

सहयोग टाइम बैंक की ‘बचपन की चौपाल’ में सौ से अधिक वरिष्ठजनों के बीच गुंजी पुरानी यादें, गीत और खेल
सुमनेश व्यास. जोधपुर
सहयोग टाइम बैंक से रवि सुराणा ने बताया कि किसी के जीवन में खुशियाँ भरने के लिए हमेशा बड़े उपहारों की जरूरत नहीं होती। कभी पुराने गीतों की कोई धुन, बचपन के खेलों की एक बाजी, स्कूल के दिनों का कोई किस्सा और अपनों के साथ बिताए कुछ घंटे भी मन को ऐसी ताजगी दे जाते हैं, जिसकी अनुभूति लंबे समय तक बनी रहती है। इसी भावना को साकार करने के लिए ‘बचपन की चौपाल’ एक बार फिर वरिष्ठजनों के बीच पहुंची।
सहयोग टाइम बैंक की ओर से इस बार मंडोर के निंबा-निंबड़ी क्षेत्र स्थित अनुबंध वृद्धजन कुटीर परिसर में यह विशेष आयोजन रविवार 25 अक्टूबर को सायं पांच बजे रखा गया ,जहाँ दो सौ से अधिक वरिष्ठजन अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वृद्धजनों की ओर से मिले उत्साह और ऐसे आयोजन को फिर से अनुभव करने की इच्छा ने इस पहल को नया विस्तार देने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर अनुबंध वृद्धजन कुटीर की संस्थापक एवं सहयोग टाइम बैंक की संरक्षक श्रीमती अनुराधा आडवाणी ने बताया कि आयोजन वरिष्ठजनों के बीच अपनत्व, प्रसन्नता और सामूहिक सहभागिता के नए क्षण जोड़ने का अवसर मिला है।
इस मौके पर आए मारवाड़ रत्न से सम्मानित प्रमुख भामाशाह श्याम कुम्भट का मानना है कि समाज की वास्तविक समृद्धि इस बात में दिखाई देती है कि वह अपने वरिष्ठजनों के जीवन को कितना सम्मानपूर्ण और आनंदमय बना पाता है। कुम्भट के अनुसार, बचपन की चौपाल जैसी पहल बुजुर्गों को केवल मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उन्हें अपनी यादें साझा करने, दूसरों से जुड़ने और अपनेपन का अनुभव करने का अवसर भी प्रदान करती है। ऐसे प्रयासों को सामाजिक सहयोग और निरंतरता मिलनी चाहिए, ताकि सेवा की भावना अधिक लोगों तक पहुँचे।
उत्कर्ष क्लासेज के संस्थापक तथा निर्मल चेरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक एवं प्रमुख ट्रस्टी निर्मल गहलोत ने कहा कि हर पीढ़ी के पास अपने अनुभवों और स्मृतियों का अनमोल खजाना होता है। वरिष्ठजनों के बचपन की कहानियाँ, पुराने स्कूल के किस्से और बीते समय की जीवनशैली नई पीढ़ी के लिए भी सीख का स्रोत हैं। गहलोत के मुताबिक बचपन की चौपाल इन स्मृतियों को फिर से जीवंत करने के साथ वरिष्ठजनों को यह एहसास कराती है कि उनके अनुभव और भावनाएँ आज भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। पूर्व न्यायधीश गोपाल कृष्ण व्यास, पूर्व न्यायाधीश प्रेम सिंह परिहार ने कहा कि यह आयोजन पीढ़ियों के बीच संवाद और आत्मीयता बढ़ाने की दिशा में सार्थक कदम है। केयरगिवर्स आशा सोसायटी के संस्थापक डॉ. अरविंद माथुर, डॉ राम अकेला का कहना है कि वरिष्ठजनों की देखभाल में उनकी शारीरिक आवश्यकताओं के साथ भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है। माथुर का मानना है कि बुजुर्गों के साथ बातचीत, सामूहिक गतिविधियाँ, पसंदीदा गीत और मनोरंजक खेल उनके मन को प्रसन्न रखने तथा सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। ऐसे आयोजनों में वरिष्ठजनों की रुचि, सहजता और सक्रिय भागीदारी को केंद्र में रखना चाहिए।
सहयोग टाइम बैंक के संस्थापक रवि सुराणा के अनुसार, इस पहल का मूल उद्देश्य समय को सेवा का माध्यम बनाना है। समाज में ऐसे अनेक वरिष्ठजन हैं, जिन्हें सुविधाओं के साथ-साथ संवाद, साथ और अपनत्व की भी जरूरत होती है। बचपन की चौपाल इसी दूरी को कम करने का प्रयास है। पहले आयोजन से मिले उत्साह ने प्रेरित किया कि इस अनुभव को उन वरिष्ठजनों तक भी पहुँचाया जाए, जिनके लिए सामूहिक आनंद और पुरानी यादों से जुड़ने के अवसर विशेष महत्त्व रखते हैं। सुराणा ने शहर वासियों से आह्वान किया कि वे सहयोग टाइम बैंक प्रकल्प के तहत अधिक से अधिक समयदान की इस भावना से जुड़ें और सेवा को अपने जीवन का सहज हिस्सा बनाएँ।
आयोजन के दौरान ‘दूरदर्शन की स्मृतियाँ’ वरिष्ठजनों को पुराने धारावाहिकों, गीतों और विज्ञापनों के दौर में ले गयी। ‘वो जमाना याद है’ में बचपन की कहानियाँ, पुरानी शरारतें, स्कूल के किस्से, दोस्ती की यादें और जीवन के अनुभव साझा किए। ‘गीतों की चौपाल’ में पुराने पसंदीदा गीतों की फरमाइश, सामूहिक गायन और सुरों के साथ यादों का सिलसिला चला। ‘फिर बनें बच्चे’ के अंतर्गत हल्के-फुल्के मनोरंजक खेल, हँसी-ठिठोली और सामूहिक सहभागिता का माहौल बना। वहीं ‘बचपन की खेल चौपाल’ में चौपड़, साँप-सीढ़ी, लट्टू, कैरम, ताश, कंचे, गड्ढे, चर-भर और संतोलिया जैसे पारंपरिक खेलों के माध्यम से बीते दिनों की रौनक लौटाने का प्रयास रहा।
कार्यक्रम का समापन भावपूर्ण मिलन, स्मृति क्षणों और सामूहिक छायाचित्र के साथ किया गया, ताकि यह दिन केवल बीती हुई गतिविधियों के रूप में नहीं, बल्कि एक सुखद अनुभव के रूप में सभी के मन में बसा रहे। विदाई के साथ अगले मिलन की उम्मीद भी जुड़ी रहेगी।
सहयोग टाईम बैंक की यह पहल एक सरल लेकिन गहरा संदेश देती है कि बुजुर्गों को खुश रखने के लिए हमेशा कुछ नया देने की जरूरत नहीं; कई बार उनके साथ बैठकर उनके पुराने दिनों को फिर से जी लेना ही सबसे बड़ा उपहार बन जाता है। अनुबंध वृद्धजन कुटीर में सजी यह चौपाल इसी विश्वास के साथ आयोजित की गयी थी कि उम्र भले आगे बढ़ती रहे, लेकिन हँसने, गाने, खेलने और अपनेपन को महसूस करने का बचपन मन में हमेशा जीवित रहता है।







