प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी! हमारा सिंघम राजनेताओं, आईपीएस-आईएएस अधिकारियों के निशाने पर है, क्या आपके होते उसे न्याय मिलेगा?

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सत्ता के शिखर से उत्तार दिए गए दो पूर्व मुख्यमंत्रियों, 8 आईएएस, 8 आईपीएस के दांव-पेंच में उलझे सिंघम आईपीएस पंकज चौधरी की लड़ाई अपराधियों के साथ-साथ सिस्टम के माफियाओं से भी है…17 अक्टूबर 2025 को आईपीएस पंकज चौधरी ने गृह मंत्री अमित शाह को जो पत्र लिखा है वो रौंगटे खड़े करने वाला है। आईपीएस चौधरी की न्याय पालिका में गहन आस्था है, मगर क्या न्याय पालिका न्याय की रक्षा कर पाएगा? पढ़िए खास रिपोर्ट-

यही नहीं पहली बार आईपीएस-आईएएस और सिविल सेवाओं को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव…सब एक साथ…। 

दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर

9783414079 uditbhaskarnews@gmail.com

मेरे मित्र हैं आईपीएस पंकज चौधरी। उम्र में मुझसे कुछ छोटे हैं तो छोटे भाई भी कह सकते हैं। मैं उनके जुझारूपन और धैर्य का कायल हूं। उन्होंने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।  पुलिस की नौकरी में उन्होंने अपने आपको सिंघम की तरह स्थापित करने का सपना देखा था और तेज तर्रार आईपीएस अधिकारी के रूप में उनकी धमाकेदार एंट्री हुई थी जब उन्होंने जैसलमेर जैसे सीमावर्ती जिले में एसपी रहते हुए हिस्ट्रीशीटर गाजी फकीर की फाइल खोल दी थी और सालेह मोहम्मद के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। सर्विस का तजुर्बा नहीं था, नौजवान खून था और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था। नतीजा सामने था- तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक शिकायतें पहुंची और 48 घंटे में आईपीएस पंकज चौधरी का ट्रांसफर हो गया।

जी, हां यह है हमारा सड़ा गला सिस्टम। जो अशोक गहलोत अपने को पाक दामन साबित करने और जादूगर का राग अलापते हैं, उन्होंने एक गद्दार को बचाने के लिए एक ईमानदार पुलिस अफसर को उसकी औकात दिखा दी। अशोक गहलोत का जादू अब ढल चुका है। राजनीति में वे अपने को फिर से स्थापित करने के लिए एडी चोटी का चोर लगा रहे हैं या कहें कि एडिया रगड़ रहे हैं। उनका भविष्य क्या है? यह तो राम ही जाने, मगर जब तक ऐसे राजनेता बने रहेंगे तब तक ईमानदार और देशप्रेमी पुलिस अफसरों की राह आसान नहीं रहेगी। यह बात हम उस पुलिस अफसर के अब तक के कॅरिअर के उतार-चढ़ाव के आधार पर कह रहे हैं, जिसने सिस्टम में रहते हुए भी उम्मीद की किरण नहीं छोड़ी। यह आशावादी पुलिस अफसर है, जिसे उम्मीद है कि कोई तो उन्हें सुनेगा, समझेगा और उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन देरी से न्याय मिलना न्याय की श्रेणी में गिना जाएगा?…।

एक पत्र जो देश के सिस्टम को बेनकाब करता है… राजनेताओं ने देश को जूते की नोंक पर रख दिया…नौकरशाहों पर लगाम कसनी ही होगी? मतलब परस्त आईएएस-आईपीएस अफसरों ने देश को बर्बाद कर दिया है…।

जब सिंघम गरजा…गृह मंत्रालय हिल उठा?…

17 अक्टूबर 2025 को एक पत्र आईपीएस पंकज चौधरी की ओर से गृह मंत्री अमित शाह को लिखा जाता है। हम अपनी बात इस पत्र को आधार बनाकर ही कहने का साहस कर रहे हैं। आईपीएस पंकज चौधरी ने अमित शाह को लिखे अपने पत्र में कहा- मैं राजस्थान कैडर का वर्ष 2009 बैच का आईपीएस अधिकारी हूं। वर्ष 2011 में ट्रेनिंग व प्रोबेशनर के तौर पर राजस्थान कैडर में ज्वाइनिंग दी। फिर पंकज चौधरी लिखते हैं कि उनका पारिवारिक प्रकरण जिनका निस्तारण इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किया गया था। परंतु तत्कालीन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया ने इसे जटिल रूप प्रदान करते हुए न्यायालय के आदशों की अवहेलना करते हुए अवैध चार्जशाीट जारी करते हुए एक भ्रष्ट व दागी अधिकारी रविशंकर श्रीवास्तव आईएएस को जांच अधिकारी नियुक्त किया। विदित है कि श्रीवास्तव भ्रष्टाचार के केस में 6 वर्ष निलंबित रहने के साथ कई आरोपों से घिरे दागी अधिकारी रहे हैं। इस प्रकार वर्ष 2016 में राज्य सरकार द्वारा जारी अवैध चार्जशीट को एक दागी अधिकारी से जांच करा भारत सरकार को सर्विस से रिमूव करने की अनुशंसा वर्ष 2017 में कर दिया गया। वर्ष 2019 में रिमूवल के आदेश को चुनौती दी गई और प्रधान पीठ, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण नई दिल्ली ने 10 दिसंबर 2020 को पारित आदेश में राज्य सरकार द्वारा जारी आदेश को अवैध माना व जांच अधिकारी रविशंकर श्रीवास्तव पर आपत्ति रिकॉर्ड किया। दोनों (तत्कालीन) मुख्यमंत्रियों अशोक गहलोत व वसुंधरा राजे सिंधिया ने पारिवारिक प्रकरण को अनावश्यक उलझाया व न्यायालय के निर्णयों को नजरअंदाज भी किया। वर्ष 2021 से सर्विस में बहाल होने के के उपरांत न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप समस्त परिलाभ प्रदान किए जाने थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील के साथ सुप्रीम कोर्ट में भी एसएलपी दाखिल कराया ताकि सर्विस में आने की संभावना समाप्त की जा सके। सुप्रीम कोर्ट व दिल्ली हाईकोर्ट से प्रकरण में निर्णय के उपरांत तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सर्विस में बहाल कराया परंतु उसके उपरांत अन्य सर्विस परिलाभ प्रदान नहीं किए।

इस संदर्भ में दर्जनों अभ्यावेदन मुख्य सचिव, गृह सचिव व कार्मिक सचिव को प्रेषित किए गए। वसुंधरा राजे सिंधिया ने वर्ष 2016 में पारिवारिक मामले में फर्जी चार्जशीट के अलावा अन्य फर्जी चार्जशीट भी जारी करवाई ताकि पंकज चौधरी का सर्विस में बने रहना असंभव हो जाए। इस दौरान कई अधिकारियों को कार्य सौंपा गया। जिसका उन्होंने अक्षरश: पालन किया ताकि इस कार्य के एवज में उनसे वांछित लाभ मिले। इस कड़ी में नामजद अधिकारी जिन्होंने साजिश व षड़यंत्र के तहत असवैधानिक प्रक्रिया को अपनाना प्रारंभ किया और स्पष्ट तौर पर प्रताडित करने की मंशा से आईपीएस पंकज चौधरी के सर्विस में प्रमोशन व पोस्टिंग में बुरी तरह टारगेट किया, जिसमें कई अधिकारियों ने खलनायक की भूमिका अदा की। आईपीएस पंकज चौधरी ने जो गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा था उसका हम हूबहू वर्णन कर रहे हैं। इसे पढ़ने से लगता है कि इस अधिकारी को बुरी तरह प्रताड़ित किया गया है और यह अधिकारी राजनीतिज्ञों की कुंठाओं के साथ-साथ कई भ्रष्ट और नाकारा अधिकारियों की मनमर्जियों का भी शिकार हुए। हम उदित भास्कर के माध्यम से आईपीएस पंकज चौधरी के इस पत्र को सार्वजनिक कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट से मांग करते हैं कि ऐसे जाबांज और देशभक्त आईपीएस अधिकारियों की राह आसान करें और उन्हें प्रताड़ित करने वाले अधिकारियों और राजनीतियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

किन-किन राजनेताओं, आईएएस और आईपीएस के खिलाफ चौधरी ने आरोप लगाए? और क्या आरोप लगाए?

1- वसुंधरा राजे : पारिवारिक प्रकरणको उलझाया। फर्जी चार्जशीट जारी कराया। 9 फर्जी अभियान चलाए।

2-अशोक गहलोत : पारिवारिक प्रकरण में न्यायालय द्वारा जारी बहाली के आदेश को अपील के जरिए उलझाया। न्यायालय के निर्णय के तहत पालना नहीं कराया। प्रमोशन व पोस्टिंग से प्रायोजित रूप से वंचित किया।

3-तन्मय कुमार आईएएस : तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्देशन में असवैधानिक प्रक्रिया अपनाया।

4-कपिल गर्ग, रिटायर्ड आईपीएस : तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निर्देशन व संरक्षण में असवैधानिक प्रक्रिया अपनाया।

5-राजीव दासौत, रिटायर्ड आईपीएस : तत्तकालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्देशन व संरक्षण में असवैधानिक प्रक्रिया अपनाया।

6- बीएल सोनी रिटायर्ड आईपीएस : अशोक गहलोत के निर्देशन व संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड़ में छवि को सुनियोजित तरीके से धूमिल कराने का प्रयास किया।

7-भूपेंद्र यादव रिटायर्ड आईपीएस : अशोक गहलोत के निर्देशन व संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड में छवि को सुनियोजित तरीके से धूमिल कराने का प्रयास किया।

8-सौरभ श्रीवास्तव रिटायर्ड आईपीएस : अशोक गहलोत के निर्देशन व संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड में छवि को सुनियोजित तरीके से धूमिल कराने का प्रयास किया।

9-मनोज भट्‌ट रिटायर्ड आईपीएस : वसुंधरा राजे के निर्देशन व संरक्षण में ट्रेनिंग पीरियड में छवि को सुनियोजित तरीके से धूमिल कराने का प्रयास किया।

10-डीबी गुप्ता, रिटायर्ड आईएएस : चार्जशीट जारी कराने व रिमूवल में सक्रिय योगदान।

11-अशोक जैन, रिटायर्ड आईएएस : पारिवारिक प्रकरण में जारी फर्जी चार्जशीट के जांच अधिकारी दागी व भ्रष्ट अधिकारी रवि शंकर श्रीवास्तव रिटायर्ड आईएएस को संरक्षण प्रदान किया जाना व जांच रिपोर्ट की एवज में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा भ्रष्टाचार केस से मुक्ति व प्रमोशन का उपहार दिया जाना।

12-हेमंत गेरा, आईएएस : कार्मिक सचिव रहते हुए नियम विरुद्ध व अवैधानिक पैंडेसी रखना ताकि प्रमोशन व पोस्टिंग पर दुष्प्रभाव पड़े।

13-सुधांशु पंज, आईएएस (मुख्य सचिव) राजस्थान : न्यायालय द्वारा आईपीएस पंकज चौधरी के पक्ष में आए निर्णयों की पालना सुनिश्चित नहीं कराया जाना। प्रकरणों में अनावश्यक पैंडिंग रखा जाना ताकि प्रमोशन व पोस्टिंग पर दुष्प्रभाव पड़े। आईपीएस पंकज चौधरी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होना।

14-शिखर अग्रवाल, आईएएस (मुख्यमंत्री कार्यालय) : न्यायालय द्वारा आईपीएस पंकज चौधरी के पक्ष में आए निर्णयों की पालना सुनिश्चित नहीं कराया जाना। प्रकरणों में अनावश्यक पैंडिंग रखा जाना ताकि प्रमोशन व पोस्टिंग पर दुष्प्रभाव पड़े।

15-भास्कर ए. सावंत, आईएएस (प्रमुख शासन सचिव, गृह) : न्यायालय द्वारा आईपीएस पंकज चौधरी के पक्ष में आए निर्णयों की पालना सुनिश्चित नहीं कराया जाना। प्रकरणों में अनावश्यक पैंडिंग रखा जाना ताकि प्रमोशन व पोस्टिंग पर दुष्प्रभाव पड़े।

16-केके पाठक, आईएएस (कार्मिक सचिव) : न्यायालय द्वारा आईपीएस पंकज चौधरी के पक्ष में आए निर्णयों की पालना सुनिश्चित नहीं कराया जाना। प्रकरणों में अनावश्यक पैंडिंग रखा जाना ताकि प्रमोशन व पोस्टिंग पर दुष्प्रभाव पड़े। आईपीएस पंकज चौधरी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होना।

17-आनंद श्रीवास्तव आईपीएस : प्रमोशन व पोस्टिंग में व्यवधान पैदा करना व समय-समय पर छवि धूमिल करने का प्रयास।

18-गौरव श्रीवास्तव, आईपीएस : वर्तमान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को गलत तथ्य रखना व शिष्टाचार भेंट से वंचित किया जाना।

और क्या लिखा है आईपीएस पंकज चौधरी ने अपने पत्र में…

षड़यंत्र के तहत जारी चार्जशीटों को अवैधानिक रूप से कई वर्षों तक बिना कारण पेंडिंग रखा गया ताकि प्रमोशन व पोस्टिंग में इसे बाधक मानते हुए तर्कसंगत बताया जाए। समस्त चार्जशीट को अवैधानिक व असंगत होने के कारण निरंतर मुख्य सचिव, गृह सचिव व कार्मिक सचिव को पत्राचार किया जाता रहा। सभी पत्रों पर बेहद असंवेदनशील प्रक्रिया को अपनाते हुए वर्षों विचाराधीन रखा गया। वरन सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई सैकड़ों महत्वपूर्ण सूचनाओं पर दुर्भावनापूर्ण रवैये के तहत सूचना प्रदान नहीं किया गया। जिनमें अधिकांश प्रकरण द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग में विचाराधीन है। कार्मिक व पेंशन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी निर्देश जिनमें किसी चार्जशीट पर 6 माह व अधिकतम 1 वर्ष में निपटाने का स्पष्ट निर्देश है। इसके बावजूद भी कई वर्षों तक चार्जशीट को पेंडिंग रखा गयाजो राज्य सरकार के पारदर्शिता व गुड-गवर्नेंस पर सवाल भी खड़ा करता है।

न्यायालय में समस्त प्रकरणों पर स्पष्ट निर्देश जारी किए, पर दुर्भावनापूर्ण तरीके से इन पर भी असवेदनशीलता दिखाई गई व प्रकरणों का निस्तारण करने की बजाय पेंडिंग रखा गया। जिससे आईपीएस पंकज चौधरी के प्रमोशन व पोस्टिंग में अमानवीय तरीके से रोक लगाई गई। उपरोक्त नामजद समस्त जनप्रतिनिधि, नौकरशाहों ने आईपीएस पंकज चौधरी को प्रताड़ित करने के लिए अपने-अपने मुखिया के निर्देश अनुरूप अवैधानिक प्रक्रिया अपनाया जो दस्तावेजों के सूक्ष्म अध्ययन से स्पष्ट है। राजीव दासौत पूर्व आईपीएस व सौरभ श्रीवास्तव ने बेहतर कार्य होने के बावजूद एपीआर में ग्रेडिंग कम किया, जिसकी अपील तत्कालीन मुख्य सचिव डीबी गुप्ता को की गई। फर्जी चार्जशीटों के बारे में मुख्य सचिव को पत्र प्रेषित किया गया। कालांतर में एक मजबूत शृंखला के तौर पर 16 आईएएस व आईपीएस ने बखूबी भूमिका का निर्वहन करते हुए ना सिर्फ पद का दुरुपयोग आईपीएस पंकज चौधरी के प्रकरण में किया वरन प्रताड़ित करने के अन्य आयामों का भी समय-समय पर सृजन किया गया।

क्या कहती है समय-समय पर मीडिया रिपोर्ट…

-जैसलमेर के गाजी फकीर की हिस्ट्रीशीट खोलने एवं सालेह मोहम्मद के खिलाफ मामला दर्ज करने वाले मरुधरा के दबंग आईपीएस पंकज चौधरी एक बार फिर चर्चाओं में है। 2009 बैच के आईपीएस चौधरी अपने डीआईजी प्रमोशन मामले में कोर्ट पहुंच चुके हैं उन्होंने कोर्ट में प्रदेश के एक दर्जन आईएएस-आईपीएस के रिकॉर्ड पेश किया है। जिन पर भ्रष्टाचार, फर्जी एनकाउंटर, हत्या का केस, जांच के नाम पर रिश्वत मांगने जैसे संगीन आरोप के साथ ही जेल यात्रा का जिक्र है। बावजूद उनका प्रमोशन पर सवाल उठाते हुए अब कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। साथ ही यह भी जानकारी दी कि उनके मामले में 6 शीर्ष कोर्ट ने फैसला सुनाया, लेकिन उसकी पालना तक नहीं हो रही है। उलटा उनका डिमोशन कर दिया और इस मामले में भी राज्य सरकार को मुंह की खानी पड़ी। आईपीएस चौधरी का अब दर्जन दागी आईएएस-आईपीएस का मामला उठाते हुए खुद को न्याय मिलने की उम्मीद लगा रहे हैं।

-एक तरफ सरकारी जीरो टॉलरेंस नीति अपनाते हुए भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल कसने का दावा कर रही है तो वहीं दूसरी ओर कई आरोप से मुक्त व जेल यात्रा करने वाले आईएएस व आईपीएस अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं। हालत यह है कि उनका समय-समय पर पर प्रमोशन देकर एक प्रकार से उनकी हौसला अफजाई की जा रही है। मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद भ्रष्ट अफसरों का प्रमोशन तंत्र पर सवालिया निशान लगता है। वर्ष 2009 बैच के आईपीएस ऑफिसर पंकज चौधरी का प्रमोशन सरकार ने कोर्ट के आदेश के बावजूद काफी समय से रोक रखा है। चौधरी के बैच के सभी अफसरों का प्रमोशन हो चुका है लेकिन उनका प्रमोशन होने के बजाय उनको डिमोशन का उपहार दिया गया। हालांकि कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया अब उन्होंने सरकार के खिलाफ लगी अपनी याचिका में रजस्थान के 13 आईएएस और आईपीएस अफसरों का हवाला दिया है। ये वे अफसर हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार व अन्य वित्तीय अनियमितता के मामले लंबित होने के दौरान ही उन्हें प्रमोशन व पोस्टिंग दिया गया। कुछ अफसर तो कई महीनों व साल तक जेल की हवा भी खा चुके हैं। इसके बावजूद सरकार ने उन्हें प्रमोशन दे दिया। उन्होंने सिस्टम पर सवालिया निशान लगाते हुए अब कोर्ट से न्याय मिलने की उम्मीद है।

-आईपीएस चौधरी को पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी करने पर सेवा से बर्खास्त किया गया था। हालांकि लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर वह वापस सर्विस में आ गए थे। इस मामले में इलाहाबाद कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला किया और विवाद समाप्त होने के बाद भी उनको चार्जशीट किया गया व पदोन्नति रोक दी गई। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण, नई दिल्ली, दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी चौधरी के पक्ष में 4 साल साल पहले आ चुके हैं। आधा दर्जन मामले में चौधरी को राहत मिली, लेकिन राज्य सरकार कोर्ट के आदेशों को भी मानती नजर नहीं आ रही है।

-पूर्व सीएम श्रीमती वसुंधरा राजे व अशोक गहलोत के समय से आईपीएस चौधरी की राह में लगातार अड़चने डाली जा रही है। वहीं यह दौर सत्ता बदलने के बाद भी नहीं थम रहा है। अब कुछ आईएएस व आईपीएस भी तंत्र के माध्यम से उनके लिए स्पीड ब्रेकर बन रहे हैं।

-1 मई 2019 : पारिवारित विवाद प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज मिथल की डबल बेंच ने आईपीएस पंकज चौधरी के पक्ष में निर्णय सुनाया और तलाक की डिक्री भी मिली, साथ ही पारिवारिक विवाद को दोनों पक्ष द्वारा समाप्त करने का निर्देश दिया।

-10 दिसंबर 2020 : केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, प्रधान पीठ नई दिल्ली जस्टिस नरसिम्हा रेड्‌डी ने राज्य सरकार के खिलाफ निर्णय पारित कर जांच अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया और राज्य सरकार को फटकार लगाई।

–19 मार्च 2021 : दिल्ली हाईकोर्ट जस्टिस राजीव स्वरूप, इंडला व जस्टिस अनिल बंसल की डबल बेंच ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

–7 मई 2021 : सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की एसएलपी खारिज हुई। सीजेआई जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस इंद्रा बनर्जी व जस्टिस जॉसेफ की बेंच ने निर्णय दिया।

-13 मई 2021 : केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने मुख्य सचिव व अन्य को अवमाननता का दोषी माना। कोर्ट में मुख्य सचिव को बुलाया गया पर एक दिन पहले 11 मई की रात्रि 10:30 बजे कार्मिक सचिव ने पंकज चौधरी के सरकारी आवास जाकर सर्विस में ज्वाइनिंग कराई। इतिहास में पहली बार ऐसा विशेष वाकया घटित हुआ।

-16 मई 2025 : केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण जयपुर बेंच ने राज्य सरकार के डिमोशन आदेश को खारिज कर पंकज चौधरी को राहत प्रदान किया।

कोर्ट से बड़ा तंत्र…

6 न्यायालयों के आदेशों के बावजूद उसकी पालना नहीं करने से लगता है कि तंत्र उनसे बड़ा है। इसको लेकर आईपीएस पंकज चौधरी ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, कार्मिक सचिव व डीजीपी के खिलाफ व्यक्तिगत पीटीशन दायर कर रखी है। लगभग 1 करोड़ ऍरिअर व प्रमोशन के लिए आईपीएस चौधरी ने तंत्र से जूझते हुए कानूनी लड़ाई लड़ी और काफी पैसा खर्च किया। कोर्ट ने उन्हें राज्य सरकार द्वारा पेंडिंग एरिअर के तौर पर करीब 1 करोड़ व डीआईजी प्रमोशन देने के निर्देश दिए थे। आदिनांक समस्त निर्णयों की पालना सुनिश्चित नहीं किया गया।

मुख्य सचिव राजस्थान को नोटिस जारी करने की चेतावनी 

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण जयपुर बेंच में आईपीएस चौधरी के डीआईजी प्रमोशन मामले में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील की ओर से समय मांगा गया, साथ ही कहा कि इस संबंध में फाइल मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा तक जाएगी। इस पर कोर्ट ने फटकार लगाते हुए 2 माह का अंतिम समय देते हुए अविलंब निस्तारण का आदेश दिए हैं। पेशी के दौरान आईपीएस पंकज चौधरी कोर्ट में मौजूद थे व बहस में भी भाग लिया।

वृहद सुनियोजित शृंखला के तहत साजिश का प्रारूप व प्रक्रिया

1-अवैध व फर्जी चार्जशीट जारी कराया जाना। 

2-जारी चार्जशीट को वर्षों सुनियोजित पेंडिंग रखना। 

3-विदेश दौरे व प्रतिनियुक्ति के लिए अभ्यावेदन पेंडिंग रखना। 

4-साजिश के तहत एसीआर खराब कराया जाना। 

5- फील्ड पोस्टिंग से सुनियोजित दूर रखा जाना। 

6-राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होने पर व्यवधान पैदा करना। 

7-न्यायालय के निर्णयों की निरंतर अवमानना।

8-सरकारी आवास संबंधी आवेदन को अनावश्यक पेंडिंग रखना। 

9 संघ लोक सेवा आयोग व गृह मंत्रालय को गलत तथ्य पेश करना। 

10-पक्षपात व प्रताड़ित करने के विभिन्न मापदंड निर्धारित करना। 

11-भ्रष्ट अधिकारियों को प्रमोशन व पोस्टिंग दिया जाना। 

12-दागी जूनियर अधिकारी को साजिश के तहत एक ही विंग में पदस्थापित किया जाना। 

13-प्रमोशन संबंधित अन्य परिलाभ से निरंतर वंचित करना व विदेश ट्रेनिंग से दूर रखना। 

14-षड़यंत्र में शामिल आईएएस व आईपीएस को समय-समय पर लाभ पहुंचाया जाना। 

15-न्यायालय को अनदेखा करते हुए प्रकरणों को अनावश्यक पेंडिंग रखे जाना। 

उपरोक्त पत्र में आईपीएस पंकज चौधरी लिखते हैं- अंतत: हरियाणा कैडर के आईपीएस अधिकारी दिवंगत पूरन कुमार की आत्महत्या के मामले में मेरा मानना है कि इससे सभी को अच्छी आंतरिक अंतदृष्टि मिलती है। पुलिस अधिकारी चाहे जूनियर हो या सीनियर, समाज से ही आते हैं। मैंने हमेशा महसूस किया है कि अगर कोई पुलिस अधिकारी को धर्म, क्षेत्र या जाति के आधार पर पूर्वाग्रहों या दबावों का सामना करना पड़ता है या कुछ ऐसी घटनाओं का अनुभव होता है जिनकी रिपोर्ट से उचित माध्यमों से दस्तावेजों व सबूतों के साथ सरकार को देते हैं और फिर भी न्याय नहीं मिलता है तो परिणाम पूरे देश के लिए दुखद हो जाता है। जयहिंद, जय भारत, जय संविधान।

भवदीय-

(पंकज चौधरी), आईपीएस, 

पुलिस अधीक्षक एवं नोडल अधिकारी, 

कम्युनिटी पुलिसिंग, राजस्थान जयपुर। (पुलिस उप महानिरीक्षण प्रमोशन प्रकरण माननीय न्यायालय में विचाराधीन। )

देश में- “ALL INDIA CIVIL SERVICES CAREER JUSTICE SYSTEM” बनाने की जरूरत

 एक मौलिक संस्थागत सुधार के लिए देश में- “ALL INDIA CIVIL SERVICES CAREER JUSTICE SYSTEM” बनाने की जरूरत है। किसी IAS/IPS अधिकारी का पूरा कैरियर किसी एक सरकार, विभाग या कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की इच्छा पर निर्भर न रहे, तो प्रमोशन, परिवेदना, APAR विवाद, वरिष्ठता और समयपूर्व तबादले—इन सबको एक स्वतंत्र व्यवस्था के अधीन लाना अधिक व्यापक मॉडल हो। वर्तमान में IPS के लिए DIG, IG, ADG और DG के लिए क्रमशः 14, 18, 25 और 30 वर्ष की सेवा का zone of consideration है और चयन merit को seniority के साथ ध्यान में रखकर किया जाता है। केंद्र में IPS की cadre-controlling authority MHA है। हम यहां पर 10 मौलिक सुझाव दे रहे हैं।

1. स्वतंत्र “ “ALL INDIA CIVIL SERVICES CAREER JUSTICE SYSTEM” बने : 

IAS, IPS और IFoS के लिए एक वैधानिक उपरोक्त संस्था बनाने की जरूरत है। इसका काम केवल प्रमोशन तक सीमित न हो, बल्कि—

  • प्रमोशन
  • वरिष्ठता विवाद
  • APAR पर आपत्ति
  • प्रतिकूल टिप्पणी
  • प्रमोशन न मिलने की शिकायत
  • कैडर विवाद
  • समयपूर्व तबादला
  • महत्वपूर्ण पद से हटाने की शिकायत
  • न्यायालय के आदेशों की अनुपालना

जैसे मामलों की सुनवाई भी इसी बोर्ड के माध्यम से हो। इससे अधिकारी को अपनी सेवा संबंधी शिकायत उसी प्रशासनिक तंत्र के पास ले जाने की आवश्यकता कम होगी जिसके निर्णय के विरुद्ध वह शिकायत कर रहा है।

2. प्रमोशन की “वर्ष सीमा” घटाई जाए

यह सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक हो सकता है। आज IPS में DIG के लिए 14, IG के लिए 18, ADG के लिए 25 और DG के लिए 30 वर्ष की सेवा का प्रावधान है। एक वैकल्पिक मॉडल पर विचार हो सकता है:

पद वर्तमान सेवा सीमा प्रस्तावित विचार सीमा
DIG 14 वर्ष 10 वर्ष
IG 18 वर्ष 14 वर्ष
ADG 25 वर्ष 20 वर्ष
DG 30 वर्ष 25 वर्ष

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो कि हर अधिकारी को स्वतः प्रमोशन मिल जाए। इसका अर्थ हो कि योग्य अधिकारी को निर्धारित न्यूनतम अवधि पूरी होते ही प्रमोशन के लिए अनिवार्य रूप से स्वतंत्र बोर्ड के सामने विचारित किया जाए। इससे “समय पूरा होने तक प्रतीक्षा” के बजाय performance-based accelerated career की व्यवस्था बनेगी।

3. “FAST TRACK PROMOTION” की व्यवस्था हो

सभी अधिकारियों को एक समान गति से आगे बढ़ाने के बजाय तीन career tracks बनाए जा सकते हैं:

NORMAL TRACK – सामान्य सेवा प्रगति
FAST TRACK – लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अधिकारी
SPECIAL LEADERSHIP TRACK – असाधारण नेतृत्व/राष्ट्रीय महत्व के कार्य करने वाले अधिकारी। उदाहरण के लिए कोई IPS अधिकारी 10 वर्ष में DIG स्तर की जिम्मेदारी के लिए असाधारण रूप से तैयार है तो उसे केवल इसलिए 14 वर्ष तक प्रतीक्षा न करनी पड़े कि नियम में 14 वर्ष लिखा है।

4. “PROMOTION DENIAL” भी एक कारणयुक्त आदेश हो

प्रमोशन केवल मिलने पर आदेश न हो। यदि बोर्ड किसी अधिकारी को प्रमोशन के लिए उपयुक्त नहीं मानता है तो उसे—“REASONED SPEAKING ORDER” देना अनिवार्य हो।

अर्थात अधिकारी को बताया जाए:

  • कौन-सा मानदंड पूरा नहीं हुआ?
  • APAR में क्या कमी है?
  • कौन-सा रिकॉर्ड निर्णय के विरुद्ध गया?
  • क्या सुधार अपेक्षित है?
  • अगली समीक्षा कब होगी?

इससे “पैनल में नाम नहीं आया” जैसी अस्पष्ट स्थिति समाप्त होगी।

5. APAR को एक व्यक्ति का “हथियार” बनने से रोकें

यह बहुत महत्वपूर्ण सुधार होगा। किसी अधिकारी के पूरे कैरियर का भविष्य केवल उसके तत्काल वरिष्ठ द्वारा लिखी गई APAR पर निर्भर न हो। इसके बजाय 360-degree performance assessment हो:

  • Reporting Officer
  • Reviewing Officer
  • वरिष्ठ सहकर्मी
  • अधीनस्थ अधिकारियों से सीमित संरचित feedback
  • उपलब्धियों के measurable indicators
  • कठिन assignments का रिकॉर्ड
  • प्रशिक्षण एवं professional development
  • integrity/disciplinary record

हालांकि अंतिम मूल्यांकन संस्थागत और गोपनीय रखा जा सकता है।

6. “CAREER COURT” जैसी स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था हो

स्वतंत्र Career Board के बाद एक All India Services Career Appellate Tribunal बनाया जा सकता है। अधिकारी वहां अपील कर सके यदि उसे लगे कि—

“मेरे प्रमोशन, वरिष्ठता, APAR या पोस्टिंग से संबंधित निर्णय नियमों के विरुद्ध है।” इससे हर छोटे सेवा-विवाद के लिए हाईकोर्ट/कैट/अन्य न्यायिक मंच तक जाने की आवश्यकता कम हो सकती है।

7. पोस्टिंग को “CAREER BOARD” से जोड़ें, सरकार से नहीं

राज्य सरकार को प्रशासनिक नियंत्रण और कानून-व्यवस्था की आवश्यकता के अनुसार अधिकारियों की पोस्टिंग का अधिकार रहना चाहिए। लेकिन एक सुरक्षा व्यवस्था हो: MINIMUM TENURE + WRITTEN REASON + INDEPENDENT REVIEW

अर्थात—

न्यूनतम कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाना हो तो कारण लिखना पड़े।

और अधिकारी को लगे कि कारण वास्तविक नहीं है, तो वह Career Board में समीक्षा मांग सके। यह सरकार के अधिकार को समाप्त नहीं करता, बल्कि अधिकार के इस्तेमाल को रिकॉर्ड-आधारित बनाता है।

8. “ONE OFFICER – ONE CAREER FILE” डिजिटल प्रणाली बने

प्रत्येक IAS/IPS अधिकारी का एक केंद्रीय Career Ledger हो।

उसमें स्वतः दर्ज हों:

  • नियुक्ति
  • प्रशिक्षण
  • सभी पद
  • पदस्थापन अवधि
  • APAR
  • पुरस्कार
  • महत्वपूर्ण उपलब्धियां
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई
  • कोर्ट के आदेश
  • प्रमोशन
  • प्रमोशन में देरी
  • अधिकारी की आपत्तियां
  • बोर्ड के निर्णय

फिर किसी अधिकारी की फाइल किसी एक राज्य सचिवालय या विभाग की मेज पर वर्षों तक अटकाकर रखने की संभावना घटेगी।

9. “PROMOTION DUE DATE” सार्वजनिक प्रशासनिक रिकॉर्ड हो

हर अधिकारी के लिए सिस्टम स्वतः बताए:

PROMOTION DUE: 1 जुलाई 2030
DPC/BOARD DUE: 1 अप्रैल–30 जून 2030
DECISION DEADLINE: 30 जून 2030

यदि समय सीमा में निर्णय नहीं होता तो सिस्टम स्वतः DELAY FLAG पैदा करे। इससे प्रमोशन कोई अनिश्चित प्रशासनिक प्रक्रिया न रहकर time-bound statutory process बन सकती है।

10. सबसे बड़ा सिद्धांत—“NO PERSONAL VETO”

यह पूरे सुधार का मूल सिद्धांत हो सकता है। किसी एक मुख्यमंत्री, मंत्री, मुख्य सचिव, DGP या वरिष्ठ अधिकारी के पास किसी IAS/IPS अधिकारी के पूरे career progression को व्यक्तिगत रूप से रोक देने की ऐसी शक्ति नहीं होनी चाहिए जिसे स्वतंत्र रूप से चुनौती न दी जा सके। बल्कि व्यवस्था यह हो:

Government has the power to decide.
Independent Board has the power to review.
Officer has the right to appeal.
Court retains judicial review.

यानी POWER → REASON → REVIEW → APPEAL का चार-स्तरीय सुरक्षा तंत्र।

“ALL INDIA CIVIL SERVICES CAREER JUSTICE SYSTEM” का मूल सिद्धांत   “NO OFFICER SHOULD BE DENIED A FAIR CAREER OPPORTUNITY WITHOUT A REASONED DECISION, AND NO CAREER DECISION SHOULD BE BEYOND INDEPENDENT REVIEW.” होना चाहिए। 

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