जिस संस्थान में काम करती हूं उसकी विसंगतियों पर मेरा पत्रकार चुप नहीं बैठता : तसनीम खान

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तसनीम खान के कहानी संग्रह बवालिस्तान पर उमा, विनीता बाड़मेरा और हंसा विश्नोई ने किया संवाद, वरिष्ठ साहित्यकार पद्मजा शर्मा ने की विशेषज्ञ टिप्पणी

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

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महिलाओं की संस्था संभावना की ओर से वरिष्ठ पत्रकार तसनीम खान के कहानी संग्रह बवालिस्तान संवाद हुआ। पत्रकार और कथाकार उमा, कथाकार विनीता बाड़मेरा और हंसा विश्नोई ने संवाद किया। क्रमश: सवालों के जवाब में तसनीम खान ने कहा कि आज आजादी दिखाने को अलग है और आजादी के मायने अलग है। हमने आजादी के बंटवारे की त्रासदी नहीं देखी, लेकिन हमने अपने बुजुर्गों से उसका दर्द सुना है। इसलिए यही दर्द हमारे साहित्य में उतरता है। हमारे हिस्से में विभाजन की पीड़ा देखना बेशक नहीं है, पर हमें इस विषय के इर्द-गिर्द भी लिखना ही होगा।

तसनीम ने एक सवाल के जवाब में कहा कि वह जिस संस्थान में काम करती है, अगर उसकी विसंगतियों के बारे में लिखने का साहस नहीं करती है तो उसके भीतर बैठे पत्रकार को यह बात गवारा नहीं है। फिर चाहे परिणाम कुछ भी हो वह लिखना पसंद करती है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में उन्हें आजादी मिली और कुछ भी करने की आजादी की वजह से ही उन्होंने पत्रकारिता का पेशा चुना। हालांकि वह गणित में अच्छे मार्क्स लाती थी मगर अंकों से खेलना उसे नहीं जंचता। इसलिए वह हमेशा कुछ नया करने का सोचती। उनके परिवार में कई महिलाएं टीचर की नौकरी में है और अब कुछ रिटायर्ड भी हो चुकी हैं। मगर वह हमेशा अपने को चुनौतियों से जूझने वाले काम में देखना चाहती थी। इसलिए उन्होंने पत्रकारिता का पेशा चुना। पत्रकारिता में रोज कुआं खोदो और रोज पानी निकालो वाली बात है। कल आपने कितना भी अच्छा किया हो, उसे कोई नहीं देखता, आज आप क्या कर रहे हो, यह इम्पोर्टेन्ट हैं।

तसनीम खान ने कहा कि मुस्लिम समाज में कई परंपराएं ऐसी हैं, जिससे वह आहत हुईं और इसलिए उन्हें कलम चलानी पड़ी। बहू पत्नी प्रथा भी इसमें से एक है। जब एक व्यक्ति की दो या तीन पत्नियां होती है तो पति से कोई नहीं पूछता और पत्नियां एक-दूसरे में बुराइयां ढूंढ़ती है। पुरुष प्रधान समाज में पुरुष से कोई सवाल नहीं करता। स्त्री ही एक दूसरे से ईर्ष्या के भाव रखती है। बहू पत्नी प्रथा पर लिखी उनकी कहानी पर चर्चा के दौरान कहानी की खूब प्रशंसा हुई। बवालिस्तान कहानी पर विशेष चर्चा हुई। यह एक चैनल पर केंद्रित कहानी है जो आज की हकीकत से पर्दा उठाती है। राजनीतिक उठापटक, व्यंग्य, आंतरिक राजनीतिक, पत्रकारों की पीड़ा, स्टोरी एंगल और कई पहलुओं से पर्दा उठाने वाली यह कहानी चर्चा का केंद्र रहीं।

तसनीम खान गंगा-जमुनी तहजीब की कथाकार है : पद्मजा शर्मा 

वरिष्ठ साहित्यकार पद्मजा शर्मा ने कहा कि तसनीम खान गंगा-जमुनी तहजीब की कथाकार है। वे पत्रकार के रूप में जो देखती है और भोगती है, वह कहानी और साहित्य में उतरता है। शाहीनबाग, आजादी का बंटवारा, नानी से सुनी कहानियां, समाज की कुप्रथाएं, मुस्लिम समाज में बहु पत्नी प्रथा और राजनीतिक शोषण और ब्यूरोक्रेट हो वह कहानी में उतारती हैं। वे हिंदू प्रथाओं के बारे में भी जानकारी रखती है और मुस्लिम परंपराओं का भी ज्ञान रखती है। उनके साहित्य में हिंदी, उर्दू और राजस्थानी मुहावरों और शब्दों का यथोचित उपयोग होता है। वे कहानी के साथ न्याय करती है। आभार अंजना चौधरी ने जताया। संचालन हंसा विश्नोई ने किया। कार्यक्रम के आरंभ में संभावना की अध्यक्ष बसंती पंवार ने अतिथियों का स्वागत किया।

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