर चलने के लिए उनकी बात सुनना, उन पर विश्वास करना और उनकी क्षमताओं को पहचानना बेहद जरूरी है। मेरे जीवन में आदरणीय ज़फ़र ख़ान सिंधी साहब जैसे व्यक्तित्वों का विशेष स्थान रहा है। उनसे जुड़े अनुभवों ने मुझे रिश्तों, जिम्मेदारियों और इंसानी मूल्यों की अहमियत समझाई। मेरा मानना है कि नेतृत्व पद से नहीं, बल्कि इस बात से पहचाना जाता है कि आपके साथ जुड़ने वाले लोग आपके
साथ रहते हुए कितना सीखते हैं और कितना आगे बढ़ते हैं।

8. आप हिंदी और राजस्थानी के साथ उर्दू तथा सिंधी भाषाओं का भी ज्ञान रखते हैं। अलग-अलग भाषाओं की संवेदना और संस्कृति से परिचित होने के कारण क्या आपको लगता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य को समझने का रास्ता भी है? यदि आपको अपनी किसी एक रचना के माध्यम से समाज में प्रेम, सद्भाव और मानवीयता का संदेश देना हो, तो आप कौन-सा विषय चुनेंगे?

उत्तर :  बिल्कुल, मेरे लिए भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक संस्कृति, संवेदना और इंसान को समझने का रास्ता है। हिंदी, राजस्थानी, उर्दू और सिंधी से जुड़ाव ने मुझे महसूस कराया है कि भाषाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन प्रेम, दर्द और अपनत्व की भावनाएँ लगभग एक जैसी होती हैं। अगर मुझे अपनी किसी रचना के माध्यम से समाज को संदेश देना हो, तो मैं इंसानियत और आपसी सद्भाव का विषय चुनूँगा। मेरा मानना है कि हमारी पहचान हमारी भाषा, धर्म या जाति से पहले हमारे व्यवहार और दूसरों के प्रति हमारी संवेदनशीलता से होनी चाहिए। साहित्य की सार्थकता तभी है, जब वह लोगों के बीच दीवारें खड़ी करने के बजाय दिलों को जोड़ने का काम करे।

9. लंबे पेशेवर सफर में व्यक्ति कई बार समय, रिश्तों, निजी रुचियों
और सपनों के बीच चुनाव करता है। आपके जीवन में ऐसा कोई निर्णय आया, जब आपको किसी लाभ या अवसर के बजाय अपने सिद्धांतों को प्राथमिकता देनी पड़ी हो? आज पीछे मुड़कर देखते हैं, तो क्या कोई ऐसा सपना है जिसे आप फिर से जीना चाहते हैं, या कोई ऐसी गलती है जिससे नई पीढ़ी को बचने की सलाह देंगे?

उत्तर :  मेरे जीवन में ऐसे कई अवसर आए, जब व्यावहारिक लाभ और अपने सिद्धांतों के बीच चुनाव करना पड़ा। मैंने हमेशा कोशिश की है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अपने आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों से समझौता न करूँ। मेरा मानना है कि आर्थिक लाभ दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन एक बार खोया हुआ विश्वास वापस पाना आसान नहीं होता। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि जीवन में कुछ सपनों को और समय देना चाहिए था, लेकिन हर अनुभव ने मुझे कुछ नया सिखाया। नई पीढ़ी से मैं यही कहना चाहूँगा कि दूसरों की अपेक्षाओं में अपने सपनों को मत खोइए और सफलता की जल्दी में अपने मूल्यों को मत भूलिए। जीवन में गलतियाँ होना असफलता नहीं है, लेकिन उनसे सीख न लेना सबसे बड़ी गलती है।

10. यदि एक दिन आपकी पुस्तकों, गीतों, संस्थान और सामाजिक पदों का उल्लेख न हो, और आपको केवल एक सामान्य इंसान के रूप में देखा जाए, तो आप चाहेंगे कि लोग आपके व्यक्तित्व की कौन-सी खूबी याद रखें? आने वाले दस वर्षों में आप अपने जीवन का कौन-सा अधूरा सपना पूरा करना चाहते हैं—एक ऐसी रचना, कोई सामाजिक पहल, युवाओं के लिए कोई नया प्रयोग या खुद को समझने की कोई नई यात्रा?

उत्तर :  मैं चाहूँगा कि लोग मुझे मेरी उपलब्धियों से ज्यादा मेरी इंसानियत के लिए याद रखें। अगर मेरे जाने के बाद कोई यह कहे कि यह ऐसा इंसान था, जिसने दूसरों के दर्द को समझने और किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की, तो मेरे लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
मेरा बस इतना-सा ख़्वाब है कि मेरे जाने के बाद भी मेरा नाम और मेरा काम लोगों के होंठों पर ज़िंदा रहे, और मेरी रचनाएँ मेरे न होने के बाद भी लोगों के दिलों से संवाद करती रहें। आने वाले दस वर्षों में मेरा सपना है कि मैं साहित्य के माध्यम से कुछ ऐसा रच सकूँ, जो समय के साथ पुराना न हो, और युवाओं के लिए भी कुछ ऐसा कर सकूँ जिससे उन्हें सही दिशा और आगे बढ़ने का अवसर मिले। आखिरकार, इंसान की असली विरासत उसकी संपत्ति या पद नहीं, बल्कि वे
भावनाएँ और अच्छे बदलाव हैं, जो वह दूसरों के जीवन में छोड़ जाता है।

 

(एक गीतकार के रूप में श्री दिलीप केसानी। एक लेखक, एक मित्र, श्री जागृति संस्थान के कार्यक्रमों और विभिन्न मौकों पर अपने प्रखर व्यक्तित्व के साथ और समाचार पत्रों की सुर्खियों में। अपनी नन्हीं जान के साथ हंसी-खुसी के पल। )

(श्री दिलीप केसानी का एक गीत जिसकी शूटिंग विदेश में हो चुकी है। )

दिलीप केसानी : परिचय

लेखक | गीतकार | कवि | उपन्यासकार | पटकथा लेखक और तकनीकी सलाहकार उदित भास्कर प्राइवेट लिमिटेड। दिलीप केसानी हिन्दी, सिंधी और उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकार, गीतकार, कवि, कथाकार, उपन्यासकार एवं स्तंभकार हैं। मूल रूप से मीरपुरखास (सिंध, पाकिस्तान) से संबंध रखने वाले दिलीप केसानी ने साहित्य, संगीत और डिजिटल स्टोरीटेलिंग के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे 10 से अधिक पुस्तकों के लेखक, 50 से अधिक गीतों के रचनाकार तथा अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक-सांस्कृतिक मंचों पर सम्मानित व्यक्तित्व हैं। वे Indian Performing Right Society तथा Film Writers Association के आजीवन सदस्य हैं तथा साहित्य, गीत लेखन और पटकथा लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। प्रकाशित पुस्तकें :  हिन्दी :  आवाज़ (ग़ज़ल संग्रह), खिड़कियाँ (कहानी संग्रह), द टेररिस्ट (उपन्यास), कर्णा राम : द डेजर्ट किंग (उपन्यास), दस्तक (नज़्म संग्रह), समय से दोस्ती (बाल साहित्य) प्रकाशित: पंडित जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान, पानी सा ठहरा मुझ में (काव्य संग्रह) प्रकाशित: राजस्थान हिन्दी साहित्य अकादमी, उदयपुर, बैंडिट किंग (उपन्यास)। उर्दू :  बाद मुद्दत के (ग़ज़ल संग्रह)। सिंधी : अधूरी दास्तान (उपन्यास) प्रकाशित: राजस्थान सिंधी साहित्य अकादमी, जयपुर अनुवाद: हरिश देवनानी। डिजिटल साहित्य एवं ऑडियो स्टोरीज़ :  डिजिटल साहित्य के क्षेत्र में भी दिलीप केसानी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी दो लोकप्रिय रचनाएँ —Bandit King, Adhuri Dastan, Pocket FM पर प्रकाशित/प्रस्तुत हो चुकी हैं, जहाँ इन्हें व्यापक पाठक एवं श्रोता वर्ग मिला। आकाशवाणी प्रसारण :  दिलीप केसानी की पाँच कहानियाँ आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं। इन कहानियों को वरिष्ठ कथावाचक स्वर्गीय ज़फ़र ख़ान सिंधी की आवाज़ में श्रोताओं ने विशेष रूप से सराहा। गीत लेखन :  दिलीप केसानी हिन्दी, राजस्थानी, पंजाबी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में 50 से अधिक गीत लिख चुके हैं। उनके गीत विभिन्न संगीत कंपनियों एवं डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर रिलीज़ हो चुके हैं। प्रमुख गीतों में शामिल हैं: Taqdeer (Rajasthani) Shooting Twice, one in Jaipur with rattan chouhan and 2nd with Narayan pareek location hongkong- Tu Hi To Dil Banke (Hindi) Recorded in USA, Music Arranged in Pakistan by the great grandson ‘Abbas Ali Khan’ of pakistan’s first prime minister Liaquat Ali Khan and its shooting was held in Itley. Udd Udd Re (Re Create, Rajasthani) Shooting was held in Macao (China). Tere Shehar Mein (Hindi) Shooting was held in Hongkong. Banno (Rajasthani). Bani Mano (Rajasthani). Ishq Ki Baat (Hindi). Ganesha (Hindi, Devotional). Tere Dar Pe (Hindi, Devotional). Mili Na Mohabbat (Hindi). Sajna Dur Na Jaavi (Punjabi). Tujhe Ishq Ho Khuda Kare (Hindi). Daghha (Hindi). Yaar Bina Chain Kaha (Re Create, Hindi)।अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ :  दिलीप केसानी द्वारा लिखित चार गीतों की शूटिंग विदेशों में की गई, जो उनके गीत लेखन की लोकप्रियता और व्यापक पहुँच का प्रमाण है। इटली (Italy) Tu Hi To Dil Banke हिन्दी रोमांटिक गीत, जिसकी शूटिंग इटली के आकर्षक लोकेशनों पर की गई।मकाऊ (Macao) Udd Udd Re Gangaur TV के लिए निर्मित यह गीत मकाऊ में फिल्माया गया। हांगकांग (Hong Kong) Taqdeer राजस्थानी रोमांटिक गीत, जिसकी शूटिंग हांगकांग में हुई। Tere Shehar Mein हिन्दी सैड गीत, जिसकी शूटिंग भी हांगकांग में की गई। सम्मान एवं पुरस्कार :  दिलीप केसानी को साहित्य, गीत लेखन एवं सामाजिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं: अशु कवि श्री रतनलाल साहित्य युवा सम्मान, ग्लोबल एक्सीलेंसी अवार्ड, जोधाना रत्न सम्मान, अटल रत्न सम्मान, राष्ट्रीय भाषा गौरव सम्मान, बाबा रामदेव युवा सेवा सम्मान, बाल साहित्य सम्मान, साहित्य युवा रत्न सम्मान, विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं सम्मान। सामाजिक एवं साहित्यिक योगदान :  पूर्व अध्यक्ष – श्री जागृति संस्थान। पूर्व उपाध्यक्ष – राष्ट्रीय कवि चौपाल। साहित्य, संस्कृति एवं युवा प्रतिभाओं के प्रोत्साहन हेतु सक्रिय योगदान :  संक्षिप्त परिचय :  दिलीप केसानी उन चुनिंदा रचनाकारों में से हैं जिन्होंने साहित्य, गीत लेखन, ऑडियो स्टोरीटेलिंग और डिजिटल मीडिया—चारों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान स्थापित की है। राजस्थान की तीन प्रतिष्ठित साहित्य अकादमियों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों, आकाशवाणी प्रसारणों, Pocket FM पर प्रकाशित कहानियों, 50+ गीतों तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिल्माए गए गीतों के माध्यम से उन्होंने भारतीय साहित्य और संगीत जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। उनकी रचनाओं में प्रेम, संवेदना, संघर्ष, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों की गहरी छाप दिखाई देती है।

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