कहानी : बाप की औकात : कहानीकार- हरसहाय ‘हर्ष’

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बाप की औकात

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आज मैं मेरे घर की हालत देखकर दुखी था क्योंकि अब वह घर नहीं है सिर्फ एक मकान है जहां कोई रिश्ता नहीं रहता, कोई रिश्तेदार नहीं आता, कोई दूर से अरे भाया, बडवाड़ी, मेंबर साहब जैसी आवाज लगाता हुआ नहीं आता। जहां आज चहल-पहल नहीं है, रौनक नहीं है, हंसी-ठिठोली नहीं है, हुक्के की गुड़बड़हट नहीं है इसलिए ये सिर्फ मकान है घर नहीं और यह सब है मेरे बाप की ना मौजूदगी के कारण…इसी कहानी से…

आज गांव थोड़ी फुर्सत से आया हुआ था। आज मेरे पास वह पहले जैसी जल्दबाजी व भाग दौड़ नहीं थी, इसलिए बैठकों वाले कमरों के सामने नीम के नीचे बिछी चारपाई पर आराम से देसी अंदाज में बैठा था। बैठे-बैठे बैठकों को निहार रहा था, चबूतरो को देख रहा था, जिनकी आज हालत खस्ता हो रखी है और देखते सोचते मैं अतीत में चला गया, आज इस दो मंजिला मकान में कोई नहीं रहता, जब तक पिताजी जीवित थे इस मकान में गजब की चहल- पहल हुआ करती थी। बेटे,बहु, पोता, पोती हर रिश्ता रहता था इस घर में, इतना ही नहीं रिश्तेदारों का आना-जाना भी लगा रहता था।

पिताजी का व्यवहार रिश्तेदारों के लिए बहुत अच्छा हुआ करता था क्योंकि पिताजी भी रिश्तेदारी में आते-जाते रहते थे। गांव वालों की चहल-पहल रहती थी। हर जाति का आदमी घर आता रहता था। “राम-राम मेंबर साहब” जैसे संबोधन से बुलाया जाता था, पिताजी को मेंबर, बड़वाड़ी (भाइयों में बड़ा) बढ़घर (परिवार में बड़ा) भाया, लंबरदार, बाबा आदि शब्दों से बुलाया जाता था, और हम सभी भाई-बहन उन्हें काका कहकर बुलाते थे।

जब काका वहां रहते थे तब हुक्के की गुड़गुड़ाहट चलती रहती थी, परिवार के लोग आते रहते थे जो खुद ही चिलम भरकर लाते और काका को हुक्का देकर हुक्का पीना शुरू करते थे क्योंकि काका उन सबमें बड़े हुआ करते थे और हुक्के का उसूल है सबसे पहले बड़े को दिया जाता है। सुबह जल्दी व देर रात्रि तक दस-पांच आदमी जरूर बैठे रहते थे। सर्दियों में भी काका जल्दी उठ जाते थे और कऊ जला लिया करते थे और सभी सुबह-शाम कऊ पर तप करते रहते थे। कितना अच्छा समा हुआ करता था वह, किस्से-कहानी, आप-बीती, जग-बीती, खेती-बाड़ी, पशुपालन आदि दुनियादारी की बातें हुआ करती थी।

क्या समय था वह, विशेष कर मेरे लिए तो बहुत विशेष था क्योंकि जब निराशा, हताशा और उदासी होती नहीं थी, कभी होती भी थी तो काका की कही हुई बात हौंसला बढ़ाती थी वह कहते थे “कर्ता से तो करतार भी हारता है” यानी आप मेहनत करोगे तो ईश्वर को भी आपको सफलता देनी पड़ेगी। मां भी एक बात कहती थी कि “बेटा अपने रस्ते जाणों, अपने रस्ते आणों” सच में मां-बाप अपनी संतान को बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी सीख दे देते हैं। आज मैं मेरे घर की हालत देखकर दुखी था क्योंकि अब वह घर नहीं है सिर्फ एक मकान है जहां कोई रिश्ता नहीं रहता, कोई रिश्तेदार नहीं आता, कोई दूर से अरे भाया, बडवाड़ी, मेंबर साहब जैसी आवाज लगाता हुआ नहीं आता। जहां आज चहल-पहल नहीं है, रौनक नहीं है, हंसी-ठिठोली नहीं है, हुक्के की गुड़बड़हट नहीं है इसलिए ये सिर्फ मकान है घर नहीं और यह सब है मेरे बाप की ना मौजूदगी के कारण, उनका दुनिया से रुखसत हो जाने के कारण। जब तक उनकी छत्रछाया सर पर थी तब तक जीवन बहुत आसान था। जीवन में संघर्ष जैसा कुछ नहीं था, हर समस्या का समाधान उनके पास मिल जाता था।

ऐसा लगता है कि उनके सामने सब मेरी कद्र करते थे और अब कोई नहीं करता। पिता चाहे बीमार हो बदन से कमजोर हो फिर भी वह पहाड़ की तरह खड़ा होता है अपनी संतान के लिए, उसके पास अनुभव रूपी एक ऐसा खजाना होता है जिसमें सभी समस्याओं का समाधान होता है। वाकई मेरे बाप की क्या औकात थी यह आज अच्छे से मालूम पड़ रहा है मुझे। सिर्फ मेरे बाप की नहीं हर बाप की इतनी ही बड़ी औकात होती है बस जरूरत है उसे पहचानने की और समझने की।

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