रायचंद जीलानी सुथार हिंदी भाषा के एक बेहतरीन कवि हैं। रायचंद की हिंदी रचनाएँ समय-समय पर राजस्थान के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों, जैसे ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘दैनिक भास्कर’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। यह कर्मठ कवि राजस्थान के विभिन्न कवि सम्मेलनों में अपनी कविताएँ प्रस्तुत करते रहे हैं।

आलेख : मुकेश बारथानी. युवा लेखक
फूलों की सुगंध केवल कुछ समय के लिए होती है, जबकि किसी सृजित कृति की आयु सदियों तक रहती है। सृजन (रचना) एक कठिन और मन को मथ देने वाला परिश्रम है। दुनिया के विकसित और समृद्ध देशों में लेखकों, कवियों और कलाकारों को एक विशेष सम्मान और स्थान प्राप्त होता है। किसी रचनाकार के लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं होती; वह प्रकृति और प्रेम का दूत होता है। रचनाकार एक तरह से ब्रह्मांड के सौंदर्य की मूर्ति गढ़ने वाला चित्रकार होता है, जो अपने आंतरिक विचारों के चित्र को शब्दों का रूप देकर संवारता और प्रस्तुत करता है। वे कुदरत के सुंदर दृश्यों, हसीन घाटियों, सुंदर पक्षियों, हरे-भरे वृक्षों, ऊंचे पहाड़ों, रेत के टीलों और बहती नदियों के मनमोहक दृश्यों को पेश करने वाले प्रतिनिधि होते हैं।
एक रचना जन्म लेने से पहले कई बार सीने में उतरती है; वास्तव में उसकी इस भावना को केवल कोई कवि, लेखक या शोधकर्ता ही सही अर्थों में समझ सकता है। जैसा कि उर्दू भाषा के प्रसिद्ध कवि मीर तक़ी मीर के शब्दों में:
گل ہو مہتاب ہو آئینہ ہو خورشید ہو میر
اپنا محبوب وہی ہے جو ادا رکھتا ہوں
(मीर तक़ी मीर)
कहने का तात्पर्य यह है कि सृजन का अहसास उसी को हो सकता है जो लिखने या शायरी के चरणों से गुज़रा हो। यहाँ हम एक ऐसे ही रचनाकार का ज़िक्र कर रहे हैं, जिनका संबंध न्यू छोड़ की पवित्र भूमि से है। उनका जन्म हाकड़ा के किनारे बसे ज़िला उमरकोट के ‘न्यू छोड़’ शहर में राणोमल जीलानी सुथार के घर 1 अप्रैल 1975 को हुआ, जिन्हें अब रायचंद जीलानी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पिथोरो (अकड़ी) से प्राप्त की। उनके बचपन का नाम ‘लालू’ है। उनका पूरा परिवार वर्ष 1991 में सिंध छोड़कर भारत आ गया, जहाँ उन्होंने राजस्थान के जोधपुर शहर को अपना ठिकाना बनाया।
उनके पिता का नाम राणोमल पुत्र जीलोमल सुथार था। राणोमल की पहली पत्नी से दो बेटियाँ और एक बेटा महादेव हुए। राणोमल का दूसरा विवाह थार के नामचीन मिट्टी के कारीगर लखूजी सुथार की बड़ी बहन चूनाबाई से हुआ, जिनसे चार संतानें हुईं—वासूमल, बीरमदास, लालू उर्फ रायचंद जीलानी और देवी बाई। 90 के दशक में न्यू छोड़ में उनका घर उसी स्थान पर था जहाँ इस समय डॉ. मोहन लाल सुथार का घर है।
राणोमल जीलानी सुथार एक दानी, विनम्र, मेहमाननवाज़ और सम्मानीय व्यक्ति थे। उनका बढ़ईगी (काष्ठ कला) का काम पिथोरो में बहुत प्रसिद्ध था। राणोमल की दरियादिली उस समय पूरे थार में मशहूर थी। उनके मित्रों का दायरा भी उन्हीं के जैसा था। उन दिनों राणोमल की दोस्ती पिथोरो क्षेत्र की सम्मानित और मेहमाननवाज़ शख्सियत हाजी बादल नहड़ी से थी। न्यू छोड़ और आसपास के क्षेत्रों के बुजुर्ग अक्सर कहते थे कि राणोमल जीलानी के यहाँ यदि कोई मेहमान आता, तो वे अपनी क्षमता अनुसार उसे भोजन कराते, ठहराते और जाते समय तांगे (दो पहिये की घोड़ा-गाड़ी) में बिठाकर उसका किराया स्वयं तांगे वाले को देते थे, फिर मेहमान को रेलवे स्टेशन से विदा करते थे। न्यू छोड़ के अलावा पूरे थार से सुथार समुदाय का कोई भी व्यक्ति जाता, तो वह सबसे पहले राणोमल का मेहमान बनता था। स्वर्गवासी राणोमल अपने समय के मिलनसार और बड़े मेहमाननवाज़ इंसान थे।
यहाँ यह लिखने का उद्देश्य यह है कि इस कवि का संबंध न्यू छोड़ की पावन भूमि से है। वर्तमान में रायचंद जीलानी सुथार हिंदी भाषा के एक बेहतरीन कवि हैं। रायचंद की हिंदी रचनाएँ समय-समय पर राजस्थान के प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों, जैसे ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘दैनिक भास्कर’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। यह कर्मठ कवि राजस्थान के विभिन्न कवि सम्मेलनों में अपनी कविताएँ प्रस्तुत करते रहे हैं।
शुरुआती दिनों में जोधपुर में आयोजित एक बड़े हिंदी कवि सम्मेलन में, प्रसिद्ध हिंदी कवि गोपाल दास “नीरज” की अध्यक्षता में उन्होंने कविता पाठ कर सम्मान प्राप्त किया था। उस दिन के बाद रायचंद सुथार “सूर्य नगरी” के क्षितिज पर सुबह के सूरज की तरह उभरे। अगले दिन समाचार पत्रों में उनके द्वारा पढ़ी गई कविता की पंक्तियाँ सुर्खियाँ बनीं। पूरे कवि सम्मेलन के समाचार के साथ उनकी पंक्ति प्रमुखता से छपी, जो पाठकों के लिए नीचे प्रस्तुत है:
“पानी का कतरा हूँ, समुंदर बनना चाहता हूँ”
(रायचंद जीलानी)
यहाँ न्यू छोड़ में बचपन से ही वे बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन के बड़े प्रशंसक थे। पाकिस्तान छोड़ने के बाद कई महीनों तक उन्होंने मुंबई में बॉलीवुड उद्योग के बड़े अभिनेताओं से मुलाकातें कीं। बॉलीवुड फिल्म निर्देशकों ने भी आश्वासन दिए, लेकिन शायद ग़रीबी के कारण या किस्मत का साथ न मिलने से बात आगे न बढ़ सकी। जैसा कि कहावत है: “जो माथे पर लिखा है, वही होता है।”
बॉलीवुड की दुनिया से निराश होकर वे पुनः जोधपुर लौट आए और अपने पैतृक काष्ठ कला के कार्य में लग गए। लेकिन बचपन से ही उनके मन में सृजन की जो लौ जल रही थी, वह युवा होकर प्रज्वलित होने लगी। बिल्कुल वैसे ही जैसे उर्दू कवि ताहिर अली रिज़वी ने लिखा है:
مکتب عشق کا دستور نرالا دیکھا
اس کو چھٹی نہ ملی جس کو سبق یاد ہوا
(मीर ताहिर अली रिज़वी)
जीविका के लिए वे बढ़ई का काम करते रहे, लेकिन सृजन से अपना नाता जोड़े रखा। वे अभिनेता बनने के बजाय सूर्य नगरी (जोधपुर) के मेहरानगढ़ क्षेत्र के निवासियों के बीच एक बेहतरीन कवि बनकर उभरे। उनकी अनेक रचनाएँ हिंदी समाचार पत्रों की शोभा बनती रही हैं। उनके सैकड़ों ग़ज़ल और नज़्म लिखे हुए हैं। वे 2015 से ‘फिल्म राइटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के एसोसिएट सदस्य भी हैं।
वे स्वभाव से बेहद सादे और फकीर-मन इंसान हैं। वे शौक और रोज़गार के बीच की तमाम कठिनाइयों और रास्तों को पार कर चुके हैं। हर किसी से मुस्कुराकर मिलना उनकी बड़ी विशेषता है। उनके दोस्तों के दायरे में साहित्य-प्रेमी, लेखक, कवि और आम ग़रीब लोग शामिल हैं। कवि रायचंद जीलानी के साथ जिन लोगों से मेरी मुलाकात हुई, उनमें प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार दिलीप केसानी, जाने-माने चित्रकार गिरधारी लाल सुथार, जुगल किशोर (बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीत “जनम जनम का साथ निभाए” के म्यूज़िक डायरेक्टर), समीर सेन और दिलीप सेन (बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार), दिलीप पुरोहित और ऑल इंडिया रेडियो के वरिष्ठ उद्धघोषक स्व. ज़फ़र सिंधी—ये सभी रायचंद सुतार के सहयात्री और मित्र रहे हैं। यद्यपि ये बॉलीवुड फिल्मों के बड़े संगीतकार हैं, फिर भी वे रायचंद को न केवल व्यक्तिगत रूप से पहचानते हैं, बल्कि उन्हें बड़ा आदर और प्यार देते हैं। मैं इस बात का प्रत्यक्षदर्शी हूँ।
जैसे कविता और संगीत का आपस में संगम होता है, वैसे ही इन दोस्तों का आपस में जुड़ाव है। सचमुच, मेहरानगढ़ की इस धरती पर वे एक ऐसे महान कवि बनकर उभरे हैं, जो प्रेम का भंडार हैं; गुलाब की पंखुड़ियों जैसे कोमल, पवित्र मन की संवेदनशीलता जैसे नाज़ुक, किसी तपस्वी की पवित्रता जैसे वैरागी, और प्रभात के समय ओस की बूंदों जैसे पारदर्शी व ताज़ा हैं—बिल्कुल सूर्य नगरी की कायलाना झील के जल की तरह निर्मल, जिन्हें भारत और सिंध के लोग “रायचंद जीलानी” के नाम से जानते हैं।
मुझे याद आता है कि 26 मार्च 2016 को हिंदी के कवि रायचंद सुथार ने अपने प्रिय मित्र, युवा कवि और साहित्यकार दिलीप केसानी के निवास स्थान (पाल रीको, जोधपुर) में एक मुलाकात के दौरान जो कविता मौखिक रूप से सुनाई थी, वह नीचे प्रस्तुत है:
ओ बेखबर मैं इस कदर
तुझ पे फ़िदा हो गया
कसम से मैं सब से जुदा हो गया
इस नजर से देखा तुझे
किसी की नजर न लगे
आ पास आजा मेरी आँखों में समां
और कायनात को यह खबर न लगे
कि तू मेरा खुदा हो गया
कसम से मैं सब से जुदा हो गया
अब तो हर राह तेरी मंजिल सी लगे
मुझे यह हवा का झोंका भी
ना जाने क्यों तेरा ही आंचल लगे
देखो न मुझे यह क्या हो गया
कसम से मैं सब से जुदा हो गया।
(रायचंद जीलानी)।







