बिग ब्रेकिंग… करप्शन के आरोपों में घिरे शिखर अग्रवाल, आईएएस की मुंबई अनंता प्रोजेक्ट्स में 400 कमरों में से 200 कमरों का निवेश,अरबों की सम्पत्ति का हुआ निवेश…पुष्टि बाकी

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राजस्थान के वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल, उनकी IPS पत्नी प्रशाखा माथुर और परिवार के सदस्यों से जुड़ी संपत्तियों की खरीद को लेकर प्रकाशित एक रिपोर्ट ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू कर दी है। मुंबई अनंता प्रोजेक्ट में 400 कमरों में से 200 कमरों का निवेश…अरबों की संपत्ति के निवेश होने के आरोप ने कई सवाल खड़े गए…

दिलीप कुमार पुरोहित. मुंंबई

करप्शन के आरोपों में घिरे शिखर अग्रवाल,आईएएस की मुंबई अनंता प्रोजेक्ट्स में 400 कमरों में से 200 कमरों का निवेश,अरबों की सम्पत्ति के निवेश होने के आरोप लगे हैं। अभी इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। पता चला है कि नामी प्रोजेक्ट्स में आधे भाग की हिस्सेदारी,अन्य स्थानों पर भी बड़े निवेश की प्रबल संभावना,अलवर और उदयपुर तो सिर्फ़ एक टेलर है।

बताया जाता है कि मुंबई में करजत जगह है जहाँ अनंता ग्रुप का बड़ा रिसोर्ट बन रहा है । जिसमे शिखर अग्रवाल IAS की 50 % की हिस्सेदारी बताने की जानकारी मिली है। यह करीब 400 रूम का अरबों रुपयों का बड़ा प्रोजेक्ट्स है। बताया जाता है कि शिखर अग्रवाल ने राजस्थान के मुख्यमंत्री के ओएसडी और उद्योग विभाग की जिम्मेदारी के दौरान की चुनिंदा कंपनियों से बड़ी डील की थी। सभी डील में कंपनियों ने शिखर अग्रवाल पर गंभीर आरोप लगे हैं। शिखर अग्रवाल के बारे में हनुमान बेनीवाल बातों ही बातों में इशारा कर चुके हैं कि इसके 20-20 ससुराल है। अब इस मामले की सीबीआई जांच की मांग उठने लगी है। बताया जा रहा है कि सीबीआई मामले की जांच करे तो 1000 करोड़ से बड़ा मामला उजागर हो सकता है। बताया जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का कमाऊ पूत अब  शिकंजे में है।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान के वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल, उनकी IPS पत्नी प्रशाखा माथुर और परिवार के सदस्यों से जुड़ी संपत्तियों की खरीद को लेकर प्रकाशित एक रिपोर्ट ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, परिवार ने करीब ढाई साल के दौरान उदयपुर और अलवर स्थित अनंता रिसॉर्ट से जुड़े 40 विला और कॉटेज खरीदे। इन संपत्तियों की कुल खरीद कीमत लगभग 6.16 करोड़ रुपये बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संपत्तियों को खरीदने के बाद उसी कंपनी को लीज पर दे दिया गया, जिससे सालाना 1.80 करोड़ रुपये की लीज आय निर्धारित हुई।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल संपत्तियों की खरीद, लीज व्यवस्था, धन के स्रोत और अधिकारियों के वार्षिक अचल संपत्ति विवरण यानी इम्मूवेबल प्रॉपर्टी रिटर्न (IPR) में दर्ज जानकारियों को लेकर हैं। हालांकि, संपत्ति खरीदना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। किसी नियम का उल्लंघन हुआ या नहीं, इसका निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों, लागू सेवा नियमों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

उदयपुर और अलवर में कहां खरीदी गईं संपत्तियां?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, संपत्ति खरीद के दो प्रमुख चरण सामने आए हैं। पहला, उदयपुर के बुझाड़ा स्थित अनंता रिसॉर्ट में सितंबर 2023 में 20 कॉटेज खरीदे गए। दूसरा, अलवर जिले के अजबगढ़ स्थित अनंता रिसॉर्ट में मार्च 2026 में 20 विला की रजिस्ट्री कराई गई। इन संपत्तियों का संबंध गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड से बताया गया है, जो अनंता ब्रांड के तहत होटल और रिसॉर्ट संचालित करती है। रिपोर्ट के अनुसार, उदयपुर के बुझाड़ा में 20 कॉटेज की रजिस्ट्री 29 सितंबर 2023 को हुई, जबकि अलवर के अजबगढ़ में 20 विला की रजिस्ट्री 27 मार्च 2026 को कराई गई। इन दोनों सौदों को मिलाकर परिवार की ओर से 40 संपत्तियां खरीदने की जानकारी सामने आई है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि रिपोर्ट में बताई गई खरीद का संबंध राजस्थान के उदयपुर और अलवर स्थित रिसॉर्ट संपत्तियों से है। इसी तरह मुंबई के किसी अनंता प्रोजेक्ट में 400 कमरों में से 200 कमरों के निवेश का दावा भी किया जा रहा है। अभी-अभी यह जानकारी मिली है, मगर इसकी अभी पुष्टि होना बाकी है।

6.16 करोड़ रुपये की खरीद और लीज से 1.80 करोड़ सालाना आय का दावा

प्रकाशित रिपोर्टों में 40 विला-कॉटेज की कुल खरीद कीमत लगभग 6 करोड़ 16.5 लाख रुपये बताई गई है। साथ ही यह दावा किया गया है कि खरीद के बाद सभी संपत्तियां उसी कंपनी को लीज पर दे दी गईं, जिससे वे खरीदी गई थीं।

रिपोर्ट में बताए गए किराये के अनुसार, उदयपुर के 20 कॉटेज के लिए प्रति कॉटेज चार लाख रुपये सालाना और अलवर के 20 विला के लिए प्रति विला पांच लाख रुपये सालाना की दर निर्धारित की गई। इस गणना के आधार पर कुल वार्षिक लीज आय 1.80 करोड़ रुपये बैठती है।

यह व्यवस्था अपने आप में जांच योग्य कई वित्तीय सवाल पैदा करती है। मसलन, संपत्तियों की कीमत किस आधार पर तय की गई? खरीद के लिए धन कहां से आया? लीज की शर्तें क्या हैं? क्या बताई गई सालाना आय वास्तविक भुगतान से मेल खाती है? क्या संपत्तियों की बाजार कीमत और पंजीकृत कीमत में कोई महत्वपूर्ण अंतर है?

इन सवालों के उत्तर के लिए बिक्री विलेख, लीज दस्तावेज, भुगतान का रिकॉर्ड और संबंधित वित्तीय विवरण देखना जरूरी होगा। केवल खरीद और लीज की प्रकाशित राशि के आधार पर किसी अनियमितता या अनुचित लाभ का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

IPR में संपत्ति विवरण को लेकर सवाल

इस प्रकरण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू अधिकारियों के वार्षिक अचल संपत्ति विवरण से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, 40 संपत्तियों में से 28 शिखर अग्रवाल और प्रशाखा माथुर के नाम दर्ज बताई गई हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि शिखर अग्रवाल ने अपने 7 जनवरी 2026 को दाखिल IPR में 14 संपत्तियों का विवरण दिया था, जबकि प्रशाखा माथुर के 8 जनवरी 2026 को दाखिल विवरण में संपत्तियों का विवरण दिखाई नहीं देने पर सवाल उठे। हालांकि, किसी सार्वजनिक अधिकारी के संपत्ति विवरण में जानकारी की स्थिति समझने के लिए मूल IPR दस्तावेज, उसमें प्रयुक्त श्रेणियां, संलग्नक और संबंधित सेवा नियम देखना आवश्यक है। केवल किसी ऑनलाइन विवरण में जानकारी न दिखना अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करता कि संपत्ति जानबूझकर छिपाई गई। यह जांचना होगा कि संपत्तियों का विवरण नियमानुसार घोषित किया गया था या नहीं, कोई अतिरिक्त दस्तावेज संलग्न थे या नहीं और क्या संबंधित अधिकारियों ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया।

शिखर अग्रवाल का क्या पक्ष सामने आया?

इस प्रकरण पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, शिखर अग्रवाल ने संपत्तियों की खरीद की पुष्टि की और कहा कि बुझाड़ा तथा अजबगढ़ की संपत्तियों की जानकारी IPR और संबंधित रिटर्न में दी गई है। रिपोर्ट में उनके हवाले से यह भी बताया गया कि जानकारी दस्तावेजों में गलत स्थान पर संलग्न हो जाने के कारण दिखाई देने में भ्रम पैदा हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों बेटों ने अपने-अपने हिसाब से संपत्तियां खरीदी हैं। यह उनका प्रकाशित पक्ष है। इसकी पुष्टि के लिए संबंधित IPR की मूल प्रतियां, संलग्नक और संपत्ति पंजीकरण दस्तावेजों का मिलान आवश्यक होगा। दूसरी ओर, संपत्ति विवरण को लेकर उठे सवालों का अंतिम समाधान संबंधित दस्तावेजों की आधिकारिक जांच से ही हो सकता है।

क्या संपत्ति खरीदना भ्रष्टाचार का प्रमाण है?

किसी IAS या IPS अधिकारी अथवा उनके परिवार के सदस्य का संपत्ति खरीदना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। लेकिन यदि संपत्ति विवरण में घोषित और पंजीकृत संपत्तियों के बीच अंतर सामने आता है, तो उस अंतर को स्पष्ट करना जरूरी है। इसी तरह, यदि किसी सौदे में बाजार मूल्य, वित्तीय स्रोत या लीज व्यवस्था को लेकर सवाल हैं, तो उन्हें दस्तावेजों के आधार पर जांचा जाना चाहिए।

यह भी आवश्यक है कि परिवार के अलग-अलग सदस्यों की संपत्तियों को कानूनी स्वामित्व और वास्तविक वित्तीय योगदान के आधार पर अलग-अलग समझा जाए। परिवार के किसी सदस्य के नाम संपत्ति होने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि उसका पैसा किसी अन्य सदस्य ने दिया या कोई सेवा नियम टूटा। इसके लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं।

अब किन सवालों के जवाब जरूरी हैं?

इस प्रकरण में पारदर्शिता के लिए कुछ बुनियादी जानकारियां सामने आनी चाहिए:

  • सभी 40 संपत्तियों की रजिस्ट्री में दर्ज कीमत और तारीख क्या है?
  • संपत्तियों की खरीद के लिए धन का स्रोत क्या था?
  • लीज की शर्तें, अवधि और वास्तविक भुगतान का विवरण क्या है?
  • संबंधित अधिकारियों के मूल IPR और संलग्नकों में संपत्तियों का उल्लेख किस रूप में है?
  • क्या संबंधित विभाग ने इन संपत्तियों के विवरण और लागू सेवा नियमों के अनुपालन की जांच की है?
  • यदि कोई अंतर पाया गया, तो उसका स्पष्टीकरण और आधिकारिक निष्कर्ष क्या है?

इन सवालों के उत्तर से ही यह स्पष्ट होगा कि मामला सामान्य संपत्ति निवेश का है, दस्तावेजों में किसी प्रकार की त्रुटि का है या किसी नियम के उल्लंघन की जांच की आवश्यकता है।

आरोप नहीं, दस्तावेजों से स्पष्ट हो सच्चाई

उदयपुर और अलवर में 40 विला-कॉटेज की खरीद तथा उन्हें उसी कंपनी को लीज पर देने की रिपोर्ट ने सार्वजनिक अधिकारियों की संपत्ति घोषणाओं और पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। लगभग 6.16 करोड़ रुपये की खरीद और 1.80 करोड़ रुपये सालाना लीज आय के प्रकाशित आंकड़े मामले को वित्तीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं। अब जरूरत है कि संबंधित दस्तावेजों, वित्तीय स्रोतों, लीज समझौतों और संपत्ति घोषणाओं का तथ्यात्मक मिलान हो। यदि सब कुछ नियमानुसार है, तो रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि किसी नियम के उल्लंघन का प्रमाण मिलता है, तो सक्षम प्राधिकारी को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। जनता का सवाल साफ है—संपत्तियों की खरीद और लीज से जुड़े दस्तावेज क्या बताते हैं, और संपत्ति विवरण पर उठे सवालों का आधिकारिक जवाब क्या है? इस सवाल का समाधान आरोपों से नहीं, पारदर्शी और निष्पक्ष जांच से ही संभव है।

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