

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, भक्ति और सामूहिक गायन का मनमोहक संगम; टिकट लेकर पहुंचे संगीतप्रेमियों ने कलाकारों का बढ़ाया उत्साह, नवोदित प्रतिभाओं को सरकारी संरक्षण और आत्मनिर्भरता के अवसर देने की जरूरत
राखी पुरोहित. जोधपुर
जोधपुर के संगीतप्रेमियों के लिए 24 अक्टूबर की शाम सुर, साधना और भक्ति के नाम रही। इंजीनियर भवन के सभागार में स्वरांगन की ओर से आयोजित वृंदगान कार्यक्रम में अनूप पुरोहित और उनकी टीम ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय रागों पर आधारित भजनों तथा भक्ति संगीत की प्रस्तुतियों से वातावरण को सुरमय बना दिया। बालक-बालिकाओं और युवक-युवतियों की सामूहिक गायिकी ने भारतीय संगीत की उस समृद्ध परंपरा की झलक दिखाई, जिसमें स्वर केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि साधना, संवेदना और आध्यात्मिक अनुभूति का मार्ग भी हैं।
यह आयोजन केवल संगीत प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहा। इसने एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने रखा—जब कलाकार अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर दर्शकों तक पहुंचने, टिकट आधारित कार्यक्रम करने और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तो क्या सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं को भी उनके लिए अधिक प्रभावी अवसर उपलब्ध नहीं कराने चाहिए?

रागों की परंपरा और नई पीढ़ी का आत्मविश्वास
वृंदगान की विशेषता यह होती है कि इसमें एकल गायक की प्रतिभा के साथ-साथ सामूहिक अनुशासन, सुरों का तालमेल और एक-दूसरे को सुनने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। अलग-अलग आवाजें जब एक भाव, एक लय और एक संगीत-दृष्टि के साथ जुड़ती हैं, तब प्रस्तुति का प्रभाव व्यक्तिगत गायन से आगे बढ़कर सामूहिक अनुभूति बन जाता है। स्वरांगन के इस आयोजन में बच्चों से लेकर युवाओं तक की सहभागिता ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के भविष्य के प्रति उम्मीद जगाई।
कार्यक्रम में मीरा, कबीर और सूरदास जैसे भक्ति कवियों की रचनाओं के साथ पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर तथा राजन-साजन मिश्र जैसे संगीत-जगत के दिग्गजों की परंपरा से जुड़ी बंदिशें शामिल थीं। इन रचनाकारों और गायकों की विरासत भारतीय संगीत की विविधता को सामने रखती है। मीरा की भक्ति में समर्पण है, कबीर के पदों में आत्मचिंतन और सामाजिक चेतना, जबकि सूरदास की रचनाओं में कृष्णभक्ति और भावनात्मक गहराई दिखाई देती है। शास्त्रीय संगीत के रागों में ढलकर ऐसी रचनाएं श्रोताओं को केवल सुनने का आनंद नहीं देतीं, बल्कि उनके भीतर भावनात्मक और आध्यात्मिक संवाद भी पैदा करती हैं।

भारतीय संगीत में दीपक राग और मेघ मल्हार को लेकर प्रचलित लोकमान्यताएं भी संगीत की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रही हैं। दीपक राग से दीप प्रज्वलित होने और मेघ मल्हार से वर्षा होने की कथाएं संगीत के प्रति लोगों की श्रद्धा और कल्पनाशीलता को दर्शाती हैं। आज के मंच पर इन मान्यताओं को चमत्कार के रूप में सिद्ध करना उद्देश्य नहीं, बल्कि उस परंपरा की भाव-संपदा और रागों के प्रति भारतीय समाज के गहरे लगाव को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
अनूप पुरोहित की पहल: परंपरा से भविष्य तक
जोधपुर में अनूप पुरोहित और स्वरांगन की गतिविधियां हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की नई पीढ़ी तैयार करने की दिशा में उल्लेखनीय पहल के रूप में देखी जा सकती हैं। संगीत की परंपरा केवल बड़े कलाकारों की प्रस्तुतियों से जीवित नहीं रहती; उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण, नियमित रियाज, मंच, अनुभवी मार्गदर्शन और नए विद्यार्थियों में रुचि पैदा करना भी जरूरी है।
बच्चों और युवाओं को समूह में गाने का अवसर देना अपने आप में एक प्रशिक्षण प्रक्रिया है। इससे उनमें सुर और ताल की समझ विकसित होती है, सामूहिक प्रस्तुति का अनुशासन आता है और मंच पर आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही, वे यह सीखते हैं कि संगीत केवल व्यक्तिगत प्रसिद्धि का साधन नहीं, बल्कि मिलकर कुछ सुंदर रचने की कला भी है।
ऐसी टीमों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज मनोरंजन के अनेक माध्यमों के बीच शास्त्रीय संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आसान नहीं है। यदि प्रशिक्षण को रोचक प्रस्तुतियों, भक्ति संगीत और सार्वजनिक कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, तो युवा श्रोताओं को इस विधा से जोड़ने के अवसर बढ़ सकते हैं। स्वरांगन जैसे प्रयास इस दिशा में सेतु का काम कर सकते हैं।
जोधपुर की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊर्जा
जोधपुर को कला, संगीत और साहित्य की समृद्ध परंपरा के लिए जाना जाता है। साहित्य के क्षेत्र में पद्मश्री शीन काफ निज़ाम जैसे रचनाकारों की विरासत और संगीत के क्षेत्र में वरिष्ठ गुरु राजेंद्र वैष्णव जैसे साधकों का योगदान इस शहर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है। ऐसे वातावरण में अनूप पुरोहित और उनकी टीम का प्रयास महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि किसी शहर की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान में तैयार हो रही नई प्रतिभाओं से भी बनती है।
स्थानीय संगीत संस्थाओं, गुरुओं, आयोजकों और सांस्कृतिक मंचों की जिम्मेदारी है कि वे परंपरा को संग्रहालय की वस्तु बनाकर न रखें, बल्कि उसे वर्तमान जीवन का हिस्सा बनाएं। इसके लिए संगीत सभाएं, विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रस्तुतियां, युवा कलाकारों के विशेष कार्यक्रम, कार्यशालाएं और शास्त्रीय संगीत की सरल परिचय-श्रृंखलाएं उपयोगी हो सकती हैं।
जोधपुर में प्रतिभाओं की कमी नहीं है; आवश्यकता है उन्हें निरंतर अभ्यास, उचित मंच और श्रोताओं तक पहुंचने के अवसर देने की। ऐसे आयोजन शहर के सांस्कृतिक कैलेंडर का नियमित हिस्सा बनें, तो कलाकारों और संगीतप्रेमियों के बीच स्थायी संबंध भी विकसित हो सकते हैं।
टिकट लेकर आए दर्शक: आत्मनिर्भर कला की ओर कदम
इस आयोजन की एक उल्लेखनीय बात यह रही कि दर्शक बुक माय शो के माध्यम से टिकट खरीदकर कार्यक्रम देखने पहुंचे। अच्छी संख्या में श्रोताओं की मौजूदगी यह संकेत देती है कि यदि प्रस्तुति की गुणवत्ता, आयोजन की जानकारी और दर्शकों तक पहुंचने की व्यवस्था प्रभावी हो, तो लोग संगीत के लिए समय और धन खर्च करने को तैयार हो सकते हैं।
टिकट आधारित आयोजन कलाकारों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। इससे आयोजन की लागत, सभागार का किराया, ध्वनि व्यवस्था, प्रचार, कलाकारों के पारिश्रमिक और प्रशिक्षण जैसी जरूरतों के लिए संसाधन जुटाने की संभावना बनती है।
आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं कि कलाकारों को सरकारी सहायता से वंचित कर दिया जाए। कला का बाजार हमेशा पर्याप्त आय नहीं दे पाता, खासकर तब जब कलाकार शास्त्रीय संगीत जैसी ऐसी विधा में काम कर रहे हों, जिसके लिए लंबे प्रशिक्षण और निरंतर साधना की जरूरत होती है। इसलिए बेहतर रास्ता सरकारी संरक्षण, निजी प्रायोजन, टिकट बिक्री, प्रशिक्षण शुल्क, संस्थागत सहयोग और डिजिटल माध्यमों से आय के विविध स्रोत विकसित करना है। सरकार का सहयोग कलाकारों के लिए स्थायी आधार तैयार कर सकता है, जबकि कलाकारों की अपनी पहल उन्हें अधिक स्वतंत्र और टिकाऊ बना सकती है।
कलाकारों के लिए सरकारी योजनाएं: संरक्षण से आत्मनिर्भरता तक
अनूप पुरोहित और स्वरांगन जैसे संगीत समूहों के लिए सरकारी योजनाओं की जानकारी उपयोगी हो सकती है। केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय और राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की ओर से कलाकारों, प्रशिक्षण, सांस्कृतिक आयोजनों तथा संस्थाओं के लिए विभिन्न प्रकार की सहायता के प्रावधान हैं। हालांकि प्रत्येक योजना की पात्रता, आवेदन प्रक्रिया और वर्तमान दिशा-निर्देश अलग हैं।
कलाकारों के लिए प्रमुख सरकारी योजनाएं
केंद्र और राजस्थान सरकार की योजनाएं एवं अवसर
1. केंद्र सरकार — युवा कलाकार छात्रवृत्ति
संस्कृति मंत्रालय की Scholarships to Young Artistes in Different Cultural Fields योजना के अंतर्गत 18 से 25 वर्ष आयु के प्रतिभाशाली कलाकारों को भारतीय शास्त्रीय संगीत सहित विभिन्न कला क्षेत्रों में उन्नत प्रशिक्षण के लिए दो वर्ष तक ₹5,000 प्रतिमाह की छात्रवृत्ति देने का प्रावधान है। सामान्यतः संबंधित गुरु या संस्थान से कम से कम पांच वर्ष के प्रशिक्षण का प्रमाण आवश्यक है।
संगीत समूहों और प्रशिक्षण आधारित संस्थाओं के लिए यह योजना उपयोगी हो सकती है। इसके अंतर्गत पात्र समूहों में गुरु और शिष्यों को नियमित प्रशिक्षण तथा पारिश्रमिक के लिए सहायता का प्रावधान है। योजना की शर्तों और वर्तमान आवेदन प्रक्रिया के अनुसार पात्रता जांचना आवश्यक है।
पात्र एनजीओ, सोसायटी, ट्रस्ट और विश्वविद्यालय संगीत समारोहों, कार्यशालाओं, सांस्कृतिक महोत्सवों तथा संगीत प्रस्तुतियों के लिए सहायता हेतु आवेदन कर सकते हैं। मंत्रालय की 16 मार्च 2026 की जानकारी में सामान्य सहायता राशि ₹5 लाख और विशेष मामलों में ₹20 लाख तक बताई गई है। यह व्यक्तिगत कलाकार को सीधे मिलने वाला अनुदान नहीं, बल्कि पात्र संस्थाओं के लिए योजना है।
4. राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर — युवा कलाकारों के अवसर
अकादमी की वेबसाइट पर युवा कलाकारों के संगीत कार्यक्रम, शास्त्रीय संगीत समारोह, प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति तथा युवा एवं बाल प्रतिभा पुरस्कार जैसी गतिविधियों का उल्लेख है। स्वरांगन जैसे समूह इन कार्यक्रमों में भागीदारी, प्रस्तुति के अवसर और संबंधित योजनाओं की नवीनतम जानकारी के लिए अकादमी से संपर्क कर सकते हैं। वेबसाइट पर वर्णित कुछ छात्रवृत्ति राशियां पुरानी हो सकती हैं, इसलिए वर्तमान राशि और पात्रता की पुष्टि जरूरी है।
अकादमी की प्रकाशित योजना-सूची में पंजीकृत सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रशिक्षण शिविरों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के आयोजन के लिए अनुदान तथा संबद्धता के प्रावधानों का उल्लेख है। पात्र संस्था के रूप में आवेदन करने से प्रशिक्षण और कार्यक्रमों के लिए सहयोग मिलने की संभावना तलाश की जा सकती है।
कलाकारों को केवल तालियां नहीं, अवसर भी चाहिए
अनूप पुरोहित जैसे कलाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अच्छी प्रस्तुति तैयार करना नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, विद्यार्थियों को प्रशिक्षण, आयोजन का खर्च और दर्शकों तक पहुंच बनाने की व्यवस्था कायम रखना भी है। इसलिए सरकार को चाहिए कि शास्त्रीय संगीत के युवा कलाकारों और प्रशिक्षण समूहों के लिए नियमित मंच तैयार करे। जिला और संभाग स्तर पर संगीत समारोह आयोजित हों, विद्यालयों-महाविद्यालयों में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुतियों को बढ़ावा मिले और पात्र कलाकारों को छात्रवृत्ति तथा संस्थाओं को आयोजन सहायता की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो।
इसके साथ निजी संस्थानों, उद्योगों और सामाजिक संगठनों को भी सांस्कृतिक आयोजनों के प्रायोजन के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। प्रायोजक संस्थाओं को मंच पर सम्मान और प्रचार का अवसर मिले, जबकि कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने तथा आर्थिक संसाधन जुटाने में मदद मिले। डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुतियों की रिकॉर्डिंग, ऑनलाइन टिकटिंग और सदस्यता आधारित कार्यक्रम भी दर्शकों का दायरा बढ़ा सकते हैं।
कलाकारों को योजनाओं की जानकारी देने के लिए स्थानीय स्तर पर सहायता केंद्र या नियमित परामर्श शिविर भी उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे उन्हें आवेदन प्रक्रिया, पंजीकरण, आवश्यक दस्तावेज और उपलब्ध अवसरों को समझने में सुविधा मिलेगी।
सुरों की साधना को मिले सतत समर्थन
स्वरांगन का वृंदगान यह याद दिलाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिभा के साथ धैर्य, प्रशिक्षण और अवसर भी जरूरी हैं। टिकट खरीदकर कार्यक्रम देखने पहुंचे दर्शकों ने यह संदेश दिया कि गुणवत्तापूर्ण कला के लिए समाज में जगह मौजूद है। अब जरूरत है कि इस उत्साह को नियमित आयोजनों और स्थायी सहयोग में बदला जाए।
सरकारी संरक्षण और कलाकारों की आत्मनिर्भरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। सरकार प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति और मंच उपलब्ध कराए; सांस्कृतिक संस्थाएं कलाकारों को अवसर दें; उद्योग और समाज प्रायोजन करें; और कलाकार अपनी मेहनत से दर्शकों का भरोसा अर्जित करें। यही समन्वय जोधपुर की संगीत परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मददगार हो सकता है।
अनूप पुरोहित और उनकी टीम की प्रस्तुति का महत्व इसी संभावना में है—कि सुरों की यह साधना कुछ घंटों के कार्यक्रम तक सीमित न रहे, बल्कि नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने वाला निरंतर सांस्कृतिक आंदोलन बने।







