निरूपा पटवा की माताजी ने संयम पथ चुना और खुद निरूपा जी ने सेवा का पथ…निरूपा जी का मानना है आत्मा और स्व से जुड़ना संयम है और संसार के कल्याण का मार्ग सेवा है…दोनों को अपना महत्व है…
हम किस प्रकार अमूल्य निधि से अपने सर्वस्व त्याग, समर्पण भाव से अलग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, यह देखने वाली बात है। मैं चाहती हूं कि प्रकृति और प्रयास सफल हो और हम संतुलन के साथ सेवा करें : निरूपा पटवा
“हमेशा मेंबर को साथ में लेकर चलने का जरूरी नहीं है, कार्यक्रम रोज हो, यह जरूरी नहीं है। गुणवत्ता उस पर नहीं परखी जाती है, गुणवत्ता इस पर परखी जाती है कि आपकी वजह से कितने लोग खुश हैं। आपकी वजह से कितने लोगों के घरों में चूल्हा जलता है। आपकी वजह से कितनी लेडीज बाहर निकली है और कितनों में आत्मविश्वास आया है”
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दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
साथ में सुमनेश व्यास
9783414079 uditbhaskarnews@gmail.com
बियोंड द फेस। चेहरे के पीछे का सच। जी, हां इस प्रोग्राम के लिए उदित भास्कर कार्यालय में विशिष्ट मेहमान का आगमन हुआ। यह वह मेहमान हैं जो छोटी उम्र से ही समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं और आज सेवा का संपूर्ण पर्याय बन चुकी हैं। नाम है श्रीमती निरूपा पटवा। निरूपा जी का विस्तृत परिचय प्रोग्राम के अंत में दिया जा रहा है। हम पाठकों की जिज्ञासा बनाए रखते हुए सीधे बातचीत पर आते हैं।
1 सवाल : आपकी माताजी ने सांसारिक जीवन से ऊपर उठकर साध्वी पथ चुना और आपने संसार के बीच रहकर लोगों के दुख-दर्द को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। कभी मन में यह सवाल उठा कि मां ने मोह-माया से दूर होकर आत्मकल्याण का रास्ता चुना और आपने दूसरों के जीवन में उतरकर सेवा का? क्या आपके लिए समाजसेवा ही साधना है, और क्या कभी माताजी के निर्णय को समझते हुए आपने अपने जीवन के चुनावों को नए सिरे से परखा है?
उत्तर : सबसे पहले तो धन्यवाद आपका। मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि मां ने जो संयम का पथ चुना है। वो उनकी जगह बिलकुल सही है। कहते हैं कि आत्मा का कल्याण स्व से होता है। स्व से मिलने के लिए दुनिया से अलग जाना पड़ता है। तो सेवा के कई प्रकार होते हैं तन-मन-धन। चूंकि मां ने अपने तन को सर्वस्व धर्म के लिए न्यौछावर कर दिया है। चूंकि लोगों के मार्ग अलग हैं। पर है सेवा। उनका मार्ग भी अपने आपमें अमूल्य निधि हैं। संयम का पथ लोहे के चने चबाने के समान है। यह आसान कार्य नहीं है। जैन धर्म और उससे जुड़ी शिक्षा और नियम, पालन ये सभी को सर्व विदित है। मां ने उस दिशा में जाकर सेवा करना चुना। मैंने संसार में रहकर संसार के समस्त प्राणियों के लिए किसी न किसी रूप में भागीदारी निभाना चुना। सेवा के कई प्रकार है। उसमें हम लोगों तक जाकर इस मार्ग को इस सेवा के प्रशस्त पालना को कड़ी से कड़ी रीति से टीम के साथ मिलकर करते हैं। हम किस प्रकार अमूल्य निधि से अपने सर्वस्व त्याग समर्पण भाव से अलग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, यह देखने वाली बात है। मैंचाहती हूं कि प्रकृति और प्रयास सफल संतुलन के साथ सेवा में संपन्न हो।
2-आपने सैकड़ों महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होने का हौसला दिया होगा। किसी को रोजगार मिला, किसी को पहचान और किसी को अपने भीतर की ताकत का एहसास। लेकिन एक सवाल आपके लिए—जब आप स्वयं थक जाती हैं, जब जिम्मेदारियां भारी लगती हैं और जब किसी से अपनी परेशानी कहने का मन होता है, तब आपकी ताकत कौन बनता है? क्या दूसरों को संभालने वाली महिला के हिस्से में भी कभी ऐसा अकेलापन आता है, जिसे वह मुस्कुराहट के पीछे छिपा लेती है?
उत्तर : चूंकि पहला जो प्रश्न था। उसी मैं दूसरे प्रश्न का उत्तर समाहित है। हां मैं भी एक औरत हूं। पुरुष प्रधान देश में रहती हूं। जैसा कि आपने मेरी सफलता देखी। पर मेरी पैरों के छाले और मेरी आंखों के गड्ढे नहीं देखे। लेकिन एक महिला होने के नाते बहुत सारे निजी जिंदगी में कई ऐसी परेशानियां और ऐसी सामाजिक गतिविधियों का और ऐसी सकारात्म्क दोनों ही प्रकार के संतुलन को देखना पड़ता है। हां, हम भी डिमोटिवेट होते हैं कई प्रकार। पर पहले प्रश्न का उत्तर दूसरे प्रश्न में है। जैसा कि आपने कहा कि कहां जाते हैं हम, हम यह सोचने के लिए कि हमें क्या करना है, हमें वापस कैसे उठना है, वापस कैसे चलना है। मां। मां ही वो ताकत है। जिनको याद करके, जिनके समर्पण को देखकर, हमें फिर से उठने और चलने और दौड़ने की हिम्मत मिलती है। हां हम लेडीज को आगे लेकर आते हैं, महिला सशक्तिकरण का काम करते हैं। लेकिन उन महिलाओं में उन महिलाओं में समाज में खड़े होने की हिम्मत बंधती है वो मेरे लिए सबसे बड़ी है। वो मेरी हिम्मत का कारण बनती है।
3. आपको 150 से अधिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है, लेकिन आपका विश्वास है कि कर्म करते रहना चाहिए, सम्मान के लिए काम नहीं करना चाहिए। जरा कल्पना कीजिए, एक दिन आपके सारे सम्मान, प्रशस्ति-पत्र और पुरस्कार आपके सामने रख दिए जाएं और आपसे पूछा जाए कि इनमें से कौन-सा सम्मान आपके जीवन के सबसे करीब है। क्या आप किसी बड़े मंच पर मिले पुरस्कार को चुनेंगी या किसी ऐसी महिला की आंखों में आए आंसू को, जिसने आपकी मदद से पहली बार अपने पैरों पर खड़े होने का विश्वास पाया? आखिर वह कौन-सा क्षण है, जिसे आप किसी भी पुरस्कार से बड़ा मानती हैं?
उत्तर : मेरे जीवन का अनमोल क्षण जो कि मेरे लिए सर्व प्रथम 30 मार्च 2020 से मैं कोरोना की फ्रंटलाइन वॉरियर थी। मैंने पहले दिन यह सोचा कि सभी जरूरतमंद गरीब लोग जो राह चलते खाना खाते हैं वो कहां खाएंगे? जब हमने पहले खाना बनाने और बांटने का सोचा। पूरे दिन की मेहनत के बाद शाम को 5 बजे बहुत सारा खाना बनाकर लेकर पहुंचे तो सड़क किनारे बैठे लोगों को खाना देने के बाद उनके चेहरे की जो खुशी थी। उनके जो दुआओं वाले शब्द थे वो मेरे दिल और दिमाग पर अंकित हो गए। वो मेरे लिए मेरे जीवन का माइल स्टोन था। और वहां से मुझे जीवन को बढ़ाने की प्रेरणा मिली। सारे सम्मान एक तरफ और उनके चेहरों की खुशियां एक तरफ। वो मेरे जीवन का बेहतरीन पल था।
4. जैन दर्शन हमें अहिंसा, करुणा, अपरिग्रह और जीवमात्र के प्रति संवेदना की सीख देता है। आप इन मूल्यों को महिलाओं, बच्चों, दिव्यांगों और बेजुबान जीवों की सेवा में उतारती हैं। लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी समाज में, जहां स्वार्थ और दिखावे का दबाव भी है, अहिंसा और करुणा पर टिके रहना कितना कठिन है? यदि कभी किसी व्यक्ति ने आपकी सेवा भावना का गलत फायदा उठाया हो, तो क्या आप उसके प्रति भी करुणा रख पाती हैं, या उस क्षण सेवा करने वाली निरूपा के भीतर की इंसान आहत हो जाती है?
उत्तर : समाज में रहते हुए जो कि आपको पता है। जो अच्छा काम करता है। जो बराबरी नहीं कर सकता है, वो बात करते हैं। यही हमारी सफलता की निशानी है। वो अगर बात कर रहे हैं, तो समझ जाइए कि आपका काम बहुत अच्छा हो रहा है। चूंकि छद्ममस्त हैं। इंसान है ताे आहत भी होते हैं। लेकिन इससे उन्हें फिर से चलने और फिर से दोड़ने की ताकत अपने अंदर से मिलती है। और इस समाज में हाथ पकड़कर बढ़ाने वाले कम मिलते हैं और टांग खींच कर गिराने वाले खूब मिलते हैं। मैं अपनी लाइन को बड़ा करने में विश्वास रखती हूं ना कि किसी की लाइन छोटा करने में।
5. आप गर्मी में पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करती हैं, बेजुबान पशुओं की सेवा करती हैं और उन लोगों तक पहुंचती हैं, जिनकी आवाज अक्सर समाज तक नहीं पहुंच पाती। एक घायल पक्षी और किसी असहाय इंसान की पीड़ा में आपको कौन-सा साझा भाव दिखाई देता है? क्या आपके लिए सेवा का अर्थ केवल किसी की जरूरत पूरी करना है, या उस जीव को यह एहसास दिलाना भी है कि दुनिया में कोई है, जिसे उसके अस्तित्व की परवाह है? और क्या कभी किसी बेजुबान जीव ने आपको इंसानों के बारे में कोई ऐसी सीख दी, जो बड़ी-बड़ी किताबों में भी नहीं मिलती?
उत्तर : बिलकुल सही कहा आपने। समाजसेवा सभी करते हैं। मैं कोई नया काम नहीं करती। मगर प्रेम एक ऐसी भाषा है जिसे दुनिया का हर बेजुबान प्राणी चाहे वो मनुष्य हो या दिव्यंश (जानवर) सभी समझते हैं। प्रेम की भाषा आंखों से बोली जाती है और उस भाषा को प्राणी मात्र सभी समझते हैं। और वही प्रेम मैं मूल प्रकृति को देने में विश्वास रखती हूं। इसी प्रेम के नाते जायंट्स वेलफेयर फाउंडेशन का ऑनली लेडीज का पूरे भारत का पिछले छह सालों से सबसे बड़ा ग्रुप है। काम कुछ नया नहीं करती। वही काम लेकिन प्रेम से। इसी प्रेम की अनमोल कड़ियां, जो हम प्रकृति को, और अपने मेंबर्स को और अपनी टीम को अपने साथियों को परोसते हैं। यही आगे चलकर हमारे लिए संगठन और ताकत का रूप बनता है।
6. जायंट्स ग्रुप ऑफ रॉयल लेडीज के फेडरेशन ऑफिसर के रूप में आपके नेतृत्व में संगठन ने विस्तार और पहचान हासिल की है। लेकिन किसी भी संगठन के सामने एक समय ऐसा आता है, जब सदस्यों की संख्या, कार्यक्रमों की भव्यता और उपलब्धियों का प्रदर्शन उसके मूल उद्देश्य पर भारी पड़ने लगता है। यदि आपको कभी संगठन की लोकप्रियता और सेवा की गुणवत्ता में से किसी एक को प्राथमिकता देनी पड़े, तो आप किसे चुनेंगी? और नेतृत्व करते हुए क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी निर्णय में संगठन को आगे बढ़ाने से ज्यादा जरूरी आपको किसी एक जरूरतमंद की मदद करना लगा हो?
उत्तर : बिलकुल सही कहा आपने। समाज में विभिन्न समाजसेवाओं में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई ऐसी कई ऐसी चीजे हैं जो हमें निरुत्तर कर देती है। कभी कभी सबको साथ लेकर चलने में बड़ी मुश्किल हो जाती है, लेकिन अगर कहीं चुप रहने से शांति बढ़ती है और कलह रुकता है तो चुप रहना भी बेहतर है। तो ठीक उसी जगह पर हम समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते है सेवा का। हमेशा मेंबर को साथ में लेकर चलने का जरूरी नहीं है, कार्यक्रम रोज हो, यह जरूरी नहीं है। गुणवत्ता उस पर नहीं परखी जाती है, गुणवत्ता इस पर परखी जाती है कि आपकी वजह से कितने लोग खुश हैं। आपकी वजह से कितने लोगों के घरों में चूल्हा जलता है। आपकी वजह से कितनी लेडीज बाहर निकली है और कितनों में आत्मविश्वास आया है। जरूरी यह है कि कई संस्थाओं से ज्यादा मूल्यों को प्रधानता दी जाती है और उन्हें विश्वास के साथ आगे बढ़ाया जाता है।
7. आप राइजिंग भास्कर की महिला सशक्तिकरण की ब्रांड एंबेसडर हैं और अनेक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम करती हैं। लेकिन क्या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाना ही महिला सशक्तिकरण है? यदि किसी महिला के पास अपनी कमाई हो, समाज में सम्मान हो, फिर भी उसे अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता न मिले, तो क्या वह वास्तव में सशक्त है? और एक दूसरा सवाल—महिलाओं को आगे बढ़ाने वाली संस्थाएं अक्सर महिलाओं को ही बदलने की सलाह देती हैं; क्या पुरुषों की सोच, परिवार की व्यवस्था और समाज के व्यवहार में बदलाव लाए बिना महिला सशक्तिकरण का सपना पूरा हो सकता है?
उत्तर : बिलकुल सही कहा आपने। पुरुष प्रधान देश है। एक नारी को बढ़ते हुए पुरुष देख नहीं सकता। ऊपर से शब्दों से बोलना पसंद करता है, मगर अंदर से पसंद नहीं करता है। सारे जेंट्स की अगर एक संस्था है और एक महिला को अध्यक्ष बनाने को कहा जाए तो हाथों हाथ पुरुष डिनाई कर देते हैं। सकारात्मक सोच रखना और करना, दोनों में बहुत फर्क है। कथनी और करनी एक समान नहीं होती है। महिला को अपना वजूद और वर्चस्व को स्थापित करने के लिए कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसकी शुरुआत घर से होती है। अपने ही अपनों को आगे नहीं बढ़ने देते हैं। और इन प्रयासों को मद्दे नजर रखते हुए महिलाओं को खुद को खुद के लिए लड़ना पड़ता है। और यह बात बिलकुल सत्य है। पुरुष प्रधान देश में इसे नकार नहीं सकते। और हम प्रतिदिन इन व्यवस्थाओं का और इन सामाजिक परिप्रेक्ष्य का सामना करते हैं और अपने आपको स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
8. आप शिक्षा, युवाओं के मार्गदर्शन और जरूरतमंद परिवारों की सहायता जैसे अनेक क्षेत्रों में सक्रिय हैं। लेकिन समाजसेवा की राह में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती होंगी, जब संसाधनों की कमी, लोगों की उदासीनता या व्यवस्था की धीमी गति किसी अच्छे प्रयास को रोक देती होगी। क्या कभी ऐसा क्षण आया, जब आपने मन ही मन कहा हो कि केवल सेवा भावना से सब कुछ नहीं बदला जा सकता? यदि आपको समाज में एक ऐसी व्यवस्था बदलने का अवसर मिले, जो बच्चों, युवाओं और वंचित लोगों के भविष्य को सीधे प्रभावित करती हो, तो आप सबसे पहले क्या बदलना चाहेंगी?
उत्तर : बिलकुल सही। समाजसेवा कितने ही प्रकार से की जा सकती है। चाहे बेजुबान पक्षियों के लिए हो, चाहे महिलाओं के लिए हो चाहे प्रकृति के लिए हो। हर चीज का अपना दायरा है। प्रभु ने कहा है नेकी कर दरिया में डाल। किसको क्या देना है हम न सोचें। वो सोच रहा है कि मुझे क्या देना है। किस रूप में जाना जाएगा और क्या नाम दिया जाएगा। वह सब परमात्मा के हाथ में है। हम इसकी चिंता ना करें, जिसको जो कहना है कहें। समाजसेविका कहें, पशु-पक्षियों के लिए कहें, मदर टेरेसा कहें, जो कहना है कहें, लेकिन एक अच्छे इंसान के रूप में अवश्यक कहें। यह मेरी प्रभु से हाथ जोड़कर प्रार्थना है।
9. आपका उद्देश्य अंतिम सांस तक समाजसेवा करना है। यह संकल्प जितना बड़ा है, उतना ही बड़ा सवाल भी अपने साथ लाता है। दूसरों के सपनों को पूरा करने में जुटी निरूपा का अपना कोई ऐसा सपना है, जिसे उन्होंने जिम्मेदारियों के कारण हमेशा बाद के लिए टाल दिया? कोई यात्रा, कोई रचनात्मक काम, कोई निजी इच्छा या खुद के साथ बिताने के लिए कुछ शांत पल? यदि आपको एक पूरा दिन ऐसा मिले, जिसमें न कोई सामाजिक कार्यक्रम हो, न किसी संस्था की जिम्मेदारी और न किसी जरूरतमंद का फोन, तो आप वह दिन कैसे बिताना चाहेंगी? क्या अपने लिए जीना भी समाजसेवा करने वाले व्यक्ति के जीवन का जरूरी हिस्सा है?
उत्तर : बिलकुल। जैसा कि कोरोना से काम शुरू किया। जीव दया, प्राणी मात्र के प्रति दया। यह हमारें जींस मेंं है। हमारी हेरिडेटी है। फिर भी प्रभु से सेवा की प्रार्थना करूंगा। एक भी दिन ऐसा नहीं चाहूंगी कि बिना सेवा रहूं। ऐसा मौका मिलता रहे। प्रभु सेवा का मौका देते रहें। प्रभु इच्छा सर्वोच्च इच्छा।
10. आप कहती हैं कि जीवन की अंतिम सांस तक समाजसेवा करना चाहती हैं। कल्पना कीजिए कि वर्षों बाद आपके कार्यक्रमों की तस्वीरें पुरानी पड़ जाएं, पुरस्कार अलमारियों में रखे रह जाएं और संस्थाओं में नए लोग जिम्मेदारी संभालने लगें। उस समय आप चाहेंगी कि लोग आपको किस रूप में याद करें—एक ऐसी महिला के रूप में, जिसने सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया; एक ऐसी समाजसेवी के रूप में, जिसने बेजुबानों की प्यास बुझाई; या उस इंसान के रूप में, जिसने दूसरों को यह सिखाया कि सेवा किसी पद, संस्था या प्रशंसा की मोहताज नहीं होती? और यदि आपकी जिंदगी का एक वाक्य आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ना हो, तो वह क्या होगा—ऐसा वाक्य, जिसे पढ़कर कोई युवा अपने जीवन में पहली बार किसी अनजान जरूरतमंद की मदद करने के लिए आगे बढ़ जाए?
उत्तर: सिर्फ एक ही चीज से कुछ नहीं होता। प्यार से घर नहीं चलता। पैसों की जगह पैसा चाहिए होता है। अगर इन व्यवस्थाओं में से कोई ऐसी व्यवस्था मिलती हो, जिसके साथ चलकर हम आम जनता का भरोसा जीत सकें। आम जनता के लिए कुछ कर सकें। तो उस व्यवस्था का वेलकम करना चाहूंगी। आप किसी भी पद पर रहे और सरकार की या किसी भी प्रकार की योजना को किसी भी प्रकार के बेनिफिट को किसी भी प्रकार की व्यवस्था को आम किसी तक पहुंचाने में सक्षम होते हैं तो यह प्रकृति का सबसे बड़ा तोहफा हैं।
उदित भास्कर के संपादक (समाचार) सुमनेश व्यास द्वारा यू-टयूब वीडियो पर समाजसेवी निरूपा पटवा

























(श्रीमती निरूपा पटवा अपने परिवार, अपनी टीम, पुरस्कार और आयोजनों की शोभा बढ़ाते हुए। एक ही व्यक्तित्व विभिन्न रूपों में।)

(श्रीमती निरूपा पटवा के पति श्री कपिल पटवा को माला पहनाकर अभिनंदन करते दिलीप कुमार पुरोहित।)

(श्रीमती निरूपा पटवा का दुपट्टा पहनाकर अभिनंदन करते दिलीप कुमार पुरोहित।)
श्रीमती निरूपा पटवा : परिचय
श्रीमती निरूपा पटवा की कहानी केवल एक महिला की सेवा यात्रा नहीं, बल्कि उन 300 से अधिक महिलाओं की सामूहिक शक्ति की कहानी है, जिन्होंने अपनी बचत, समय और संवेदना को समाज के नाम कर दिया है। उनके लिए सेवा किसी विशेष दिन का काम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है—और शायद यही किसी भी उत्सव का सबसे सुंदर अर्थ है। जन्मदिन, शादी की सालगिरह, बच्चों के जन्मदिन या परिवार के किसी सदस्य की पुण्यतिथि—आमतौर पर ये अवसर निजी खुशियों से जुड़े होते हैं। लेकिन जोधपुर की निरूपा पटवा ने इन खुशियों को जरूरतमंदों की मदद, जीवदया और सामाजिक सेवा से जोड़कर एक ऐसी पहल को आकार दिया है, जिसमें 300 से अधिक महिलाएं लगातार भागीदारी निभा रही हैं। इस महिला समूह की सदस्य अपनी बचत और सामूहिक सहयोग से वर्षभर में करीब 15 से 25 लाख रुपए सेवा कार्यों पर खर्च करती हैं। लगभग 300 सेवा गतिविधियां हर साल आयोजित की जाती हैं और समूह अब तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक लाख से अधिक जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचा चुका है। खास बात यह है कि सेवा केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है। महिलाएं अपने घरों से फ्रिज, टीवी, कूलर, स्टील के बर्तन, प्रेस मशीन जैसी उपयोगी वस्तुएं भी जरूरतमंद परिवारों को उपलब्ध करवाती हैं। निरूपा पटवा की सेवा यात्रा में बेटियों के प्रति संवेदना का विशेष स्थान है। लव-कुश अनाथ आश्रम की पांच बच्चियों के सामूहिक विवाह में उन्होंने एक मूक-बधिर कन्या का कन्यादान किया। जरूरतमंद और गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में भी वे सहयोग करती हैं। कैंसर पीड़ित महिलाओं के लिए विग तैयार कराने के उद्देश्य से आयोजित मेगा हेयर डोनेशन कैंप में करीब 150 महिलाओं ने एक साथ अपने बाल दान किए। यह पहल महिलाओं की सामूहिक संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का उदाहरण बनी। राजकीय अस्पतालों में मरीजों को फल और आवश्यक सामग्री वितरित करने के साथ स्वास्थ्य शिविर भी आयोजित किए जाते हैं। राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल के प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र में व्हीलचेयर और पलंग उपलब्ध करवाने जैसे कार्य किए गए हैं। विभिन्न स्थानों पर आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और एलोपैथिक चिकित्सा शिविर भी लगाए जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों को कंप्यूटर, पंखे, फर्नीचर, वाटर कूलर, खेल सामग्री, किताबें, स्टेशनरी, बैग, स्वेटर और चप्पल जैसी जरूरत की वस्तुएं उपलब्ध करवाने के साथ बच्चों की फीस में भी सहयोग किया जाता है। राजकीय बालिका विद्यालयों में सैनिटरी पैड मशीनें लगवाना और छात्राओं में स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी अभियान का हिस्सा है। राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में आंगनवाड़ी और एकल विद्यालयों तक पहुंचकर शिक्षा सामग्री का वितरण भी किया गया है। सेवा का दायरा मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है। कई गौशालाओं में चारे और कमरों की व्यवस्था, पक्षियों के लिए परिंडे तथा गायों और कुत्तों के लिए पानी के कुंडे रखने जैसे कार्य किए जाते हैं। जरूरतमंद दिव्यांगों को कृत्रिम हाथ-पैर उपलब्ध करवाने के अलावा वात्सल्यपुरम, अपनाघर, नारी निकेतन, वृद्धाश्रम और अनाथ आश्रमों में भोजन व आवश्यक सामग्री पहुंचाई जाती है। गरीब परिवारों को मासिक आर्थिक सहायता और मानसिक व शारीरिक रूप से पीड़ित लोगों की मदद भी की जाती है। निरूपा पटवा सेवा को सशक्तिकरण से भी जोड़ती हैं। महिलाओं के लिए निशुल्क कुकिंग, ब्यूटीशियन, योग, मेडिटेशन, सीपीआर, मेहंदी और सिलाई प्रशिक्षण आयोजित किए जाते हैं। मोटिवेशनल सेमिनार, प्रदर्शनियों और मेलों के जरिए महिलाओं को अपने हुनर और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के अवसर दिए जाते हैं। साथ ही हेलमेट, यातायात नियम, नशामुक्ति और प्लास्टिक के दुष्प्रभाव जैसे विषयों पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। जोधपुर में कोलगेट और सैनिटरी पैड से जुड़े जागरूकता अभियानों के तहत वर्षभर निशुल्क वितरण में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहती है। कोरोना काल में जब सामान्य जीवन ठहर गया था, तब निरूपा पटवा ने स्वयं प्रतिदिन करीब 150 से 200 लोगों के लिए भोजन तैयार कर वितरित किया। इस सेवा के लिए उन्हें राजस्थान सरकार द्वारा जिला स्तर पर सम्मानित किया गया। उन्हें महाराजा गजसिंह द्वारा वीर दुर्गादास राठौर सम्मान, न्यायपालिका से जुड़े विशिष्ट सम्मान, दादा साहब फाल्के सम्मान, प्राइड ऑफ मारवाड़ अवार्ड 2026 तथा केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा सुपर एक्सीलेंसी अवार्ड सहित अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। जोधपुर की 100 से अधिक संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित किया है। सामाजिक क्षेत्र में वे राष्ट्रीय पुलिस महिला कल्याण मोर्चा की अध्यक्ष, वन बंधु परिषद की संयुक्त सचिव तथा विभिन्न संस्थानों की महिला सशक्तिकरण, एंटी-रैगिंग और यौन उत्पीड़न संबंधी समितियों की सदस्य भी रह चुकी हैं। जायंट्स ग्रुप ऑफ़ रॉयल लेडीज , जोधपुर की ऐतिहासिक उपलब्धि, वर्ष 2025–26 में उत्कृष्ट सेवा कार्यों के लिए 30 अवॉर्ड्स
सेवा और समर्पण के पर्याय बन चुके रॉयल लेडीज जोधपुर ने वर्ष 2025–26 के दौरान अपने सेवा कार्यों से डिस्ट्रिक्ट स्तर पर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। ग्रुप ने अपनी शानदार कार्यशैली और समाजोपयोगी प्रोजेक्ट्स के दम पर कुल 30 प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स अपने नाम किए हैं, जिसमें 15 ग्रुप अवॉर्ड्स और 15 व्यक्तिगत सम्मान शामिल हैं। इस गौरवशाली उपलब्धि ने पूरे शहर का मान बढ़ा दिया है। इस सफलता के तहत विशेष व्यक्तिगत सम्मानों में निरूपा पटवा को उनके कुशल नेतृत्व के लिए ‘बेस्ट प्रेसिडेंट’, उत्कृष्ट संचालन के लिए ‘बेस्ट सेक्रेटरी’, ऑफिसर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही, निरूपा पटवा को प्रतिष्ठित ‘जायंट्स फाउंडेशन अवार्ड्स’ से भी सम्मानित गया। ग्रुप को विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए बेस्ट ग्रुप अवॉर्ड, बेस्ट अवॉर्ड, अधिक मेंबरशिप अवॉर्ड, ग्लोबल ग्रांट अवॉर्ड के साथ-साथ सुजन सम्मान, सप्तऋषि सम्मान, शक्ति गौरव सम्मान, स्वच्छ रत्न सम्मान और रक्त गौरव सम्मान जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। ग्रुप के पदाधिकारियों ने इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय सभी के अटूट समर्पण, बेहतरीन टीमवर्क और समाज सेवा की भावना को दिया है। इस अवसर पर सभी सदस्यों ने जायंट्स के मूल मंत्र “Service Above Self” (सेवा सर्वोपरि) के आदर्शों पर भविष्य में भी पूरी निष्ठा और ऊर्जा के साथ कार्य करते रहने का दृढ़ संकल्प लिया। देश में कई मुद्दों पर जागरूकता लाने का मिशन भी चलाती हे जैसे कि हेलमेट पहनना क्यू ज़रूरी है , यातायात के नियमों का पालन क्यों ज़रूरी है । नशा मुक्ति प्लास्टिक अवेयरनेस आदि। 150 से अधिक संस्थाओं से सम्मानित हो चुकी हैं।








