आस्था, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम है रामेश्वरम-धनुषकोड़ी, IPS पंकज कुमार चौधरी सपरिवार पांचवीं बार पहुंचे दक्षिण भारत

SHARE:

 

तमिलनाडु के रामेश्वरम में आध्यात्मिक अनुभूति, धनुषकोड़ी में 1964 के चक्रवात की त्रासदी और पम्बन ब्रिज पर आधुनिक इंजीनियरिंग का अद्भुत नजारा; मुकुल चौधरी के साथ दक्षिण भारत की यात्रा पर हैं आईपीएस अधिकारी पंकज कुमार चौधरी

विशेष संवाददाता | उदित भास्कर

रामेश्वरम/तमिलनाडु। भारत की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करना हो तो दक्षिण भारत की यात्रा अपने आप में एक विशेष अनुभूति है। तमिलनाडु का रामेश्वरम और इसके निकट स्थित धनुषकोड़ी ऐसे ही स्थान हैं, जहां समुद्र की विशालता, प्राचीन मंदिरों की भव्यता, रामायण से जुड़ी मान्यताएं और इतिहास के उतार-चढ़ाव एक साथ देखने को मिलते हैं। भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी पंकज कुमार चौधरी अपनी धर्मपत्नी मुकुल चौधरी के साथ दक्षिण भारत की यात्रा पर हैं। रामेश्वरम और धनुषकोड़ी की यात्रा उनके लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।

यात्रा के अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने लिखा, ”सुदूर दक्षिण भारत तमिलनाडु की यात्रा, विशेषकर रामेश्वरम और धनुषकोड़ी आना विशेष रोमांचित करता है। सपरिवार पांचवीं बार आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भारत विविधताओं से भरा देश है।”

उनकी यह टिप्पणी देश की उस सांस्कृतिक विशेषता को रेखांकित करती है, जिसमें अलग-अलग भाषाओं, परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भारत की एकता दिखाई देती है। रामेश्वरम की धार्मिक महत्ता से लेकर धनुषकोड़ी के समुद्री सौंदर्य तक, यह यात्रा भारतीय विरासत के अनेक पहलुओं को समझने का अवसर देती है।

रामेश्वरम: जहां शिवभक्ति और रामायण की परंपरा का मिलता है संगम

तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में पम्बन द्वीप पर स्थित रामेश्वरम भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है। यह हिंदू धर्म के चार धामों में शामिल है और भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक रामनाथस्वामी ज्योतिर्लिंग के लिए प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव और भगवान श्रीराम से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

रामेश्वरम का सबसे प्रमुख आकर्षण श्री अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर है। द्रविड़ स्थापत्य शैली में निर्मित यह मंदिर अपनी भव्य संरचना, विशाल गलियारों और आकर्षक नक्काशीदार स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के लंबे गलियारे इसकी स्थापत्य कला की विशिष्ट पहचान हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसकी धार्मिक परंपराओं का अनुभव भी करते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति के लिए भगवान शिव की आराधना करने का संकल्प लिया था। मान्यता है कि माता सीता ने रेत से शिवलिंग बनाया, जबकि हनुमानजी कैलाश से शिवलिंग लेकर आए। मंदिर में इन दोनों शिवलिंगों से संबंधित परंपराएं आज भी श्रद्धापूर्वक निभाई जाती हैं।

मंदिर परिसर में स्थित 22 पवित्र तीर्थकुंड भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। परंपरा के अनुसार, तीर्थयात्री अग्नि तीर्थम में स्नान करने के बाद इन कुंडों के जल से स्नान करते हैं और फिर भगवान रामनाथस्वामी के दर्शन करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और आस्था से जुड़ा अनुभव है।

धनुषकोड़ी: समुद्र के अंतिम छोर पर इतिहास और प्रकृति का रोमांच

रामेश्वरम की यात्रा धनुषकोड़ी के बिना अधूरी मानी जाती है। रामेश्वरम से लगभग 18 से 20 किलोमीटर दूर स्थित यह क्षेत्र भारत के दक्षिण-पूर्वी समुद्री भूभाग का एक विशिष्ट स्थल है। यहां समुद्र, रेत, तेज हवाओं और दूर तक फैले तटों का दृश्य पर्यटकों को आकर्षित करता है।

धनुषकोड़ी का नाम रामायण से जुड़ी एक पौराणिक मान्यता के कारण प्रसिद्ध है। मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने अपने धनुष के सिरे से रामसेतु को खंडित किया था। इसी मान्यता से इस स्थान का नाम धनुषकोड़ी पड़ा।

हालांकि, धनुषकोड़ी की पहचान केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं है। इसका आधुनिक इतिहास वर्ष 1964 में आए विनाशकारी चक्रवात से जुड़ा है। उस समय यह एक आबाद कस्बा था, जहां रेलवे स्टेशन, चर्च, डाकघर और व्यापारिक गतिविधियां मौजूद थीं। चक्रवात ने इस क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। इसके बाद धनुषकोड़ी का पुराना शहरी स्वरूप लगभग समाप्त हो गया।

आज यहां पुराने भवनों, चर्च और रेलवे स्टेशन के खंडहर उस त्रासदी की याद दिलाते हैं। इसी कारण इसे प्रायः ‘घोस्ट टाउन’ यानी उजड़ा हुआ शहर भी कहा जाता है। इन अवशेषों को देखकर प्रकृति की शक्ति और मानवीय जीवन की अनिश्चितता का एहसास होता है।

धनुषकोड़ी के आगे अरिचल मुनई क्षेत्र तक सड़क जाती है। यहां पहुंचकर पर्यटक समुद्र और तट की अनूठी भौगोलिक संरचना का अनुभव करते हैं। भारत और श्रीलंका के बीच स्थित समुद्री क्षेत्र की निकटता इस स्थान को विशेष बनाती है। हालांकि, यहां से श्रीलंका की दूरी और दृश्यता मौसम तथा परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

पम्बन ब्रिज: समुद्र के ऊपर इंजीनियरिंग की शानदार मिसाल

रामेश्वरम यात्रा का एक और प्रमुख आकर्षण पम्बन ब्रिज है। यह समुद्र के ऊपर बना ऐसा महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है, जो मुख्य भारतीय भूभाग को रामेश्वरम द्वीप से जोड़ता है।

पुराना पम्बन रेलवे पुल वर्ष 1914 में रेल यातायात के लिए खोला गया था। उस समय समुद्र के ऊपर पुल का निर्माण इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धि माना गया। इसकी विशेषता बीच का खुलने वाला हिस्सा था, जिससे जरूरत पड़ने पर जहाजों को गुजरने का रास्ता मिलता था।

समय के साथ पुराना पुल अपनी उम्र और संरचनात्मक सीमाओं के कारण आधुनिक रेल परिचालन की जरूरतों के अनुरूप नहीं रहा। इसके स्थान पर आधुनिक तकनीक से युक्त नया पम्बन रेलवे पुल तैयार किया गया है, जिसकी विशेषता वर्टिकल-लिफ्ट प्रणाली है। इस व्यवस्था में पुल का एक हिस्सा ऊपर उठाकर जहाजों के लिए मार्ग उपलब्ध कराया जा सकता है।

पम्बन क्षेत्र का सड़क पुल भी यात्रियों को समुद्र का शानदार दृश्य दिखाता है। नीले पानी के बीच बने पुल, समुद्री हवाएं और आसपास फैला प्राकृतिक विस्तार इस यात्रा को यादगार बनाते हैं। यहां प्रकृति की सुंदरता के साथ मानवीय तकनीकी क्षमता का भी परिचय मिलता है।

रामसेतु: आस्था और भूगोल के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी

रामेश्वरम और धनुषकोड़ी के निकट भारत तथा श्रीलंका के बीच उथले समुद्री क्षेत्र में चूना पत्थर की संरचनाओं, रेत के टीलों और उथले भागों की एक श्रृंखला मौजूद है। इसे रामसेतु या एडम्स ब्रिज कहा जाता है।

रामायण की धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीराम की वानर सेना ने माता सीता को रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए लंका तक पहुंचने के उद्देश्य से समुद्र पर पुल बनाया था। इस निर्माण का श्रेय परंपरागत रूप से नल और नील को दिया जाता है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए रामसेतु भगवान श्रीराम के पराक्रम, संकल्प और धर्म की विजय का प्रतीक है।

रामेश्वरम के कुछ मंदिरों में ऐसे पत्थर भी प्रदर्शित किए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में रामसेतु से जोड़ा जाता है। इन्हें देखने के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। हालांकि, इन पत्थरों और रामसेतु के निर्माण के बीच प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

भूगोल की दृष्टि से भारत और श्रीलंका के बीच उथले समुद्री क्षेत्र में चट्टानी और रेतीली संरचनाओं की मौजूदगी स्थापित तथ्य है। लेकिन इन संरचनाओं की उत्पत्ति, निर्माण की प्रक्रिया और प्राचीन काल में इनके उपयोग को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन तथा अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हैं। इसलिए धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक निष्कर्षों को उनके अपने संदर्भ में समझना आवश्यक है।

पांचवीं यात्रा भी क्यों लगती है खास?

किसी स्थान पर बार-बार जाना इस बात का संकेत हो सकता है कि वहां की संस्कृति, वातावरण और अनुभव व्यक्ति को लगातार आकर्षित करते हैं। IPS पंकज कुमार चौधरी और उनकी धर्मपत्नी मुकुल चौधरी की रामेश्वरम तथा धनुषकोड़ी की पांचवीं पारिवारिक यात्रा इसी आकर्षण को दर्शाती है।

रामेश्वरम में धार्मिक आस्था, मंदिरों की स्थापत्य कला और आध्यात्मिक वातावरण है। धनुषकोड़ी में इतिहास की त्रासदी, समुद्र का विस्तार और प्रकृति का अनूठा स्वरूप है। पम्बन ब्रिज आधुनिक इंजीनियरिंग की उपलब्धियों से परिचित कराता है, जबकि रामसेतु से जुड़ी परंपराएं भारतीय समाज में रामायण की गहरी सांस्कृतिक उपस्थिति का स्मरण कराती हैं।

तमिलनाडु की यह यात्रा भारत की विविधता को करीब से समझने का अवसर देती है। उत्तर भारत की भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं से अलग दक्षिण भारत की स्थापत्य शैली, खानपान, धार्मिक रीति-रिवाज और समुद्री जीवन अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। फिर भी आस्था, परिवार, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के सूत्र देश के विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं।

रामेश्वरम और धनुषकोड़ी केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि भारतीय सभ्यता, धार्मिक परंपराओं, प्राकृतिक विरासत और ऐतिहासिक स्मृतियों के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। IPS पंकज कुमार चौधरी और मुकुल चौधरी की पांचवीं पारिवारिक यात्रा का अनुभव इस बात को रेखांकित करता है कि भारत को समझने के लिए उसकी विविधताओं को देखना, महसूस करना और उनका सम्मान करना आवश्यक है। वास्तव में, भारत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां हर क्षेत्र अपनी अलग पहचान के साथ राष्ट्रीय एकता की कहानी कहता है।

सबसे ज्यादा पढ़ी गई

Horoscope

Weather

और पढ़ें

राज्य

शहर चुनें