श्रीमती आशा गुप्ता का यह फैसला महज एक संयोग नहीं, बल्कि उनके घर में रचे-बसे महान संस्कारों की परिणति था। उनके दिवंगत पति रामकृष्ण गुप्ता ने अपने निधन के समय शरीर के अंगों का दान (अंगदान) कर कई जिंदगियों को नया जीवन दिया था।
राखी पुरोहित. जोधपुर
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जिंदगी जीने के कई तरीके होते हैं, लेकिन कुछ लोग अपने जाने के बाद भी समाज के लिए एक जीवंत रोशनी छोड़ जाते हैं। आमतौर पर लोग जीवनभर की कमाई या संपत्ति का दान करते हैं, लेकिन जोधपुर की 82 वर्षीय श्रीमती आशा गुप्ता ने मरणोपरांत अपनी देह का दान कर मानवता, शिक्षा और चिकित्सा विज्ञान के लिए एक ऐसा इतिहास लिख दिया, जो युगों-युगों तक समाज का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।
श्रीमती आशा गुप्ता का यह फैसला महज एक संयोग नहीं, बल्कि उनके घर में रचे-बसे महान संस्कारों की परिणति था। उनके दिवंगत पति रामकृष्ण गुप्ता ने अपने निधन के समय शरीर के अंगों का दान (अंगदान) कर कई जिंदगियों को नया जीवन दिया था। पति के इस निष्काम सेवा भाव और त्याग से गहराई से प्रेरित होकर ही आशा जी ने भी अपनी देह को शिक्षा और शोध कार्य हेतु समर्पित करने का यह ऐतिहासिक निर्णय लिया था।
भले ही स्वर्गीय आशा गुप्ता ने औपचारिक शिक्षा केवल दसवीं कक्षा तक ही प्राप्त की थी, लेकिन उनका दृष्टिकोण और विचारों की ऊंचाइयां अकादमिक डिग्रियों से कहीं ऊपर थीं। वे अपने जीवन में अत्यंत मृदुभाषी, मिलनसार और हर जरूरतमंद के दुख-दर्द में हमेशा ढाल बनकर खड़ी होने वाली एक परोपकारी महिला थीं। उनका पूरा जीवन भगवान श्रीकृष्ण और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की भक्ति में बीता; उनके होठों पर निरंतर भजन और मन में लोक-कल्याण का पवित्र भाव रहता था।
शिक्षा के प्रति उनके मन में कितना अगाध सम्मान था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने निधन से कई वर्ष पूर्व ही अपने ज्येष्ठ पुत्र डॉ. रवि गुप्ता और पुत्रवधु डॉ. आभा गुप्ता के सामने अपनी यह मार्मिक और क्रांतिकारी इच्छा व्यक्त कर दी थी। उन्होंने भावुक होकर कहा था, “जब मैं अपनी देह त्याग दूं, तो मेरी देह को अग्नि में जलाकर खाक मत करना, बल्कि इसे किसी मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों की पढ़ाई और चिकित्सा विज्ञान के शोध के लिए दान कर देना, ताकि मेरे जाने के बाद भी किसी डॉक्टर का हुनर संवर सके और किसी मरीज की जिंदगी बच सके।”
उनके अनुज पुत्र राजीव गुप्ता ने बीई की डिग्री हासिल करने के बाद अमेरिका को अपनी कर्मभूमि चुना और इन दिनों वे अपनी पत्नी ममता गुप्ता व बच्चों के साथ विदेश में हैं, लेकिन परिवार में संस्कारों की यह पवित्र धारा निरंतर प्रवाहित होती रही।
माताजी की इस महान इच्छा का पूर्ण सम्मान करते हुए परिजनों ने उनकी पार्थिव देह को जोधपुर के एस.एन. मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी डिपार्टमेंट को सौंप दिया। देहदान के इस गौरवशाली और प्रेरणादायी अवसर पर उनके पौत्र अविरल एवं पौत्र वधु शैफाली गुप्ता, पुत्री श्रीमती विनय राजवंशी, दामाद मुकुल राजवंशी सहित शहर के कई प्रतिष्ठित चिकित्सक और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। इस विदाई के पल में सभी की आंखें नम थीं, लेकिन मन में एक महान आत्मा के प्रति गहरा गर्व और सम्मान था।
पति के अंगदान से शुरू हुआ यह परोपकार का सफर पत्नी के देहदान तक पहुंचा, जो समाज को यह संदेश देता है कि सच्चे संस्कार किसी डिग्री के मोहताज नहीं होते और शिक्षा व चिकित्सा का प्रसार ही सबसे बड़ा धर्म है।







