85 साल की पौधरोपण परंपरा, लाखों रुपये खर्च होने का अनुमान और अस्तित्व तलाशते पेड़; 2024 के महाअभियान में लगाए गए 5.19 लाख पौधों में से महज 10 हजार के जीवित रहने का दावा—जवाबदेही तय करने की मांग
विशेष रिपोर्ट दिलीप कुमार पुरोहित | जैसलमेर
स्वर्णनगरी जैसलमेर की पहचान उसके ऐतिहासिक दुर्ग, हवेलियों, रेतीले धोरों और विशिष्ट स्थापत्य से है। लेकिन मरुस्थलीय शहर की एक दूसरी पहचान भी होनी चाहिए थी—हरियाली, छाया और पर्यावरण संरक्षण की। सवाल यह है कि दशकों से पौधरोपण के नाम पर चल रही गतिविधियों, सरकारी अभियानों, समारोहों और खर्च के बावजूद शहर में हरियाली की स्थिति क्या है? क्या पौधरोपण का उद्देश्य वास्तव में पेड़ तैयार करना है या फिर कुछ घंटों में बड़ी संख्या में पौधे लगाकर रिकॉर्ड बनाना ही उपलब्धि मान लिया गया है?
22 सितंबर 2024 को जैसलमेर में प्रादेशिक सेना की 128वीं इन्फैंट्री बटालियन की इको टास्क फोर्स के नेतृत्व में एक घंटे में 5,19,130 पौधे लगाने का अभियान आयोजित किया गया। केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी इस उपलब्धि का उल्लेख किया। अभियान में जिला प्रशासन, सेना, बीएसएफ, वायुसेना, वन विभाग, स्थानीय संस्थाओं, नगर परिषद, विद्यार्थियों और आमजन ने भाग लिया। पौधारोपण सात स्थानों पर हुआ था। इसे विश्व रिकॉर्ड के रूप में मान्यता मिलने की खबरें भी प्रकाशित हुईं।
यह उपलब्धि अपने आप में बड़ी थी। मगर पर्यावरण संरक्षण का असली मूल्यांकन उस दिन नहीं होता, जिस दिन पौधा जमीन में लगाया जाता है। उसका मूल्यांकन तब होता है, जब वही पौधा तपती गर्मी, पानी की कमी, पशुओं और अन्य चुनौतियों के बावजूद जीवित रहकर पेड़ बनता है।
अब सवाल है—उस ऐतिहासिक अभियान के पौधों का आज क्या हाल है?
5.19 लाख पौधे लगाए, लेकिन कितने जीवित बचे?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सितंबर 2024 के इस अभियान में लगाए गए 5.19 लाख से अधिक पौधों में से करीब 10 हजार ही जीवित रहकर पेड़ बनने की दिशा में आगे बढ़ पाए। इस दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है। फिर भी, यदि यह आंकड़ा सही साबित होता है, तो यह केवल पौधारोपण की सफलता पर सवाल नहीं होगा, बल्कि पौधों की देखभाल, निगरानी और सरकारी जवाबदेही की व्यवस्था की भी गंभीर परीक्षा होगी। 5,19,130 पौधों में 10 हजार पौधों के जीवित रहने का अर्थ लगभग 1.9 प्रतिशत है। यानी दावा सही होने पर लगाए गए प्रत्येक 100 पौधों में से लगभग 98 पौधे जीवित नहीं बच पाए। इतनी बड़ी संख्या में पौधों का नष्ट होना किसी भी पर्यावरण अभियान के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। सातों स्थानों पर कितने पौधे लगाए गए थे? उनमें से कितने जीवित हैं? कितने पौधे सूख गए? कितनों को दोबारा लगाया गया? क्या किसी विभाग ने पौधों की उत्तरजीविता यानी सर्वाइवल रेट का आकलन किया? क्या इस आकलन की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई?
उदित भास्कर की पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है। विश्व रिकॉर्ड का प्रमाणपत्र यह बताता है कि निर्धारित समय में पौधारोपण का लक्ष्य हासिल किया गया; वह अपने आप यह प्रमाणित नहीं करता कि लगाए गए सभी पौधे बाद में पेड़ बन गए।
रिकॉर्ड बनाने के बाद जिम्मेदारी किसकी थी?
पौधारोपण अभियान में सेना, जिला प्रशासन, वन विभाग, नगर परिषद और अन्य संस्थाओं की भागीदारी की खबरें प्रकाशित हुई थीं। इस तरह के बड़े अभियान में पौधों की व्यवस्था करना, उन्हें निर्धारित स्थानों पर लगाना, पानी उपलब्ध कराना, सुरक्षा करना और नियमित निगरानी करना—इन सभी कामों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। यदि पौधों के जीवित रहने का प्रतिशत कम पाया जाता है, तो सबसे पहले यह पता लगाया जाना चाहिए कि संबंधित स्थानों की देखभाल किस विभाग या संस्था को सौंपी गई थी। पौधों को पानी देने की व्यवस्था किसके पास थी? क्या सिंचाई के लिए कोई योजना बनी थी? क्या पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड या अन्य उपाय किए गए थे? क्या देखभाल के लिए बजट आवंटित हुआ था? यदि हुआ, तो उसका कितना उपयोग किया गया?
पर्यावरण संरक्षण का कोई भी अभियान केवल पौधे लगाने वाले हाथों से सफल नहीं होता। उसे जीवित रखने के लिए लगातार काम करने वाले हाथ भी चाहिए। यदि आयोजन के समय बड़ी संख्या में अधिकारी, कर्मचारी, सैनिक, विद्यार्थी और नागरिक उपस्थित थे, तो अभियान के बाद पौधों की निगरानी का तंत्र भी उतना ही व्यवस्थित होना चाहिए था। पौधरोपण के दिन की तस्वीरें उपलब्धि का प्रमाण हो सकती हैं, लेकिन वर्षों बाद जीवित पेड़ों की गिनती ही उसके स्थायी परिणाम का प्रमाण है।
85 वर्षों में नगर पालिका ने कितने पेड़ तैयार किए?
जैसलमेर में नगरपालिका की स्थापना को लगभग 85 वर्ष होने का अनुमान है। इस लंबी अवधि में शहर के विकास, सड़कों, आवासीय बस्तियों और सार्वजनिक सुविधाओं के विस्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी स्थानीय निकाय पर रही है। अलग-अलग वर्षों में नगर पालिका और बाद में नगर परिषद ने वास्तव में कितने पौधे लगाए यह भी उल्लेखनीय है। एक मोटे अनुमान के तौर पर यह दावा सामने रखा जा रहा है कि 85 वर्षों में नगर पालिका ने शहरी क्षेत्र में करीब 25 हजार पौधे लगाए। जायज सार्वजनिक सवाल उठता है—यदि इतने लंबे समय में हजारों पौधे लगाए गए, तो शहर में उनकी वर्तमान स्थिति क्या है?
आज जैसलमेर के अलग-अलग वार्डों, प्रमुख सड़कों, सार्वजनिक स्थलों, पार्कों, सरकारी परिसरों और आवासीय क्षेत्रों में कितने पुराने पेड़ मौजूद हैं? कितने पेड़ स्थानीय निकाय के पौधारोपण कार्यक्रमों से तैयार हुए? कितने पेड़ अन्य विभागों, संस्थाओं या नागरिकों ने लगाए? कितने पौधे देखभाल के अभाव में नष्ट हुए? इनका जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि क्षेत्रवार सर्वेक्षण से ही मिल सकता है। यदि 25 हजार पौधों का अनुमान सही भी हो, तो शहर में हरियाली अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखती,नगर निकाय को अपनी पौधरोपण गतिविधियों का हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए।
पर्यावरण के नाम पर 50 लाख रुपये से अधिक खर्च का अनुमान
प्राप्त जानकारी और मोटे अनुमान के अनुसार, पिछले 85 वर्षों में पौधरोपण और पर्यावरण संबंधी गतिविधियों पर नगर पालिका की ओर से 50 लाख रुपये से अधिक खर्च हुए हैं। यह मोटा-मोटी अनुमान है। असली राशि अधिक भी हो सकती है। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। 85 वर्षों के दौरान खर्च हुई कुल राशि को केवल आज की कीमतों से नहीं देखा जा सकता। इतने लंबे समय में महंगाई, मजदूरी, पौधों की कीमत, पानी की उपलब्धता और अन्य लागतों में बदलाव आया होगा। इसलिए अलग-अलग वर्षों के खर्च का मूल्यांकन उनके समय, कार्य और वास्तविक परिणामों के संदर्भ में करना होगा। फिर भी, नागरिकों का यह पूछना पूरी तरह उचित है कि पर्यावरण पर जो पैसा खर्च हुआ, उससे जमीन पर क्या बदला? कितने पौधे खरीदे गए? कितने लगाए गए? कितनों की देखभाल हुई? कितने पेड़ बने? क्या किसी परियोजना के परिणामों का मूल्यांकन किया गया? यदि किसी योजना में पौधे खरीदने, गड्ढे खोदने, परिवहन, पानी देने, सुरक्षा और रखरखाव पर अलग-अलग भुगतान किए गए हैं, तो इनका रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। भुगतान के साथ काम पूरा होने का प्रमाण और पौधों के जीवित रहने का विवरण भी महत्वपूर्ण है। सरकारी खर्च की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं कि कितनी राशि खर्च हुई; यह भी है कि उस राशि से जनता और पर्यावरण को क्या स्थायी लाभ मिला।
पौधा लगाना आसान, उसे पेड़ बनाना कठिन
जैसलमेर जैसे शुष्क क्षेत्र में पौधरोपण की चुनौती दूसरे अनेक शहरों से अलग है। यहां पानी की उपलब्धता सीमित है, गर्मी तीव्र हो सकती है और पौधों को लंबे समय तक नियमित देखभाल की जरूरत पड़ती है। ऐसे में स्थानीय जलवायु के अनुकूल प्रजातियों का चयन, उपयुक्त स्थान, सिंचाई की व्यवस्था और पौधों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। पौधा लगाकर उसकी तस्वीर खिंचवा लेना आसान है। लेकिन उसे गर्मियों में पानी देना, पशुओं से बचाना, सूखने पर उसकी जगह नया पौधा लगाना और कई वर्षों तक उसकी निगरानी करना कठिन काम है। यही वह काम है, जो किसी अभियान को समारोह से बदलकर पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक पहल बनाता है।पौधरोपण की सफलता का आकलन स्थलवार सर्वाइवल रेट के आधार पर किया जाए। जहां पौधे सूखते हैं, वहां कारणों की जांच हो और सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। जैसलमेर के लिए यह भी जरूरी है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप देशी और कम पानी में पनपने वाली प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। पौधरोपण स्थलों पर जल संरक्षण, वर्षाजल संचयन और उपचारित पानी के सुरक्षित उपयोग की संभावनाएं भी देखी जानी चाहिए।
नगर परिषद को देना चाहिए सार्वजनिक हिसाब
जैसलमेर नगर परिषद और संबंधित विभागों को चाहिए कि वे पौधरोपण के संबंध में उपलब्ध आंकड़ों को एक जगह संकलित करके सार्वजनिक करें। इसके लिए निम्नलिखित जानकारी मांगी जानी चाहिए:
- वर्षवार कितने पौधे खरीदे गए और कितने लगाए गए?
- पौधरोपण किन वार्डों, सड़कों, पार्कों और अन्य स्थलों पर हुआ?
- प्रत्येक अभियान के बाद पौधों की देखभाल किस विभाग या संस्था को सौंपी गई?
- पौधों की सिंचाई, सुरक्षा और रखरखाव पर कितना खर्च हुआ?
- सितंबर 2024 के अभियान के सात स्थलों पर अब कितने पौधे जीवित हैं?
- पौधों की उत्तरजीविता की जांच कब और किस एजेंसी ने की?
- पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण के लिए वर्षवार कितनी राशि स्वीकृत और खर्च हुई?
- संबंधित कार्यों का ऑडिट हुआ या नहीं, और यदि हुआ तो उसमें क्या निष्कर्ष निकले?
इन सवालों का उत्तर मिल जाने पर ही यह तय किया जा सकेगा कि किस योजना ने अच्छा काम किया, कहां कमियां रहीं और किस स्तर पर सुधार की जरूरत है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण किसी एक विभाग का काम नहीं है। बड़े पौधारोपण अभियानों में अनेक संस्थाएं भाग लेती हैं। इसलिए यह भी जरूरी है कि जिम्मेदारियों का बंटवारा स्पष्ट हो और अभियान के बाद निगरानी का लिखित रिकॉर्ड रखा जाए। जिम्मेदारी अस्पष्ट छोड़ देना भी स्वीकार्य व्यवस्था नहीं हो सकती। यदि 2024 के अभियान के पौधों के जीवित रहने का दावा सही है, तो संबंधित विभागों को उसकी जांच करानी चाहिए। यदि आंकड़ा गलत है, तो स्थलवार सर्वेक्षण से वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में पारदर्शिता आवश्यक है। नगर परिषद को पिछले 85 वर्षों के पौधरोपण का संपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध न होने पर भी उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर जानकारी संकलित करनी चाहिए। पुराने रिकॉर्ड, वार्षिक बजट, ऑडिट दस्तावेज, पौधों की खरीद और रखरखाव से जुड़े भुगतान, पार्कों की सूची और वर्तमान वृक्ष गणना को मिलाकर एक उपयोगी तस्वीर तैयार की जा सकती है।
स्वर्णनगरी को चाहिए हरियाली, केवल आंकड़ों की चमक नहीं
जैसलमेर की प्राकृतिक परिस्थितियां पर्यावरण संरक्षण को कठिन जरूर बनाती हैं, लेकिन इसी कारण यहां पौधों की देखभाल और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पांच लाख से अधिक पौधे लगाने का अभियान एक बड़ी सामूहिक पहल थी। उसकी उपलब्धि को स्थायी पर्यावरणीय लाभ में बदलना अगला और अधिक महत्वपूर्ण कदम है। अब जरूरत ऐसे मॉडल की है, जिसमें पौधारोपण के साथ रखरखाव का बजट, जिम्मेदार संस्था, नियमित निरीक्षण और सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य हो। हर वार्ड में लगाए गए पौधों का डिजिटल या लिखित रजिस्टर बने। प्रत्येक पौधारोपण स्थल का रिकॉर्ड रखा जाए और समय-समय पर जीवित पौधों की गिनती सार्वजनिक की जाए। नागरिकों, विद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को भी निगरानी में शामिल किया जा सकता है। इससे केवल सरकारी विभागों पर निर्भरता कम होगी और पौधों की देखभाल एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी बनेगी। आखिरकार, पर्यावरण के नाम पर आयोजित कार्यक्रमों की वास्तविक सफलता तालियों, प्रमाणपत्रों या लगाए गए पौधों की शुरुआती संख्या से तय नहीं होगी। उसका फैसला आने वाली गर्मियों में मिलने वाली छाया, जीवित पेड़ों की संख्या और शहर की बेहतर होती पर्यावरणीय स्थिति करेगी। जैसलमेर को विश्व रिकॉर्ड के साथ जीवित पेड़ों का रिकॉर्ड भी चाहिए। पौधारोपण पर खर्च हुई राशि का हिसाब चाहिए। और सबसे बढ़कर, जनता को यह जानने का अधिकार है कि हरियाली के नाम पर किए गए प्रयासों का वास्तविक परिणाम क्या रहा। अब संबंधित विभागों को सामने आकर आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि कितने पौधे लगाए गए—सवाल यह है कि उनमें से कितनों को बचाने की जिम्मेदारी निभाई गई।







