हे रावण! माफ करना…: कवि- दिलीप कुमार पुरोहित

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कवि : दिलीप कुमार पुरोहित

हे रावण! माफ करना…

एक रावण को सदियों से, हर साल जलाया जाता है,

रावण जलाने वाला, रावण से क्या कम नज़र आता है?

हे रावण! माफ करना, तुझे जलाकर क्या मिला,

घर-घर रावण देखकर, मन आज बहुत है हिला।

तेरे दस सिर जलते हैं, पर लोभ नहीं जल पाता है,

तेरे पुतले की राख से, अहंकार फिर उग आता है।

तेरे भीतर था अहंकार, यहां अहंकार का राज है,

तेरे भीतर थी बुराई, यहां बुराई का समाज है।

तूने सीता का हरण किया, यहां विश्वास लुटाते हैं,

तेरे पुतले को जलाते हैं, अपनों को रोज जलाते हैं।

तूने मर्यादा तोड़ी थी, यहां रिश्ते टूट रहे हैं,

तेरे पुतले जलते हैं, इंसानियत के दीप बुझ रहे हैं।

किस-किस रावण को जलाएं, किस-किस को समझाएं,

मन के भीतर बैठे रावण को, कैसे बाहर लाएं?

सच की आवाजें गुम हैं, झूठ के मेले लगते हैं,

चेहरों पर राम बसे हैं, मन में रावण पलते हैं।

हे रावण! माफ करना, तुझसे भी बुरा जमाना है,

अब बाहर नहीं, मन के रावण को जलाना है।

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