डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित की कहानी ‘जिसके पीछे संसार चला’ पर श्री वेद रतन की टिप्पणी

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उदित भास्कर पाठकों की मिली टिप्पणी प्रकाशित कर रहा है। हम कहानीकार और पाठकों के बीच केवल सेतु का काम कर रहे हैं। उदित भास्कर इस बहस में कहीं शामिल नहीं है। -संपादक। 

क्षमा केवल जैन धर्म सिखाता है यह कहना उचित नहीं : श्री वेद रतन

क्षमा आत्मा का अत्यन्त दुर्लभ गुण है। और सबसे बड़ा बल है। लेकिन यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल जैन धर्म क्षमा सिखाता है। मूल रूप से धर्म एक है जो कि शाश्वत है और सनातन है। सनातन से यह मतलब नहीं है जो हम टेलीवीज़न की डिबेट में सुनते है। वह नासमझ लोगों की बकवास मात्र है। वह लोग सनातन धर्म कहते हैं। जबकि बात उल्टी है । धर्म सनातन है। सनातन का अर्थ है सदा से से और सदा रहेगा। वही धर्म शाश्वत हो सकता है। उसी धर्म की चर्चा कृष्ण ने अर्जुन से की है। जैन धर्म के शास्त्र अभी तक कृष्ण को माफ नहीं कर पाएं है।वह कृष्ण को सातवें नर्क में डाल चुके हैं। जबकि कृष्ण सभी श्रोतों के श्रोत है। वह भगवान महाबीर के भी श्रोत हैं। हम ऊपर ऊपर क्षमा का ढोंग करते हैं। और भीतर अक्सर हम एक दूसरे को क्षमा नहीं कर पाते हैं और उसी पल परम चैतन्य से कट जाते हैं। और क्राइसेस हैपन होती है। यही सिद्धांत डॉक्टर एडवर्ड बैच ने भी दिया है। जो कि शास्त्र सम्मत है। इसी लिए डॉक्टर एडवर्ड बैच ने स्पष्ट शब्दों में उद्घोषणा की है। हम सभी अपने दुःखो के स्वयं जिम्मेदार हैं। जो भी व्यक्ति इस जिम्मेदारी को समझ जायेगा उसकी सेल्फ हीलिंग यात्रा शुरू हो जाएगी। क्षमा रूपी गुण को विकसित करने के लिए डॉक्टर बैच ने विलो नामक फ्लॉवर रेमेडी बनाई जो अद्भुत काम करती है। और होम्योपैथी में नाइट्रिक एसिड इसी क्षमा शीलता को प्रमोट करती है।

धार्मिक लोग अधिक खतरनाक तरीके सूक्ष्म अहंकार से पोषित हो जाते हैं वह नियमों को तोते की तरफ दोहराते हैं लेकिन उसका पालन नहीं कर पाते हैं इसी लिए उनको अनुगमन करने वाले लोग भी पाखण्डी होते हैं। इसीलिए दुनिया आज बारूद की ढेर पर खड़ी है। आप कार्पोरेट कल्चर में चले जाएं तो आपको लोग हर बात में सॉरी और पार्डन जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं। लेकिन वह दिखाते तो इस तरह हैं कि वह कितने क्षमा शील है और विनम्र हैं। लेकिन यह विनम्रता झूठी और ओढ़ी हुई होती है। आज के समय में एक शब्द बहुत प्रचलित है एमपथी । लेकिन इसके पीछे मात्र लोग विनम्रता का चोला ओढ़े हुए होते हैं।

वास्तव में जिस व्यक्ति ने क्षमा के गुण को विकसित कर लिया उसकी आध्यात्मिक यात्रा स्वतः शुरू हो जाती है। भगवान महावीर को नगन होने के लिए विचार नहीं करना पड़ा था , अभ्यास नहीं करना पड़ा था। जैसे ही धर्म फलित हुआ वह नगन हो गए। इससे शिक्षा मिलती है। हमें धर्म को धारण करना है और इसके धारण करते ही सारी चीजें स्वतः फलित होगी। इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हो जाता है कि धर्म क्या है ?

कहानी : जिसके पीछे संसार चला : लेखक- डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित

कहानी : जिसके पीछे संसार चला : लेखक- डॉ. अरविंद कुमार पुरोहित

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