बता क्या मिल गया तुझको मेरी कश्ती डूबोने से : कैफ़ी
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
सृजना द्वारा बुधवार की शाम डॉ मदन-सावित्री डागा साहित्य भवन में आयोजित भानु मित्र स्मृति काव्य संध्या में शहर के युवा एवं वरिष्ठ कवियों, शायरों और गीतकारों ने अपना जादू बिखेरा । कार्यक्रम के आरंभ में डॉक्टर राकेश रामावत ने स्वर्गीय भानुमित्र की स्मृतियों से जुड़े प्रसंग बताते हुए कहा कि 2151 गजलें लिखने वाले भानुमित्र का जीवन हिंदी गजल और उसके व्याकरण के इर्द-गिर्द ही रचा-बसा था । उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के स्वरूप को स्पष्ट और व्यापक करने के लिए “ग़ज़ल ग्रंथ” के चार भाग लिखे । इसके अलावा ‘ग़ज़ल गरिमा’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने पूरे देश में हिंदी गजल के छंद और व्याकरण को लोकप्रिय बनाया । भानुमित्र संभवत: देश के एकमात्र रचनाकार थे जिन्होंने अपनी ही पुस्तक “सूरज नया निकलने दो” को प्रकाशन के 15 वर्ष बाद खारिज कर दिया ।

मंचासीन कवयित्री डॉ. पद्मजा शर्मा ने “बिना किसी चाहना के देना ही असल में देना है”, कुलदीप सिंह भाटी ने “मां, मन, मौन और मुस्कान” कविता की “माँ के मन की बात नहीं जानी जा सकती माँ की जुबानी” से काव्य संध्या को गरिमा प्रदान की ।

इस काव्य संध्या में हबीब कैफ़ी ने “मोहब्बत के जो धब्बे हैं नहीं धुलते हैं धोने से बता क्या मिल गया तुझको मेरी कश्ती डुबोने से, मिला करती है आजादी किसी के बस में होने से, तुतले बोल बच्चों के बहुत महंगे हैं सोने से” ग़ज़ल पेश की । रेनू वर्मा ने “रोशनी पाँव जब उठाती है, तीरगी कांप-कांप जाती है”, अकमल नईम ने “उसने कहा जो औरत घर पर रहे शरीफ होती है, शरीफ औरत कहीं पर भी रहे शरीफ होती है”, अरमान जोधपुरी ने “एक अरसे बाद उसके होठों से जो फूटी हंसी, तब कहीं जाकर गांव में मेला लगा”, एन डी निम्बावत ने “चलो हम कोशिश करें ग़ज़ल लिखते हैं ” जबकि तृप्ति काव्यांशी ने “हमारे साथ कैसा छल हुआ है, शहर सारा ही चंबल हुआ है” जैसी गजलें पढ़ कर काव्य-संध्या को पुरअसर किया ।

दशरथ सोलंकी ने “अहंकार की बुलंद इमारत” कविता पढ़ते हुए “मैं हूं जो व्यघ्रता का शिकार हूं” पंक्ति पर वाहवाही हासिल की । डॉ सूरज माहेश्वरी ने “नन्हा तन है, कोमल मन है” गीत पेश किया । दीपा खेतावत ने “नेह कँवल खिलते देखा है” कविता प्रस्तुत की । निधि व्यास ने “लिखो तो कविवर ऐसे लिखना मेरे स्वाभिमान के अक्षर लिखना” प्रस्तुत कर काव्य सांझ को गरिमा दी । मंजू शर्मा ने “इंसाफ की डगर पर नेता दिखाओ चल कर” और मोहन वैष्णव ने राजस्थानी गीत प्रस्तुत किया ।

पूजा अग्रवाल ने “तलाश में हम समंदर किनारे बैठे हैं, परवाज तो मिले हम पंख पसारे बैठे हैं” रचना प्रस्तुत की । युवा कवि नितेश व्यास ने “ओ पखेरु ओ पखेरु पंख खोलो कुछ तो बोलो” कविता पढ़कर वाहवाही लूटी । डॉक्टर नीना छिब्बर ने “बो दो आंगन में बेरारतीब”, मनीषा डागा ने “रात को टिका लेना एक रात अपने हाथ पर”, कल्याण बिश्नोई ने “पेड़ धरती के बहुत पुराने किराएदार हैं” रचना पेश की । सीमा जोशी मूथा ने “मन का मौसम”, प्रमोद वैष्णव ने “कभी दिल का सूनापन भी तुम्हें छू जाता तो अच्छा होता”, कुंतल हर्ष ने “होम मेकर”, युवा कवि प्रदीप ने उर्मिला की वेदना”, अमित भंडारी ने “अक्सर खास बनने को गिर जाते हैं लोग”, अमिता पांडे ने “बांधना चाहती थी समय को”, सुरभि खींची ने “उसने आकाश चुन लिया” कविताएँ पेश कीं ।


युवा कवयित्री दीपिका रूहानी ने “कह चुका हूं मैं अब थक चुका हूं मैं” कविता से काव्य संध्या का आरंभ किया । रिंकल ने “तुम्हें चलते रहना है तुम्हें सूरज बनना है” कविता पेश की । ओम प्रकाश गोयल ने “दे कर मुझको धोखा तूने अच्छा नहीं किया है”, रोशन ने “मिलन होता नहीं”, सत्यनारायण ने “राजनीति का फंडा” रचना प्रस्तुत की ।
कार्यक्रम में प्रो आर के गोयल, कमलेश तिवारी, राजेन्द्र सिरोही, महेश पंवार,हरीदास व्यास सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे । कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन पूजा अग्रवाल ने किया ।







