‘जब मैं था तब हरि नहीं…’ : कबीर के एक दोहे में छिपा अहंकार से आत्मबोध तक का पूरा दर्शन

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 ‘मैं’ के मिटते ही परमात्मा का बोध—कबीर ने दो पंक्तियों में समझाया आत्मज्ञान, अद्वैत और अंतर्मन के प्रकाश का रहस्य

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

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संत कबीरदास का प्रसिद्ध दोहा—“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाही। सब अंधियारा मिट गया, जब दीपक देखा माहीं।”—अहंकार से आत्मबोध की यात्रा का गहन संदेश देता है। यहां ‘मैं’ अहंकार का प्रतीक है, जो मनुष्य और परम सत्य के बीच दूरी बनाता है। जब अहंकार विलीन होता है, तब भीतर परमात्मा की अनुभूति होने लगती है। ‘अंधियारा’ अज्ञान, मोह और भ्रम का प्रतीक है, जबकि ‘दीपक’ ज्ञान, विवेक और आत्मचेतना का। कबीर बताते हैं कि सत्य की खोज बाहर नहीं, अपने अंतर्मन में करनी चाहिए। भीतर का दीपक जलते ही जीवन की दृष्टि बदल जाती है।

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