उदित भास्कर कॉल : औपनिवेशिक प्रशासन से जनाधिकार लोकव्यवस्था तक: भारत की नई जनसेवा प्रणाली का मौलिक प्रस्ताव

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देश आजाद हुआ। नया संविधान बना। नए संविधान के बाद देश में आईएएस और आईपीएस संस्कृति के रूप से एक ऐसी व्यवस्था का जन्म हुआ जो मूल रूप से गुलामी की मानसिकता से उपजी संस्कृति है। हमारे संविधान निर्माताओं ने अपना दिमाग नहीं नहीं लगाया और गुलामी के अंश हमारी संस्कृति को आज तक डस रहे हैं।

अब जबकि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और देश की जनता के साथ न्याय नहीं करने और अराजगता के आरोप लग रहे हैं और राजनेताओं के साथ मिलकर देश में गुंडाराज चलाने के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में उदित भास्कर एक नई व्यवस्था के सुझाव दे रहा है। इसके लिए देश भर के पाठकों से विचार आमंत्रित है। 

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 uditbhaskarnews@gmail.com

देश आजाद हुआ। नया संविधान बना। नए संविधान के बाद देश में आईएएस और आईपीएस संस्कृति के रूप से एक ऐसी व्यवस्था का जन्म हुआ जो मूल रूप से गुलामी की मानसिकता से उपजी संस्कृति है। हमारे संविधान निर्माताओं ने अपना दिमाग नहीं नहीं लगाया और गुलामी के अंश हमारी संस्कृति को आज तक डस रहे हैं। अब जबकि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और देश की जनता के साथ न्याय नहीं करने और अराजगता के आरोप लग रहे हैं और राजनेताओं के साथ मिलकर देश में गुंडाराज चलाने के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में उदित भास्कर एक नई व्यवस्था के सुझाव दे रहा है। इसके लिए देश भर के पाठकों से विचार आमंत्रित है।

अब जरूरत है पूरी प्रशासनिक संस्कृति को बदलने की। जिसमें जनता अपने ही देश में अधिकारियों के सामने अपने को बेबस महसूस न करे। अधिकारी जनता की सेवा करने के बजाय सत्ता के निर्देशों पर निर्भर ना रहें और किसी आम नागरिक को न्याय पाने के लिए वर्षों तक दर-दर भटकना ना पड़े।

आजाद भारत की आज की आवश्यकता:

अधिकारी जनता का शासक नहीं, जनता के प्रति जवाबदेह लोकसेवक हो। उसकी शक्ति पद से नहीं, कानून से आए; उसकी प्रतिष्ठा जनता के विश्वास से तय होगी और उसका पद जनता के हितों के विरुद्ध काम करने पर सुरक्षित नहीं रहेगा।” उदित भास्कर की राय है कि इस व्यवस्था में केवल आईएएस और आईपीएस का नाम बदलना ही पर्याप्त नहीं होगा। भर्ती, प्रशिक्षण, पदनाम, नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति, संपत्ति की निगरानी, नागरिक शिकायत, आपराधिक जवाबदेही और सेवा से हटाने तक—हर स्तर पर नई परिभाषा चाहिए। और इसका उदित भास्कर मैकेनिज्म बनाने की कोशिश कर रहा है। देश की युवा प्रतिभाओं से भी हमारा आग्रह है कि वे अपने विचार व्यक्त करें।

उदित भास्कर देश की जनता के सामने एक मौलिक मॉडल रख रहा है। यह मौजूदा व्यवस्था का सामान्य सुधार नहीं, बल्कि जनता-केंद्रित प्रशासन की एक नई संवैधानिक परिकल्पना है।

1. नई व्यवस्था का नाम: ‘जनाधिकार लोकव्यवस्था’

उदित भास्कर इस पूरी व्यवस्था के लिए ‘जनाधिकार लोकव्यवस्था’ नाम प्रस्तावित करता हे।

जनाधिकार लोकव्यवस्था

एक नई प्रशासनिक और सार्वजनिक जवाबदेही व्यवस्था का प्रस्ताव

मूल मंत्र: सत्ता नहीं, सेवा। पद नहीं, जवाबदेही। विशेषाधिकार नहीं, समान कानून।

नई व्यवस्था के तीन आधार

  • जनाधिकार: नागरिक को सम्मान, सुनवाई और समयबद्ध न्यायसंगत सेवा का अधिकार।

  • जननियंत्रण: अधिकारियों के कामकाज पर जनता की निगरानी और निर्धारित प्रक्रिया से पद की समीक्षा।

  • जनजवाबदेही: संपत्ति, निर्णयों, शिकायतों और कार्यप्रदर्शन का नियमित सार्वजनिक हिसाब।

इस व्यवस्था में आईएएस और आईपीएस नाम की सेवाएं नहीं होंगी। इनकी जगह कोई एक नई पुरानी शैली की अखिल भारतीय सेवा खड़ी करने के बजाय प्रशासन के अलग-अलग कामों के लिए नई भूमिकाएं होंगी।

यहां एक महत्त्वपूर्ण अंतर है: जनता द्वारा चुनी गई सरकार नीतियां बनाएगी, जबकि जनाधिकार लोकव्यवस्था के अधिकारी उन नीतियों को संविधान और कानून के अनुरूप लागू करेंगे। किसी मंत्री को किसी अधिकारी से गैरकानूनी काम कराने, शिकायत दबाने या जांच रुकवाने का अधिकार नहीं होगा।

2. भर्ती के लिए नया संस्थान: ‘राष्ट्रीय जनसेवा चयन परिषद’

संघ लोक सेवा आयोग के स्थान पर उदित भास्कर ‘राष्ट्रीय जनसेवा चयन परिषद’ का प्रस्ताव रखता है। इसका नाम किसी औपनिवेशिक प्रशासनिक पदवी की नकल नहीं करता और इसका उद्देश्य केवल परीक्षा लेना नहीं, बल्कि देश के प्रतिभाशाली युवाओं को निष्पक्ष अवसर देना होगा।

परिषद के काम होंगे:

  • देशभर में जनसेवा के विभिन्न कार्यक्षेत्रों के लिए भर्ती।

  • आर्थिक रूप से कमजोर, ग्रामीण, आदिवासी, दलित, पिछड़े और दूरदराज के क्षेत्रों के प्रतिभाशाली युवाओं तक अवसर पहुंचाना।

  • कोचिंग पर निर्भरता घटाकर निःशुल्क पाठ्यसामग्री, अभ्यास परीक्षाएं और सरकारी डिजिटल शिक्षण केंद्र उपलब्ध कराना।

  • केवल रटने की क्षमता के बजाय तर्कशक्ति, ईमानदारी, संवाद, समस्या-समाधान, कानून की समझ और व्यावहारिक निर्णय क्षमता जांचना।

  • चयन प्रक्रिया, कटऑफ, मूल्यांकन पद्धति और परिणामों का ऑडिट कराना।

परीक्षा कैसी हो?

चरण प्रस्तावित तरीका
पहला बुनियादी योग्यता, तर्कशक्ति, भाषा और नागरिक समझ की परीक्षा
दूसरा वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित समस्या-समाधान, निर्णय क्षमता और नैतिकता का परीक्षण
तीसरा संरचित साक्षात्कार, व्यवहारगत मूल्यांकन और सत्यापन
अंतिम चयन प्रकाशित मानदंडों, आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों और ऑडिट योग्य मेरिट के आधार पर

किसी महंगी कोचिंग को सफलता की अनिवार्य शर्त नहीं बनने दिया जाएगा। परीक्षा हिंदी सहित संविधान की आठवीं अनुसूची की भाषाओं में उपलब्ध कराने की दिशा में काम होना चाहिए, जहां तकनीकी और मूल्यांकन संबंधी व्यवस्था संभव हो। किसी भाषा या क्षेत्र के कारण प्रतिभा को अनुचित नुकसान न हो।

मूल बदलाव: चयन परिषद ऐसे युवाओं की तलाश करेगी जो जनता की समस्याएं सुलझा सकें—सिर्फ वे नहीं जो कठिन परीक्षा में सर्वाधिक अंक ला सकें।

3. आईएएस और आईपीएस के स्थान पर नई कार्य-व्यवस्थाएं

उदित भास्कर पदनामों को भी पूरी तरह बदलने का प्रस्ताव रखता है। इनमें ‘पुलिस’ शब्द और वर्तमान पदक्रम के नाम नहीं होंगे। कानून-व्यवस्था, अपराध की जांच, नागरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के कार्य अलग-अलग स्पष्ट भूमिकाओं में व्यवस्थित होंगे।

1. जिला जनप्रबंधक

जिला स्तर

जिले में सरकारी योजनाओं, नागरिक सेवाओं, राजस्व संबंधी कार्यों, सार्वजनिक सुविधाओं और विभागों के समन्वय की जिम्मेदारी। यह पद किसी जिले का निरंकुश शासक नहीं होगा; इसके निर्णयों पर कानूनी अपील और सार्वजनिक समीक्षा उपलब्ध होगी।

2. क्षेत्रीय जनसमन्वयक

संभाग या क्षेत्रीय स्तर

कई जिलों की साझा समस्याओं, अंतर-जिला योजनाओं, अस्पतालों, परिवहन, जल प्रबंधन और सेवा-वितरण की निगरानी। इसका काम जिलों पर मनमाना नियंत्रण नहीं, बल्कि समन्वय और जवाबदेही होगा।

3. राज्य जनव्यवस्था प्रमुख

राज्य स्तर

राज्य की प्रशासनिक सेवाओं, विभागीय लक्ष्यों, जिलों के बीच संसाधन वितरण और सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था का समन्वय। यह पद भी स्वतंत्र जांच और नागरिक शिकायत प्रक्रिया के अधीन रहेगा।

4. नागरिक सुरक्षा अन्वेषक

सुरक्षा और जांच का अलग कार्यक्षेत्र

अपराध की निष्पक्ष जांच, नागरिक सुरक्षा, सार्वजनिक शांति और आपदा के समय सहायता से जुड़े कार्यों के लिए प्रशिक्षित अधिकारी। जांच और अभियोजन के निर्णय कानून के अनुसार होंगे; किसी राजनीतिक पदाधिकारी को किसी विशेष व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई कराने या उसे बचाने का अधिकार नहीं होगा।

5. लोकन्याय एवं अधिकार अधिकारी

नागरिक अधिकार और शिकायत निवारण

सरकारी कार्यालयों द्वारा सुनवाई न किए जाने, सेवा में अनुचित विलंब, भेदभाव या अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की प्रारंभिक जांच, संबंधित स्वतंत्र निकाय को संदर्भ और शिकायतकर्ता को प्रगति की सूचना। इन पदों के लिए नियुक्ति और पदोन्नति कार्यक्षेत्र की योग्यता, प्रशिक्षण, प्रदर्शन और ईमानदारी के आधार पर होनी चाहिए। एक ही व्यक्ति को हर विभाग का विशेषज्ञ मानने के बजाय वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक, जल, कृषि और नागरिक सुरक्षा के लिए अलग विशेषज्ञ मार्ग भी बनाए जाने चाहिए।

ये नाम प्रस्तावित हैं, वर्तमान में स्थापित पदनाम नहीं। अंतिम नामावली और अधिकारों का निर्धारण कानून के जरिए करना होगा।

4. जनता की वोटिंग से अधिकारी की समीक्षा और स्थानांतरण

उदित भास्कर का यह सुझाव क्रांतिकारी हिस्सा है। इसे लागू करने योग्य बनाने के लिए इस व्यवस्था का नाम —‘जनविश्वास समीक्षा प्रणाली’ हो सकता है। इसके अंतर्गत जिस जिले या क्षेत्र में अधिकारी कार्यरत है, वहां के नागरिक उसके व्यवहार, सुनवाई, कामकाज और सेवाओं की गुणवत्ता पर अपनी राय दर्ज कर सकेंगे। लेकिन एक जरूरी सुरक्षा भी होनी चाहिए: केवल लोकप्रियता, जातीय समीकरण, राजनीतिक प्रचार या किसी अधिकारी के कठोर लेकिन कानूनी निर्णय से नाराज लोगों के कारण उसे तुरंत हटाया न जा सके। इसलिए वोटिंग को मनमाने ढंग से पद छीनने का साधन नहीं, बल्कि स्वतंत्र समीक्षा शुरू करने का अधिकार बनाना बेहतर होगा।

प्रस्तावित प्रक्रिया

चरण 1 — नागरिक मूल्यांकन

प्रत्येक छह महीने में गोपनीय और सत्यापित नागरिक सर्वेक्षण। सुनवाई, समयबद्ध सेवा, निष्पक्षता, व्यवहार और शिकायतों के निपटारे का मूल्यांकन।

चरण 2 — समीक्षा की सीमा

यदि तय मानकों के अनुसार नागरिक असंतोष या गंभीर शिकायतों का स्तर निर्धारित सीमा पार करे, तो स्वतः स्वतंत्र समीक्षा शुरू हो। शिकायतों की संख्या के साथ उनकी प्रकृति और सत्यापन भी देखा जाए।

चरण 3 — स्वतंत्र जांच

संबंधित अधिकारी से लिखित जवाब लिया जाए। शिकायतकर्ता को अपनी बात रखने का अवसर मिले। दस्तावेज, निर्णय, सेवा रिकॉर्ड और शिकायत निपटान की जांच की जाए।

चरण 4 — कारणयुक्त फैसला

आरोप सिद्ध हों तो सुधारात्मक निर्देश, जिम्मेदारी में बदलाव, पद से हटाना, अनुशासनात्मक कार्रवाई या आपराधिक जांच की संस्तुति की जा सके। गंभीर मामलों में तत्काल अस्थायी निलंबन जैसी कार्रवाई कानून के तहत हो। उदित भास्कर का मानना है कि अतिरिक्त सिफारिश: नागरिकों को केवल असंतोष जताने का नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तें पूरी होने पर जनसमीक्षा प्रस्ताव शुरू करने का अधिकार मिले। उदाहरण के लिए, किसी अधिकारी के विरुद्ध सत्यापित शिकायतें बार-बार लंबित रहने पर तय संख्या में नागरिक डिजिटल या लिखित हस्ताक्षर देकर औपचारिक समीक्षा मांग सकें। अंतिम सीमा, पात्र मतदाता, मतदान की गोपनीयता, फर्जी मतदान से सुरक्षा और समीक्षा के परिणाम कानून में स्पष्ट हों। किसी अधिकारी का स्थानांतरण केवल अफवाहों या राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि जांच के निष्कर्षों और कारणयुक्त आदेश से हो।

5. आम नागरिक और अधिकारी के लिए समान कानून

उदित भास्कर की दूसरी मांग है कि अधिकारी पर आरोप लगने पर उसे सामान्य नागरिक की तरह कानून का सामना करना पड़े। इस सिद्धांत से सभी सहमत होंगे। पद किसी व्यक्ति को अपराध के लिए विशेष छूट का कवच नहीं देना चाहिए।

इसके लिए निम्न प्रावधान होने चाहिए:

  • कोई नागरिक अधिकारी के विरुद्ध निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार शिकायत दर्ज करा सके।

  • यदि संबंधित जांच एजेंसी शिकायत दर्ज करने से इनकार करे, तो नागरिक के पास न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा सक्षम अदालत में जाने का प्रभावी रास्ता हो।

  • भ्रष्टाचार, रिश्वत, मारपीट, अवैध हिरासत, सबूत नष्ट करने या अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों की जांच स्वतंत्र निकाय करे।

  • अदालत में मामला पहुंचाने के लिए केवल इसलिए अतिरिक्त अनुमति या विशेष प्रक्रिया की बाधा न हो कि आरोपी लोकसेवक है—जहां संविधान और लागू कानून ऐसे संरक्षण की अनुमति देते हैं, वहां बदलाव के लिए स्पष्ट वैधानिक संशोधन आवश्यक होंगे।

  • अधिकारी के खिलाफ आरोप लगने मात्र से उसे दोषी न माना जाए। निष्पक्ष सुनवाई, सबूत और अपील का अधिकार अधिकारी तथा शिकायतकर्ता दोनों को मिले।

  • शिकायतकर्ता को धमकाने, प्रताड़ित करने या प्रतिशोध लेने पर अलग दंडनीय कार्रवाई हो।

उदित भास्कर बता देना चाहता है कि वर्तमान व्यवस्था में भी अधिकारी कानून से ऊपर नहीं हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में अभियोजन स्वीकृति और पद से जुड़े वैधानिक संरक्षण लागू है। उन्हें बदलने के लिए संबंधित कानूनों में स्पष्ट संशोधन कर दिया जाना चाहिए। नई व्यवस्था में ऐसे संरक्षण का उद्देश्य केवल ईमानदार आधिकारिक निर्णयों को दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाना होना चाहिए, न कि भ्रष्टाचार या जानबूझकर किए गए अन्याय को ढकना।

6. ‘लोकजवाबदेही एवं जनअधिकार आयोग’

उदित भास्कर का मानना है कि वरिष्ठ पत्रकारों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और शिक्षाविदों जैसे कई वर्ग की भागीदारी वाला स्वतंत्र आयोग बनाया जाए। यह इसे नई व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंभ होगा। इसका प्रस्तावित नाम होगा:

लोकजवाबदेही एवं जनअधिकार आयोग

यह आयोग सरकार के रोजमर्रा के आदेशों से स्वतंत्र हो और अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति, संपत्ति प्रकटीकरण, नागरिक शिकायतों तथा सेवा-आचरण की निगरानी के लिए अलग-अलग प्रकोष्ठों में काम करे।

आयोग की संरचना

सदस्य भूमिका
सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश कानूनी निष्पक्षता और प्रक्रिया की निगरानी
वरिष्ठ पत्रकार या जनसंचार विशेषज्ञ नागरिकों की समस्याओं, सार्वजनिक सूचना और पारदर्शिता की समझ
शिक्षाविद या लोकनीति विशेषज्ञ प्रशासनिक दक्षता, प्रशिक्षण और निष्पक्ष मूल्यांकन
वित्तीय जांच या लेखा विशेषज्ञ संपत्ति, आय और वित्तीय अनियमितताओं की जांच
नागरिक अधिकार विशेषज्ञ शिकायतकर्ता की सुरक्षा और समानता
नागरिक प्रतिनिधि जनता के अनुभव और स्थानीय जवाबदेही को संस्थागत आवाज

आयोग के सदस्य किसी एक राजनीतिक दल के नामांकन से सीधे नियुक्त न हों। चयन के लिए बहुपक्षीय चयन समिति, सार्वजनिक पात्रता मानदंड, हितों के टकराव का खुलासा और नियुक्ति पर सार्वजनिक कारण देना अनिवार्य हो। सदस्यों का निश्चित कार्यकाल हो। उन्हें मनमाने ढंग से हटाया न जा सके। आयोग के अपने निर्णयों पर भी न्यायिक समीक्षा उपलब्ध होनी चाहिए। एक जरूरी सुरक्षा: पत्रकार, न्यायाधीश या शिक्षाविद होना अपने आप में निष्पक्षता की गारंटी नहीं है। इसलिए आयोग के सदस्यों के लिए भी संपत्ति और हितों का खुलासा, आचार संहिता, निर्णयों का रिकॉर्ड और दुराचार पर हटाने की स्पष्ट प्रक्रिया लागू होनी चाहिए।

7. नियुक्ति से हर छह महीने तक संपत्ति का सार्वजनिक हिसाब

उदित भास्कर का सुझाव बहुत स्पष्ट और व्यावहारिक है। अधिकारी की संपत्ति का विवरण नियुक्ति के समय लिया जाए, सार्वजनिक किया जाए और प्रत्येक छह महीने में नया विवरण प्रकाशित हो। इसे ‘सार्वजनिक संपत्ति एवं हित-पारदर्शिता नियम’ नाम दिया जाना चाहिए।

संपत्ति प्रकटीकरण की व्यवस्था

नियुक्ति के समय

अधिकारी अपनी अचल संपत्ति, बैंक और निवेश संबंधी घोषित परिसंपत्तियों, देनदारियों, आय के स्रोतों, व्यावसायिक हितों और लागू नियमों के अनुसार परिवार की संबंधित संपत्तियों का विवरण दे। नियुक्ति से पहले की संपत्ति और उसके वैध स्रोत दर्ज हों।

हर छह महीने में

अद्यतन विवरण जमा करना अनिवार्य हो। संपत्ति में वृद्धि, नए निवेश, बड़ी खरीद, विरासत, ऋण और अन्य महत्त्वपूर्ण बदलावों का कारण तथा वैध स्रोत बताया जाए।

सार्वजनिक पोर्टल पर प्रकाशन

घोषित संपत्ति, देनदारियों, अवधि के दौरान बदलाव और वृद्धि के बताए गए स्रोतों का खोजने योग्य रिकॉर्ड उपलब्ध हो। निजी पहचान संबंधी विवरण, बैंक खाता नंबर, बच्चों की सुरक्षा से जुड़े पते और अन्य संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न की जाए।

असामान्य वृद्धि पर जांच

यदि घोषित आय और संपत्ति में बड़ा अंतर दिखे, तो अधिकारी को समयबद्ध स्पष्टीकरण देना पड़े। स्वतंत्र वित्तीय जांच प्रकोष्ठ दस्तावेजों का सत्यापन करे। जवाब असंतोषजनक हो या अन्य साक्ष्य मिलें तो कानून के अनुसार विस्तृत जांच शुरू हो।

संपत्ति की निगरानी में तीन अतिरिक्त नियम

  1. केवल संपत्ति बढ़ना अपराध का प्रमाण नहीं होगा। विरासत, वैध निवेश, जीवनसाथी की स्वतंत्र आय और संपत्ति के बाजार मूल्य में बदलाव जैसे कारण भी जांचे जाएंगे।

  2. बेनामी संपत्ति और हितों के टकराव की जांच हो। अधिकारी के अपने नाम के साथ-साथ कानून के अनुसार उसके लाभकारी स्वामित्व और व्यावसायिक हितों का सत्यापन किया जाए।

  3. झूठी घोषणा पर कठोर कार्रवाई हो। जानबूझकर गलत जानकारी देने, संपत्ति छिपाने या जांच में बाधा डालने पर विभागीय दंड, पद से हटाने की कार्रवाई और अपराध बनने पर अभियोजन हो।

उदित भास्कर की राय में हर छह महीने में संपत्ति का सार्वजनिक रिकॉर्ड बनाना भ्रष्टाचार रोकने की मजबूत व्यवस्था हो सकती है—बशर्ते विवरण केवल अधिकारी के स्वघोषणा-पत्र तक सीमित न रहे, बल्कि जोखिम-आधारित स्वतंत्र सत्यापन भी हो।

8. वेतन, भत्ते और पदोन्नति के लिए स्वतंत्र आयोग

उदित भास्कर का मानना है कि अधिकारी के वेतन, सुविधाएं और पदोन्नति का फैसला उस राजनीतिक व्यवस्था के सीधे नियंत्रण में नहीं होना चाहिए जिसके दबाव में आने से प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसके लिए मैं एक अलग निकाय प्रस्तावित करते हैं-

लोकसेवा वेतन, योग्यता एवं कार्यकाल आयोग

इस आयोग में लोकवित्त विशेषज्ञ, सेवानिवृत्त न्यायाधीश, शिक्षाविद, श्रम एवं मानव संसाधन विशेषज्ञ और सार्वजनिक प्रशासन के स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हों।

इसके प्रमुख काम होंगे:

  • वेतन, भत्ते, आवास और अन्य सुविधाओं के लिए पारदर्शी मानक तय करना।

  • पदोन्नति को केवल वरिष्ठता या राजनीतिक निकटता पर निर्भर न रहने देना।

  • ईमानदारी, काम की गुणवत्ता, नागरिक संतुष्टि, निर्णय क्षमता, समयबद्ध सेवाओं और नेतृत्व के आधार पर मूल्यांकन करना।

  • पदोन्नति अस्वीकार करने पर लिखित कारण देना और अपील का अधिकार उपलब्ध कराना।

  • तबादले, पदावनति या अनुशासनात्मक कार्रवाई में राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका होने पर स्वतंत्र समीक्षा करना।

  • सभी अधिकारियों के लिए एक सार्वजनिक सेवा-आचरण संहिता बनाना।

इस आयोग की सिफारिशें सार्वजनिक हों। सरकार बजट और वैध नीतिगत सीमाओं के भीतर निर्णय ले सके, लेकिन आयोग की सिफारिशों को अस्वीकार करने पर उसे सार्वजनिक, लिखित और तर्कसंगत कारण देना पड़े। इस तरह आयोग स्वतंत्र होगा, पर सरकारी वित्तीय जवाबदेही से पूरी तरह अलग नहीं होगा।

9. जब अधिकारी आम आदमी की सुनवाई न करे, तब क्या होगा?

उदित भास्कर  ‘जनसुनवाई एवं त्वरित जांच प्रकोष्ठ’ का प्रस्ताव रखता है।  यह सामान्य प्रशासनिक कार्यालय से अलग और स्वतंत्र जांच व्यवस्था के अंतर्गत काम करेगा।

इसकी प्रक्रिया इस प्रकार होगी:

  1. नागरिक ऑनलाइन, डाक से या व्यक्तिगत रूप से शिकायत दर्ज कर सके।

  2. शिकायतकर्ता को एक पंजीकरण संख्या मिले और वह हर चरण की स्थिति देख सके।

  3. शिकायत गंभीर होने पर संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा जाए और जरूरी रिकॉर्ड सुरक्षित किया जाए।

  4. यदि शिकायत स्थानीय स्तर के अधिकारी के विरुद्ध है, तो जांच उसी अधिकारी के अधीनस्थ कार्यालय से न कराई जाए।

  5. तय समयसीमा में शिकायत पर निर्णय हो। समय बढ़ाने पर कारण दर्ज करना अनिवार्य हो।

  6. लापरवाही, दुर्भावना या जानबूझकर सुनवाई न करने की पुष्टि होने पर सुधारात्मक आदेश, अनुशासनात्मक कार्रवाई या कानून के अनुसार आपराधिक जांच हो।

  7. शिकायतकर्ता को स्वतंत्र अपील और सक्षम अदालत में जाने का अधिकार मिले।

एक अतिरिक्त प्रावधान यह होना चाहिए कि यदि शिकायतकर्ता को स्थानीय स्तर पर लगातार न्याय नहीं मिलता, तो मामला स्वतः अगले स्वतंत्र स्तर पर चला जाए। इससे नागरिक को एक ही कार्यालय के चक्कर बार-बार नहीं लगाने पड़ेंगे।

10. पूरे देश के लिए एक समान सिद्धांत, लेकिन स्थानीय जरूरतों के अनुसार काम

140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में एक ही तरह की प्रशासनिक परीक्षा और एक ही तरह का अधिकारी हर समस्या का सर्वश्रेष्ठ समाधान नहीं हो सकता। इसलिए जनाधिकार लोकव्यवस्था में तीन स्तरों की जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए:

स्तर मुख्य जवाबदेही
जिला नागरिक सेवाएं, स्थानीय समस्याएं, राजस्व, जनसुनवाई और विभागीय समन्वय
संभाग या क्षेत्र अनेक जिलों की साझा समस्याएं, योजनाओं का समन्वय और जिला-स्तरीय कार्यों की समीक्षा
राज्य राज्यव्यापी मानक, संसाधनों का वितरण, विभागीय जवाबदेही और स्वतंत्र समीक्षा

स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसी जिले का निवासी अपने ही क्षेत्र में सरकारी पद के लिए स्वतः अधिक अधिकार पा जाए। भर्ती में स्थानीय भाषाओं और समस्याओं की समझ को उचित महत्त्व मिले, लेकिन समान अवसर, राष्ट्रीय एकता, आरक्षण और संवैधानिक समानता सुरक्षित रहें। इसी तरह, जिला जनप्रबंधक का स्थानांतरण केवल राज्य सरकार की इच्छा पर निर्भर न हो। स्थानांतरण का प्रस्ताव निर्धारित कारणों के साथ आए और स्वतंत्र समीक्षा निकाय यह देख सके कि कहीं निर्णय भ्रष्टाचार की जांच रोकने या किसी अधिकारी को राजनीतिक लाभ पहुंचाने के लिए तो नहीं लिया गया।

11. नई व्यवस्था लागू करने के लिए संवैधानिक रास्ता

यहां एक व्यावहारिक बात स्पष्ट करना जरूरी है। यह मॉडल एक नीतिगत प्रस्ताव है, मौजूदा कानून में तुरंत लागू की जा सकने वाली तैयार व्यवस्था नहीं। भारत में संघ लोक सेवा आयोग, अखिल भारतीय सेवाओं, राज्य लोक सेवा आयोगों और लोकसेवकों की सेवा-शर्तों से संबंधित संवैधानिक तथा वैधानिक प्रावधान हैं। इसे पूरी तरह समाप्त करके नई व्यवस्था स्थापित करने के लिए विस्तृत संवैधानिक और कानूनी परीक्षण किया जाए। जहां संविधान संशोधन आवश्यक हो, वहां निर्धारित संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

उदित भास्कर की सिफारिश है कि बदलाव तीन चरणों में किया जाए:

  • पहला चरण: स्वतंत्र जनशिकायत प्रकोष्ठ, सार्वजनिक संपत्ति पोर्टल, पारदर्शी पदोन्नति मानक और नागरिक मूल्यांकन के पायलट प्रोजेक्ट।

  • दूसरा चरण: चयन, प्रशिक्षण, जिला प्रशासन और नागरिक सुरक्षा के नए कार्यक्षेत्रों का कुछ राज्यों में परीक्षण; साथ ही कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों में आवश्यक संशोधन।

  • तीसरा चरण: स्वतंत्र मूल्यांकन के बाद सफल मॉडल का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार और पुरानी सेवाओं की जगह नई व्यवस्था का चरणबद्ध निर्माण।

इस प्रक्रिया में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघीय ढांचे, नागरिक अधिकारों और निष्पक्ष भर्ती की संवैधानिक गारंटी को सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा।

12. उदित भास्कर के प्रस्ताव का सार

उदित भास्कर इस व्यवस्था के सात मूल स्तंभ तय करता है :

1. राष्ट्रीय जनसेवा चयन परिषद

प्रतिभाशाली युवाओं का निष्पक्ष चयन, आर्थिक रूप से कमजोर उम्मीदवारों के लिए वास्तविक अवसर और कोचिंग पर निर्भरता में कमी।

2. जनविश्वास समीक्षा प्रणाली

नागरिक मूल्यांकन, निर्धारित शर्तों पर औपचारिक समीक्षा और जांच के बाद स्थानांतरण या पद से हटाने की व्यवस्था।

3. समान कानूनी जवाबदेही

अधिकारियों के लिए पद के आधार पर अनुचित आपराधिक छूट समाप्त करने की दिशा में कानून-सम्मत सुधार।

4. लोकजवाबदेही एवं जनअधिकार आयोग

स्वतंत्र शिकायत जांच, नागरिक अधिकारों की रक्षा और अधिकारियों के आचरण की समीक्षा।

5. सार्वजनिक संपत्ति एवं हित-पारदर्शिता नियम

नियुक्ति के समय और हर छह महीने में संपत्ति का विवरण, सार्वजनिक प्रकटीकरण और स्वतंत्र सत्यापन।

6. लोकसेवा वेतन, योग्यता एवं कार्यकाल आयोग

वेतन, पदोन्नति, कार्यकाल, स्थानांतरण और सेवा-शर्तों के लिए पारदर्शी एवं स्वतंत्र मानक।

7. जनसुनवाई एवं त्वरित जांच प्रकोष्ठ

नागरिकों की शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई, शिकायतकर्ता की सुरक्षा और स्वतंत्र अपील।

अधिकारी को सत्ता का प्रतीक मानने की बजाय जवाबदेही बनाया जाए

उदित भास्कर की परिकल्पना की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें अधिकारी को सत्ता का प्रतीक मानने के बजाय जनता के प्रति जवाबदेह कर्मचारी के रूप में परिभाषित किया गया है। लेकिन इसे सफल बनाने के लिए जनता के नियंत्रण और कानून के शासन के बीच संतुलन भी जरूरी है। किसी अधिकारी को केवल लोकप्रियता के आधार पर हटाना ठीक नहीं होगा; और किसी अधिकारी को उसके पद के कारण जवाबदेही से बचाना भी ठीक नहीं होगा। इसलिए उदित भास्कर का प्रस्ताव है कि ‘जनाधिकार लोकव्यवस्था’ भारत की ऐसी नई व्यवस्था बने जिसमें चयन योग्यता से हो, अधिकार कानून से मिलें, काम का मूल्यांकन जनता करे, संपत्ति का हिसाब सार्वजनिक हो और दुराचार पर निष्पक्ष जांच के बाद कार्रवाई हो। उदित भास्कर इस विचार को आगे बढाने के लिए इसका शीर्षक देना चाहेगा-

औपनिवेशिक प्रशासन से जनाधिकार लोकव्यवस्था तक: भारत की नई जनसेवा प्रणाली का मौलिक प्रस्ताव

यह केवल पदनाम बदलने का दस्तावेज नहीं होना चाहिए। इसे भर्ती से लेकर अंतिम जवाबदेही तक पूरी व्यवस्था की नई रूपरेखा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

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