फर्ज की खातिर…
कमल शर्मा
गूंज उठा था आसमान में, एक भयानक सा साया,
दुबई से तेल अवीव का विमान, संकट में था आया।
मनसूबे थे नापाक उनके, दहशत का था जाल बिछा,
पर कॉकपिट में बैठा था वो, जिसने साहस का पाठ लिखा।
अपने साहस और सूझ-बूझ का, तुमने ऐसा मान दिया,
भेज के इमरजेंसी सिग्नल, उनके मनसूबों को नाकाम किया।
खौफ के उस काले मंजर में, तुम जरा न डगमगाए थे,
फर्ज़ की खातिर मौत के आगे, तुम चट्टान बन आए थे।
थे गड़े खंजर शरीर पर तुम्हारे, बहती लहू की धार थी,
सांसें थीं संकट में फंसी, पर रक्षक की ललकार थी।
दर्द से तड़पते जिस्म से भी, फर्ज़ का दामन न छूटा,
कॉकपिट का दरवाज़ा तुमने खोला, तब जाके वो चक्रव्यूह टूटा।
मदद के हाथ बढ़े आगे तब, जाके यह पूरा खेल रुका,
दहशतगर्दों का वो क्रूर इरादा, वीरों के आगे आ झुका।
प्रशंसनीय है तुम्हारा शौर्य, हे वीर कैप्टन स्मिथ महान,
इतिहास के पन्नों पर अंकित, रहेगा तुम्हारा यह पराक्रम।
तुमने बचाई कई जानें, तुम हो रक्षक, तुम हो ढाल,
सदा वंदनीय रहेगा जग में, तुम्हारा यह पराक्रम बेमिसाल।







