उदित भास्कर नेत्रदान अभियान-2 : आपके जाने के बाद भी कोई देख सकेगा सूरज की पहली किरण, अपनों का चेहरा और प्रकृति की खूबसूरती
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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दुनिया वाकई खूबसूरत है। सुबह की सुनहरी धूप, नीले आसमान में उड़ते परिंदे, बारिश के बाद मिट्टी की सौंधी महक का अहसास कराती प्रकृति, खिलखिलाते बच्चों के चेहरे, मां की ममता भरी आंखें और अपनों की मुस्कान—जीवन को खूबसूरत बनाने वाले ऐसे अनगिनत दृश्य हमारी आंखों के माध्यम से ही हमारी स्मृतियों में बसते हैं। जरा सोचिए, यदि आंखें ही न हों तो इस खूबसूरत दुनिया के रंगों को कैसे देख पाएंगे? हमारे आसपास मौजूद सुंदरता का अनुभव करने में दृष्टि की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, इसका वास्तविक अहसास उस व्यक्ति से बेहतर कौन कर सकता है, जो किसी कारणवश देख नहीं पाता। यह कहना है प्रसिद्ध समाजसेवी निरूपा पटवा। निरूपा पटवा नेत्रदान अभियान से जुड़ी हैं और उनका कहना है कि उदित भास्कर का नेत्रदान अभियान बहुत अच्छा है। प्रत्येक मीडिया को इस प्रकार की पहल करनी चाहिए।
निरूपा पटवा का कहना है कि क्या यह संभव नहीं कि किसी व्यक्ति के इस दुनिया से विदा होने के बाद भी उसकी आंखों से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में रोशनी आ सके? क्या हमारी अंतिम विदाई किसी के लिए नई शुरुआत बन सकती है? इसका जवाब है—हां। मरणोपरांत नेत्रदान के संकल्प से किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति को दृष्टि पाने का अवसर मिल सकता है। यही सोच समाज में जागरूकता फैलाने की प्रेरणा देती है।
इसी मानवीय भावना को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से उदित भास्कर नेत्रदान अभियान-2 के माध्यम से समाज से अपील की जा रही है कि जीवन की सार्थकता केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि अपने जाने के बाद भी किसी के जीवन में खुशियों के रंग भरने की संभावना छोड़ जाने में है।
नेत्रदान : मृत्यु के बाद भी जीवित रह सकती है इंसानियत
निरूपा पटवा का मानना है कि मनुष्य का जीवन सीमित है, लेकिन उसके अच्छे कर्मों का प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है। धन, संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा व्यक्ति के साथ नहीं जाते, मगर सेवा, संवेदना और परोपकार की भावना दूसरों के जीवन को बदल सकती है। मरणोपरांत नेत्रदान भी ऐसा ही एक पुण्य संकल्प है, जो किसी जरूरतमंद के लिए उम्मीद का द्वार खोल सकता है।
निरूपा ने बताया कि नेत्रदान को लेकर समाज में कई भ्रांतियां भी प्रचलित हैं। कुछ लोग धार्मिक मान्यताओं के कारण संकोच करते हैं, तो कुछ को इस विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं होती। कई परिवारों को यह भी पता नहीं होता कि नेत्रदान के लिए किससे संपर्क किया जाए और मृत्यु के बाद क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिए। जागरूकता के अभाव में एक महत्वपूर्ण अवसर हाथ से निकल सकता है।
इसलिए नेत्रदान को केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और मानवीय जिम्मेदारी के रूप में देखने की आवश्यकता है। परिवार के सदस्यों से इस विषय पर बातचीत करना, अपनी इच्छा स्पष्ट करना और अधिकृत नेत्रदान केंद्र अथवा नेत्र बैंक से सही जानकारी प्राप्त करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
जीवन की खूबसूरती को आत्मसात करने का अनमोल उपहार है आंखें, अभियान में शामिल हो : निरूपा
प्रसिद्ध समाजसेवी निरूपा पटवा का कहना है कि —“आंखें केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि सपनों को पहचानने, रिश्तों को महसूस करने और जीवन की खूबसूरती को आत्मसात करने का अनमोल उपहार हैं। मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प लेकर हम अपने जीवन की अंतिम विदाई को किसी दूसरे के जीवन की नई सुबह बना सकते हैं। उदित भास्कर का नेत्रदान अभियान समाज में संवेदना, सेवा और मानवता की ऐसी ही ज्योति प्रज्वलित करने का सराहनीय प्रयास है। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हमारे जाने के बाद भी किसी की आंखों में उम्मीद के दीप जलते रहें। हमारी विदाई किसी के लिए अंधेरा नहीं, बल्कि उजाले की सौगात बने।”
नेत्रदान को लेकर दूर करें भ्रांतियां, फैलाएं सही जानकारी
निरूपा पटवा का कहना है कि नेत्रदान के संबंध में जागरूकता फैलाने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नेत्रदान और संपूर्ण नेत्र प्रत्यारोपण एक ही बात नहीं हैं। सामान्यतः नेत्रदान में कॉर्निया यानी आंख के पारदर्शी अगले हिस्से का दान किया जाता है। कॉर्निया की क्षति के कारण दृष्टिहीन हुए कुछ लोगों को कॉर्निया प्रत्यारोपण से देखने की क्षमता प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, हर प्रकार के अंधत्व का उपचार नेत्रदान से संभव नहीं होता।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नेत्रदान के लिए केवल संकल्प लेना ही पर्याप्त नहीं है। मृत्यु के बाद परिवार को इसकी जानकारी होना और समय पर अधिकृत नेत्र बैंक या संबंधित चिकित्सा केंद्र से संपर्क करना आवश्यक है। आम तौर पर मृत्यु के बाद यथाशीघ्र, आदर्श रूप से छह घंटे के भीतर, नेत्र बैंक से संपर्क करने की सलाह दी जाती है। सही समय और प्रक्रिया के संबंध में स्थानीय अधिकृत केंद्र के निर्देशों का पालन करना चाहिए।
नेत्रदान के लिए आयु या सामान्य स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण स्वयं ही यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि कोई व्यक्ति पात्र नहीं है। अंतिम पात्रता का निर्धारण संबंधित चिकित्सा विशेषज्ञ और नेत्र बैंक करते हैं। इसलिए किसी भी शंका का समाधान अधिकृत केंद्र से प्राप्त जानकारी के आधार पर करना चाहिए।
एक संकल्प, अनेक उम्मीदें
निरूपा पटवा ने बताया कि कल्पना कीजिए, कोई बच्चा पहली बार अपनी मां का चेहरा देख सके, कोई युवा अपने सपनों को साकार करने की दिशा में दुनिया को देख पाए या कोई बुजुर्ग अपने परिवार के सदस्यों को फिर से देख पाने की उम्मीद पूरी कर सके। दृष्टि प्राप्त करने की संभावना किसी व्यक्ति और उसके परिवार के लिए कितना बड़ा भावनात्मक सहारा बन सकती है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना और अधिक लोगों को इसके लिए प्रेरित करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इस दिशा में परिवार, सामाजिक संस्थाएं, शिक्षण संस्थान, स्वयंसेवी संगठन, मीडिया और जनप्रतिनिधि महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। सामाजिक समारोहों में नेत्रदान के महत्व पर चर्चा की जा सकती है। समाचार माध्यमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को सही जानकारी देकर उन्हें संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
उदित भास्कर की पहल : संवेदना से सामाजिक बदलाव की ओर
उदित भास्कर नेत्रदान अभियान-2 का मूल संदेश सरल, भावनात्मक और मानवीय है—दुनिया खूबसूरत है, आंखें हैं तो इसके रंग हैं। अपने जीवन में इस खूबसूरती का आनंद लेने के साथ किसी दूसरे को भी इसे देखने का अवसर देने की भावना विकसित कीजिए। मीडिया की भूमिका केवल समाचार प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। वह समाज को सकारात्मक दिशा देने, महत्वपूर्ण विषयों पर संवाद शुरू करने और लोगों को जनहित के कार्यों से जोड़ने का माध्यम भी है। नेत्रदान जैसा विषय इसी सामाजिक भूमिका से जुड़ा हुआ है। जब कोई अभियान लोगों को अपने जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है, तब वह जागरूकता से आगे बढ़कर मानवीय संवेदना का संदेश बन जाता है।
उदित भास्कर की इस पहल का उद्देश्य नेत्रदान के महत्व को आमजन तक पहुंचाना, लोगों को इसके प्रति जागरूक करना और उन्हें अधिकृत संस्थाओं से संपर्क कर सही प्रक्रिया समझने के लिए प्रेरित करना है। अभियान की सार्थकता तभी बढ़ेगी, जब संदेश पढ़ने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस विषय पर अपने परिवार से बात करे और अपनी इच्छा के अनुरूप नेत्रदान का संकल्प लेने की दिशा में कदम बढ़ाए।
आइए, किसी की दुनिया में उजाला छोड़ जाएं
जीवन में हम अनेक अवसरों पर दूसरों की सहायता करते हैं। किसी जरूरतमंद को भोजन देना, किसी विद्यार्थी की पढ़ाई में सहयोग करना और किसी बीमार व्यक्ति की मदद करना—ये सभी पुण्य कार्य हैं। मरणोपरांत नेत्रदान भी इसी सेवा भावना का विस्तार है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही ऐसा संकल्प ले सकता है, जिससे उसके जाने के बाद किसी जरूरतमंद को लाभ मिलने की संभावना बने।
इसलिए आज ही अपने परिवार के साथ नेत्रदान पर चर्चा कीजिए। आई बैंक ऑफ राजस्थान से संपर्क कर प्रक्रिया और पात्रता की जानकारी लीजिए। अपनी इच्छा स्पष्ट कीजिए, परिवार को विश्वास में लीजिए और मृत्यु के बाद समय पर संपर्क किए जाने की व्यवस्था समझिए।
एक छोटा-सा संकल्प किसी के जीवन में बड़ी उम्मीद बन सकता है
याद रखिए, दुनिया की खूबसूरती केवल उसे देखने में नहीं, बल्कि दूसरों को भी उस खूबसूरती से जुड़ने का अवसर देने में है। “आपकी आंखें किसी और की सुबह बन सकती हैं। मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प लें और अपने जाने के बाद भी मानवता की रोशनी कायम रखें।”









