सेवा में,
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
राजस्थान उच्च न्यायालय,
जोधपुर, राजस्थान।
प्रेषक:
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर, उदित भास्कर
UditBhaskar.com एवं RisingBhaskar.com
विषय: जैसलमेर के ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब को बोरवेल/ट्यूबवेल के माध्यम से भूजल से भरने की प्रस्तावित योजना पर रोक लगाने, पूर्ववर्ती नहरी जल योजना की पत्रावली की जाँच कराने तथा ऐतिहासिक जलस्रोत एवं जनहित की रक्षा के संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप का विनम्र अनुरोध।
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं दिलीप कुमार पुरोहित, उदित भास्कर मीडिया संस्थान का ग्रुप एडिटर होने के नाते आपके समक्ष पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र जैसलमेर के ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब से जुड़ा एक अत्यंत गंभीर जनहित का विषय प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह विषय केवल एक ऐतिहासिक तालाब को पानी से भरने या पर्यटन को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि मरुस्थलीय क्षेत्र में भूजल के संरक्षण, सार्वजनिक धन के सदुपयोग, प्राकृतिक संसाधनों की दीर्घकालीन सुरक्षा और भविष्य में उत्पन्न होने वाले संभावित पेयजल संकट से संबंधित है।
गड़ीसर तालाब जैसलमेर की ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और जल प्रबंधन की परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। वर्तमान में अत्यल्प वर्षा के कारण तालाब का जलस्तर बहुत कम हो जाने और उसे पुनः भरने के लिए बोरवेल अथवा ट्यूबवेल के माध्यम से पानी उपलब्ध कराने की योजना से संबंधित समाचार सार्वजनिक चर्चा में आए हैं। इस विषय पर प्रकाशित समाचारों के अनुसार, तालाब का जलस्तर बनाए रखने के लिए चार ट्यूबवेल लगाने की योजना पर विचार किया गया है। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि किसी भी निर्णय को लागू करने से पहले उसके पर्यावरणीय, जलवैज्ञानिक, आर्थिक और जनहित संबंधी सभी पहलुओं की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
मेरा विनम्र आग्रह है कि माननीय उच्च न्यायालय इस विषय की गंभीरता को देखते हुए संबंधित प्रशासन से तथ्यात्मक जानकारी मँगवाने, पूर्व में बनाई गई नहरी जल योजना की पत्रावली की जाँच कराने और प्रस्तावित बोरवेल योजना के औचित्य का परीक्षण कराने की दिशा में उचित कार्रवाई करने पर विचार करे।
1. जैसलमेर की भौगोलिक परिस्थितियाँ और गड़ीसर तालाब का वर्तमान संकट
माननीय महोदय, जैसलमेर पश्चिमी राजस्थान का एक प्रमुख मरुस्थलीय जिला है। यहाँ वर्षा सामान्यतः सीमित और अनिश्चित रहती है। इस वर्ष जैसलमेर शहर में वर्षा अत्यंत कम होने के कारण गड़ीसर तालाब लगभग सूखने की स्थिति में पहुँच गया है। ऐसे समय में जलस्रोत का संरक्षण और उपलब्ध जल का विवेकपूर्ण उपयोग प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
गड़ीसर तालाब के जलस्तर में गिरावट निश्चित रूप से चिंता का विषय है। लेकिन इस समस्या का समाधान खोजते समय यह विचार करना आवश्यक है कि क्या भूजल निकालकर तालाब में डालना दीर्घकालीन दृष्टि से उचित विकल्प है? क्या इसके लिए पर्याप्त भूजल उपलब्ध है? क्या भूजल की गुणवत्ता, पुनर्भरण की दर और स्थानीय जलभंडार पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया गया है? क्या इस कार्य से शहर के अन्य जलस्रोतों और आसपास के क्षेत्रों की जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है?
इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त किए बिना केवल तालाब में पानी भरने के उद्देश्य से बोरवेल खोदना उचित नहीं होगा। मरुस्थलीय क्षेत्र में भूजल एक सीमित और मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन है। इसका उपयोग करते समय वर्तमान आवश्यकता के साथ भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
2. गड़ीसर तालाब का ऐतिहासिक और जनोपयोगी महत्व
गड़ीसर तालाब जैसलमेर की ऐतिहासिक जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। रियासतकाल में जब आधुनिक नहरी जलापूर्ति व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, तब इस प्रकार के पारंपरिक जलस्रोत स्थानीय आबादी की जल आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वर्षा जल का संचय, जल का सावधानीपूर्वक उपयोग और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल प्रबंधन मरुस्थलीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ थीं।
समय के साथ नहरी पानी की उपलब्धता बढ़ने पर पारंपरिक जलस्रोतों पर निर्भरता कम हुई। परिणामस्वरूप अनेक ऐतिहासिक जलस्रोतों के रखरखाव, पुनर्भरण और दीर्घकालीन संरक्षण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। गड़ीसर तालाब की वर्तमान स्थिति इस बात पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है कि क्या हमने आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था के साथ अपने पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण को पर्याप्त प्राथमिकता दी है?
मेरा उद्देश्य किसी भी आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था का विरोध करना नहीं है। निवेदन केवल इतना है कि गड़ीसर जैसे ऐतिहासिक जलस्रोत को पर्यटन की दृष्टि से आकर्षक बनाए रखने के लिए ऐसा उपाय न अपनाया जाए जिससे भविष्य में जैसलमेर के भूजल संसाधनों पर अनावश्यक दबाव पड़े अथवा स्थानीय जनता के हित प्रभावित हों।
3. पूर्ववर्ती नहरी जल योजना की पत्रावली की जाँच आवश्यक
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी और इस विषय में सामने आए विवरणों के अनुसार, लगभग तीन से साढ़े तीन दशक पूर्व गड़ीसर तालाब को नहरी पानी से भरने अथवा नहरी जल से जोड़ने की योजना बनाई गई थी। बताया जाता है कि इस योजना पर करोड़ों रुपये व्यय किए गए, लेकिन अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए और गड़ीसर तालाब को स्थायी रूप से नहरी पानी से भरने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका।
यदि यह जानकारी अभिलेखों से प्रमाणित होती है, तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है कि आखिर उस योजना का क्या हुआ? उस पर कितनी धनराशि स्वीकृत की गई, कितनी राशि खर्च हुई, कौन-कौन से कार्य किए गए और किन कारणों से योजना अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकी?
क्या योजना बनाते समय तकनीकी सर्वेक्षण पर्याप्त था? क्या जलापूर्ति मार्ग, पाइपलाइन, पंपिंग व्यवस्था अथवा अन्य निर्माण कार्यों में कोई कमी रह गई थी? क्या रखरखाव के अभाव में व्यवस्था बंद हुई? क्या योजना के क्रियान्वयन में प्रशासनिक लापरवाही, वित्तीय अनियमितता अथवा भ्रष्टाचार की कोई शिकायत दर्ज हुई थी? इन प्रश्नों का उत्तर बिना मूल सरकारी अभिलेखों की जाँच किए नहीं दिया जा सकता।
अतः मेरा विनम्र निवेदन है कि संबंधित विभागों और जिला प्रशासन से पूर्ववर्ती नहरी जल योजना की मूल पत्रावली, प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृतियाँ, तकनीकी रिपोर्ट, कार्यादेश, भुगतान विवरण, उपयोगिता प्रमाणपत्र, निरीक्षण रिपोर्ट तथा योजना की विफलता अथवा बंद होने से संबंधित अभिलेख मँगवाए जाएँ। यदि रिकॉर्ड की जाँच में प्रथम दृष्टया अनियमितता या लापरवाही सामने आती है, तो नियमानुसार स्वतंत्र जाँच कराकर उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाए।
जब पहले ही इस उद्देश्य के लिए सार्वजनिक धन खर्च किए जाने की बात सामने आती है, तब यह आवश्यक है कि पुराने अनुभवों से सीख लेकर ही नई योजना पर निर्णय किया जाए। यदि पुरानी योजना की कमियों को जाने बिना पुनः एक नई योजना पर धन खर्च किया जाता है, तो यह सार्वजनिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की भावना के विपरीत हो सकता है।
4. बोरवेल से तालाब भरने की योजना के औचित्य का परीक्षण
माननीय महोदय, हाल के समाचारों में गड़ीसर तालाब का जलस्तर बनाए रखने के लिए चार ट्यूबवेल लगाए जाने की योजना का उल्लेख आया है। समाचारों में यह भी बताया गया है कि इसके लिए सहयोग राशि अथवा अन्य संसाधनों की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। तथापि, योजना की घोषणा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन की स्थिति अलग-अलग विषय हैं। इसलिए प्रशासन से यह स्पष्ट कराया जाना आवश्यक है कि योजना को किस स्तर पर स्वीकृति मिली है, बोरवेल कहाँ खोदे जाने हैं, उनसे कितना पानी निकाला जाएगा और इस कार्य के लिए कौन-सा वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है।
मेरा आग्रह है कि जब तक भूजल की उपलब्धता, संभावित दोहन, जल की गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभावों का निष्पक्ष आकलन नहीं हो जाता, तब तक इस योजना के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने की संभावना पर विचार किया जाए।
विशेष रूप से यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या बोरवेल से निकाला जाने वाला पानी तालाब में डालने के बाद वाष्पीकरण के कारण बड़े पैमाने पर नष्ट हो सकता है? क्या इस जल का उपयोग पर्यटन संबंधी गतिविधियों के लिए होगा? क्या तालाब में पानी डालने से स्थानीय भूजल भंडार पर ऐसा दबाव पड़ेगा जिसकी भरपाई प्राकृतिक पुनर्भरण से संभव नहीं होगी? क्या कम लागत वाले तथा पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर विकल्प उपलब्ध हैं?
इन प्रश्नों के समाधान के लिए भूजल विभाग, जल संसाधन विभाग, जिला प्रशासन तथा संबंधित तकनीकी विशेषज्ञों की रिपोर्ट प्राप्त करना आवश्यक है।
5. भूजल संरक्षण और संभावित पेयजल संकट
जैसलमेर जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र में भूजल का प्रत्येक स्रोत महत्वपूर्ण है। आज यदि तालाब में पानी भरने के लिए भूजल निकाला जाता है, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उससे भविष्य में स्थानीय जनता की पेयजल आवश्यकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
यह संभव है कि वर्तमान में नहरी जल अथवा अन्य स्रोतों से शहर की सामान्य जलापूर्ति हो रही हो, लेकिन प्राकृतिक आपदा, नहरी जलापूर्ति में लंबे व्यवधान, अत्यधिक सूखे या किसी अन्य गंभीर परिस्थिति में स्थानीय भूजल स्रोतों की उपयोगिता बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति के लिए उपलब्ध जलभंडारों का संरक्षण दूरदर्शी नीति का हिस्सा होना चाहिए।
मैं माननीय न्यायालय से आग्रह करता हूँ कि संबंधित विभागों से यह जानकारी मँगवाई जाए कि प्रस्तावित बोरवेलों से कितना भूजल निकाला जाएगा, भूजल स्तर पर इसका क्या संभावित प्रभाव होगा और क्या इस दोहन की भरपाई के लिए पर्याप्त प्राकृतिक अथवा कृत्रिम पुनर्भरण की व्यवस्था है।
यदि विशेषज्ञों की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि प्रस्तावित दोहन से स्थानीय जलभंडार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, तो योजना को रोकने अथवा उसमें आवश्यक संशोधन करने के निर्देश दिए जाने पर विचार किया जाए।
6. पर्यटन, नौकायन और जल की गुणवत्ता से संबंधित चिंताएँ
गड़ीसर तालाब जैसलमेर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। तालाब में पानी उपलब्ध होने से पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ हो सकता है। लेकिन पर्यटन के लाभ और जलस्रोत के संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि बोरवेल से निकाला गया भूजल तालाब में डाला जाता है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका प्राथमिक उद्देश्य क्या होगा। यदि पानी मुख्यतः पर्यटन और नौकायन के लिए उपलब्ध कराया जाता है, तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पानी की गुणवत्ता की नियमित जाँच हो, कचरा और अन्य प्रदूषक तालाब में न पहुँचें तथा नौकायन और अन्य गतिविधियों से जल की गुणवत्ता प्रभावित न हो।
7. जल के अवैध दोहन और संभावित व्यावसायिक दुरुपयोग की रोकथाम
माननीय महोदय, किसी भी सार्वजनिक जलस्रोत के संरक्षण में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उसका उपयोग निजी लाभ या अवैध व्यावसायिक गतिविधियों के लिए न हो। गड़ीसर तालाब में पानी उपलब्ध कराने के बाद यदि वहाँ से टैंकरों के माध्यम से पानी निकाला जाता है, तो उसकी निगरानी और अनुमति संबंधी व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए। यहाँ मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति अथवा संस्था पर बिना प्रमाण आरोप लगाना नहीं है। लेकिन संभावित दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करना आवश्यक है। यदि तालाब में भूजल डालने पर सार्वजनिक धन या संसाधन खर्च होते हैं, तो उस पानी का उपयोग, निकासी और संरक्षण पारदर्शी नियमों के अधीन होना चाहिए।
मेरा निवेदन है कि नगर परिषद एवं जिला प्रशासन से लिखित रूप में यह स्पष्ट कराया जाए कि तालाब से पानी की अनधिकृत निकासी, टैंकरों द्वारा अवैध परिवहन, व्यावसायिक दुरुपयोग अथवा किसी भी प्रकार की जल माफिया गतिविधि को रोकने के लिए कौन-सी व्यवस्था लागू की जाएगी। यदि किसी प्रकार की अनधिकृत निकासी पाई जाती है, तो संबंधित कानूनों के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
8. प्रशासन से शपथपत्र और जवाबदेही की माँग
यदि सभी आवश्यक वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक जाँचों के बाद गड़ीसर तालाब में बोरवेल से पानी डालने की योजना को उचित पाया जाता है, तो भी उसे बिना स्पष्ट सुरक्षा उपायों के लागू नहीं किया जाना चाहिए। इस संबंध में नगर परिषद जैसलमेर तथा जिला प्रशासन से सक्षम अधिकारी के माध्यम से शपथपत्र अथवा न्यायालय द्वारा उचित समझे जाने वाले लिखित आश्वासन पर विचार किया जा सकता है। इसमें निम्न बिंदुओं को स्पष्ट किया जाए:
- प्रस्तावित बोरवेलों से निकाले जाने वाले पानी की मात्रा, भूजल स्तर और प्राकृतिक पुनर्भरण पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया गया है।
- भूजल की गुणवत्ता तथा तालाब में पहुँचने के बाद जल की गुणवत्ता की नियमित जाँच की जाएगी।
- तालाब के पानी की अनधिकृत निकासी, टैंकरों से अवैध परिवहन और व्यावसायिक दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था रहेगी।
- नौकायन एवं पर्यटन गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण रोकने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएँगे और उनका पालन कराया जाएगा।
- तालाब में पानी भरने की योजना का उद्देश्य, खर्च, वित्तीय स्रोत, जल उपयोग और रखरखाव संबंधी विवरण सार्वजनिक किया जाएगा।
- पूर्ववर्ती नहरी जल योजना की पत्रावली की जाँच कर उसके परिणामों और विफलता के कारणों की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी।
- यदि भूजल के अत्यधिक दोहन, प्रदूषण या सार्वजनिक हित को नुकसान पहुँचने का जोखिम सामने आता है, तो योजना को रोकने अथवा संशोधित करने की व्यवस्था रहेगी।
यह भी स्पष्ट किया जाए कि गड़ीसर तालाब के जल का उपयोग स्थानीय जनता के हितों के विपरीत न हो तथा उसके संरक्षण के लिए दीर्घकालीन नीति तैयार की जाए।
9. माननीय उच्च न्यायालय से विनम्र प्रार्थनाएँ
उपरोक्त तथ्यों, आशंकाओं और जनहित के प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए मैं माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय से सादर अनुरोध करता हूँ कि इस पत्र को जनहित के एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में संज्ञान में लेने तथा विधि के अनुसार उचित कार्रवाई पर विचार करने की कृपा करें। विशेष रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जाए:
(क) जैसलमेर के ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब को बोरवेल अथवा ट्यूबवेल के माध्यम से भूजल से भरने की प्रस्तावित योजना पर, आवश्यक वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय आकलन पूरा होने तक, अंतरिम रोक लगाने के प्रश्न पर विचार किया जाए।
(ख) जिला प्रशासन, नगर परिषद जैसलमेर, भूजल विभाग और जल संसाधन विभाग से योजना की वर्तमान स्थिति, स्वीकृतियों, अनुमानित लागत, प्रस्तावित जल निकासी तथा पर्यावरणीय प्रभावों के संबंध में तथ्यात्मक रिपोर्ट मँगवाई जाए।
(ग) लगभग तीन से साढ़े तीन दशक पूर्व गड़ीसर तालाब को नहरी पानी से भरने के लिए बनाई गई कथित योजना की मूल पत्रावली मँगवाई जाए। उसमें हुए व्यय, कार्यों की स्थिति, योजना के बंद होने अथवा विफल होने के कारणों और उत्तरदायित्व संबंधी पहलुओं की जाँच कराई जाए। यदि प्रथम दृष्टया वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार के संकेत मिलें, तो सक्षम एजेंसी से नियमानुसार जाँच कराने पर विचार किया जाए।
(घ) बोरवेल से तालाब भरने के विकल्प के स्थान पर वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन, जलग्रहण क्षेत्र के सुधार, जल रिसाव की जाँच तथा नहरी जल योजना की व्यवहार्यता के पुनर्मूल्यांकन जैसे विकल्पों पर विशेषज्ञ समिति से रिपोर्ट प्राप्त की जाए।
(ङ) नगर परिषद एवं जिला प्रशासन से जल की गुणवत्ता, नौकायन, कचरा प्रबंधन, अवैध जल निकासी और टैंकरों के माध्यम से संभावित दुरुपयोग को रोकने की कार्ययोजना प्रस्तुत करने को कहा जाए।
(च) यह सुनिश्चित करने के लिए उचित निर्देश दिए जाएँ कि गड़ीसर तालाब के संरक्षण के नाम पर भूजल का ऐसा दोहन न हो जिससे जैसलमेर की जनता की वर्तमान अथवा भविष्य की पेयजल आवश्यकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
(छ) यदि प्रशासन की ओर से शपथपत्र या लिखित आश्वासन आवश्यक समझा जाए, तो उसमें जल की गुणवत्ता, जल निकासी पर नियंत्रण, भूजल संरक्षण, सार्वजनिक पारदर्शिता और पर्यावरणीय सुरक्षा संबंधी शर्तें शामिल की जाएँ।
(ज) संबंधित विभागों से समयबद्ध रिपोर्ट प्राप्त कराकर योजना की आवश्यकता, व्यवहार्यता और जनहित के अनुरूप होने का परीक्षण किया जाए, ताकि ऐतिहासिक जलस्रोत का संरक्षण किसी अल्पकालीन पर्यटन उद्देश्य तक सीमित न रह जाए।
10. जनहित में अंतिम निवेदन
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय, गड़ीसर तालाब केवल पानी का एक भंडार नहीं है। वह जैसलमेर के इतिहास, संस्कृति, स्थापत्य और मरुस्थलीय जीवन की स्मृति से जुड़ा हुआ है। ऐसे जलस्रोतों का संरक्षण केवल वर्तमान पर्यटन व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।
मेरी चिंता यह नहीं है कि गड़ीसर तालाब में पानी होना चाहिए या नहीं। मेरी चिंता यह है कि उसे पानी से भरने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जाए, उस तरीके का पर्यावरण और भूजल पर क्या प्रभाव पड़ेगा, सार्वजनिक धन का सदुपयोग कैसे सुनिश्चित होगा और स्थानीय जनता के दीर्घकालीन हितों की रक्षा किस प्रकार की जाएगी। यदि पूर्व में नहरी पानी से तालाब को भरने की योजना पर वास्तव में करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे, तो पहले उस योजना की वास्तविक स्थिति और विफलता के कारणों को स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि नई योजना वैज्ञानिक अध्ययन के बाद जनहित में उचित सिद्ध होती है, तो उसे निर्धारित पर्यावरणीय एवं कानूनी शर्तों के साथ लागू करने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन यदि उससे भूजल पर अनावश्यक दबाव, जल की गुणवत्ता में गिरावट अथवा सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग का जोखिम है, तो उसे रोकना और बेहतर विकल्प तलाशना आवश्यक होगा। उदित भास्कर मीडिया संस्थान का उद्देश्य किसी व्यक्ति, विभाग या संस्था के विरुद्ध पूर्वाग्रहपूर्ण आरोप लगाना नहीं है। हमारा उद्देश्य जनहित के ऐसे विषयों को सामने लाना है जिनका संबंध प्राकृतिक संसाधनों, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के दीर्घकालीन हितों से है। इसी भावना से यह पत्र आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।
अतः आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि जैसलमेर के ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब के संरक्षण, भूजल के विवेकपूर्ण उपयोग तथा पूर्ववर्ती नहरी जल योजना की जाँच के संबंध में विधि के अनुसार उचित कार्रवाई करने की कृपा करें। विशेषकर, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय आकलन तथा आवश्यक प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित होने तक प्रस्तावित बोरवेल योजना पर अंतरिम रोक लगाने के प्रश्न पर विचार किया जाए, ताकि किसी भी निर्णय से पहले जैसलमेर की जनता और भविष्य की पीढ़ियों के हित सुरक्षित रह सकें।
आपकी न्यायप्रियता, संवैधानिक दायित्वों और जनहित के प्रति संवेदनशीलता में पूर्ण विश्वास के साथ यह विनम्र निवेदन प्रस्तुत है।
सादर,
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर
UditBhaskar.com एवं RisingBhaskar.com
उदित भास्कर
दिनांक: 25 अक्टूबर 2026
स्थान: जोधपुर, राजस्थान







