कहानी : हरीदास व्यास

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-हरीदास व्यास की कहानियों में जीवन की हकीकत का दिग्दर्शन होता है। वे कहानी जब लिखते हैं तो हर पात्र अपने आप में जीवंत हो जाता है। ऐसा लगता है कि हमारे सामने कोई फिल्म चल रही है। हर पात्र अपनी पूरी ऊर्जा और संवेग के साथ चित्रित होता है। प्रस्तुत कहानी मोहलत में मौत का इंतजार कर रहे व्यक्ति की मनोदशा का उल्लेख करते हुए कहानीकार ने समाज के सामने कई सवाल छोड़े हैं...

मोहलत

                                                                  

(इसी कहानी से...चाचा सकपका कर मेरी दवाइयों को टेबल पर ही इधर-उधर करने लगे। पिछले चार महीनाें से मेरे पेट में रह रहकर जो असहासीय और अजीब सा दर्द हो रहा था, उसी से मुझे अहसास हो गया था कि अब डॉक्टरों के पास भटकना बेकार है। बेहतर है कि खेल खत्म होने से पहले अपने बिखरे हुए सामान को समेटा जाए...।) 

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वार्ड में मरीजोंं से मिलने आये लोगों के जाने तक शाम गहरा चुकी थी और कोलाहल के बाद एक सन्नाटा पसर गया था। शाम के राउंड पर डॉक्टर के आने से पहले मैं रोज की तरह एक छोटी-सी झपकीी लेने की कोशिश कर रहा था।

मुझे सोया हुआ जान कर ही चाचा ने डॉक्टर से धीमी आवाज में मेरे ठीक होने के बारे में बेहद मासूम और परेशान-सा सवाल किया।

डॉक्टर ने जवाब देने से पहले जरूर मेरे चेहरे पर एक नजर डाली होगी और फिर मेरी बंद आँखों को देखने के बाद ही कहा होगा-

देखिये, ये ठीक नहीं हो सकते। हम ज्यादा से ज्यादा इन्हें कुछ और दिनों तक जिंदा रख सकते हैं, बस।

डॉक्टर की बात सुनते ही मेरी आँखें मेरे अन्चाहे ही झटके से खुल गईं। और मानो, पलकों के खुलने की आवाज से चौक कर डॉक्टर और चाचा ने लगभग एक साथ मेरे चेहरे की ओर देखा। डॉक्टर आगे बढ़ गया। चाचा सकपका कर मेरी दवाइयों को टेबल पर ही इधर-उधर करने लगे।

पिछले चार महीनों से मेरे पेट में रह-रह कर जो असहनीय और अजीब-सा दर्द हो रहा था, उसी से मुझे अहसास हो गया था कि अब डॉक्टरों के पास भटकना बेकार है। बेहतर है कि खेल खत्म होने से पहले अपने बिखरे हुए सामान को समेटा जाए।

पर एक रात जब मैं दर्द से बेहोश हो गया और सीमंती मुझे अस्पताल ले गई, तभी से इस डॉक्टर से उस डॉक्टर, इस अस्पताल से उस अस्पताल की जो भाग-दौड़ शुरु हुई;  उसका अंत अब होने जा रहा है। इस अंत को तो आरंभ से ही तयशुदा मान लिया था मैंने! पर वही अंत डॉक्टर के मुँह से इतने साफ शब्दों में सुन कर, मैं चाहते हुए भी चौंक गया। भय मुझे तब भी नहीं लगा था। भय मुझे अभी रात के तीसरे पहर भी नहीं लग रहा है।

रात दस बजे तेरह नंबर वाले मरीज के मर जाने से पूरा वार्ड मानो अब भी मृत्यु-भय के कारण शांत है। रोज की तरह आज कोई मरीज दर्द से कराह भी नहीं रहा है। पूरे अस्पताल में जैसे एक बोझिल रात पसरी हुई है। फिर भी मैं भयभीत कतई नहीं हूँ।

मुझे और कुछ नहीं, पर थोड़े दिनों की मोहलत जरूर चाहिए। मोहलत इसलिए कि केवल खुद के लिए जिये गये जीवन में कुछ अपनों और अन्जानों के साथ जाने-अन्जाने में किये गये अपराधों के लिया बाकायदा पश्चाताप कर सकूँ। दरअसल पिछले कई दिनों से अपनी शारीरिक तकलीफों से ज्यादा मुझे अपने इस अपराध-बोध के कारण तकलीफ हो रही है। इसे आप चाहे मेरा स्वार्थ समझें कि इस तकलीफ से निजात पाने के लिए मैं डॉक्टर से थोडी़-सी मोहलत जरूर चाहता हूँ।

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अपने दोनों बच्चे श्वेता और संयम को मैं पहले जी भर कर प्यार कर लेना चाहता हूँ। मैं मानता हूँ कि उनको प्यार करने के कई मौकों को मैंने बेवजह गँवाया है, पर उनसे हुई किसी गड़बड़ पर उन्हें शायद ही कभी डाँट-फटकार बिना छोड़ा है। मैंने अपने जीवन में उन्हें सचमुच वह समय नहीं दिया है, जिस पर केवल उनका अधिकार था।

अस्पताल अब भी भारी खामोशी में लिपटा पड़ा है। वार्ड की खिड़की से बाहर मर्करी की रोशनी से नहाया हुआ रजनीगंधा भी सकपकाया-सा चुपचाप खड़ा है। और ऐसे में मेरी आँखों के आगे सीमंती के कई अक्स निरंतर -जा रहे हैं।

शुरु के बरसों में उसकी स्वस्थ देह-गंध, इंतजारती आँखें और लजायी मुस्कानों से बँधा हुआ मैं हर पल उसके निकट बने रहना चाहता था। पर श्वेता के जन्म के बाद से ही सीमंती कभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं रही। उसके शरीर में हमेशा कोई कोई तकलीफ बनी ही रहती। वह अपनी चमक तभी से खोने लगी थी। कुछ ही समय बाद उसके निस्तेज होते चेहरे और हर रोज बनी रहने वाली तकलीफों से मैं उकताने लगा था। अपनी परेशानियों के बावजूद वह मेरे प्रति अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर अधिक सतर्क और चिंतित रहने लगी। उसकी इस आदत पर मैं और अधिक झल्ला जाता था। पर मेरे मन में यह आशंका भी बार-बार उभर आती कि सीमंती जरूर किसी ठीक होने वाली बीमारी की शिकार बन चुकी है।

उन्हीं दिनों हमारे ऑफिस में शुचिता सान्याल नेज्वॉइनकिया। मैं खुद समझ नहीं पाया कि कुछ ही दिनों में कैसे वह मेरे बेहद निकट गई।

मैं जब-जब शुचिता के साथ शाम बिता कर आता, तब-तब सीमंती के लिए मेरे मन में अचानक प्यार उमड़ आता। वह भोली-भाली मेरे इस अचानक आये प्यार से ही खुश हो जाती। और, उसका चेहरा तकलीफ के बावजूद आनंद से सराबोर दिखाई देता।

ऐसी भोली सीमंती के लिए मैं सचमुच कुछ दिनों की मोहलत चाहता हूँ। अपने अपराध को स्वीकार कर उसके आगे सिर झुकाना चाहता हूँ। उसको इतना सुख देना चाहता हूँ कि मेरे रहने पर उस पर आने वाला दुख भी उसे तोड़ सके।

जब मुझे इलाज के लिए यहाँ लाया जा रहा था, तब मैंने देखा था कि वह किस कदर अपने मुँह में रूमााल ठूँस कर अपनी रुलाई रोक रही थी। उस समय वह मुझे दुनिया की सबसे निरीह औरत दिखाई दे रही थी। यही निरीहता अब उसका जीवन होगा। ऐसे अंतहीन दुख से पहले मैं उसे आखिरी बार सुख से सराबोर करने के लिए थोड़ी-सी मोहलत चाहता हूँ। वैसे मैं खुद अपने इस मन को समझ नहीं पा रहा हूँ।

अजीब बात होने के बावजूद भी यह सच है कि जीवन के इस अंतिम समय में सीमंती के साथ-साथ मैं खुद को शुचिता का भी अपराधी अनुभव कर रहा हूँ।

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मेरे प्रति शुचिता के लगाव को जानने के बाद मैंने उसे अपने और निकट आने के भरपूर मौके दिये। मैं जाने-अन्जाने अपनी काबलियतों से उसे मोहता था। इसी कारण कुछ ही समय में वह दीवानगी की सारी हदें तोड़ चुकी थी। मैं उस समय अपने-आपको शुचिता के सामने चाहे जिस रूप में भी पेश कर रहा था पर मेरे प्रति उसकी ऐसी दीवानगी के बावजूद भी, वह मेरे लिए शायद एक नया स्वाद ही थी।

मैं लफंगा तो शायद कभी नहीं था, पर उसके प्रेम का छलछलाता आवेग झेलने की ताब भी मुझमें नहीं थी। उसके प्रेम के आगे मैं खुद को बौना महसूस करने लगा।

उन दिनों जब भी मैं उसका शरीर पाने को ललकता, उसका स्वर बेहद करुण हो जाता। वह बिना किसी बनावट के कहती-

सुनो, मैं तुमसे यह सब नहीं चाहती। विश्वास करो मैं कल्पना में भी तुम्हारे साथ ऐसा कुछ करने का नहींे सोचती। मैं तो चाहती हूँ तुम्हारे लिए मर जाऊँ। तुम्हारा हाथ थामे सारी रात तुमसे बातें करते हुए तारों भरा आकाश देखती रहूँ। तुम नहीं जानते, तुम मेरे लिए कितने पवित्र हो! मैं तुम्हें अपने शरीर से अपवित्र करना नहीं चाहती ........”

झूठ नहीं कहूँगा, उत्तेजना के क्षणों में उसकी ये बातें मुझे निहायत बेवकूफी भरी लगती। मैं खीझ भी जाता। पर अपने स्वर को प्रेम में भिगो कर दलीलें देता कि शरीर से हो कर ही प्रेम के सबसे ऊँचे और आखिरी पड़ाव तक पहुँचा जा सकता है। हम प्रेम की हर पतली सी पगडंडी से भी गुजरेंगे और एक दिन प्रेम के अकूत झरने का एक हिस्सा बन जाएँगे।

कुल मिला कर मैं उसके आदर्श प्रेम से ऊबने लगा था। आखिरकार मैंने ही गुपचुप तरीके से उसका तबादला करवाया। अपने तबादले से अचकचाई शुचिता को मैंने यह कहते हुए उसे दूसरे शहर भेज दिया कि कुछ ही दिनों बाद मैं भी अपना तबादला उसी शहर में करवा दूंगा। और तब जिंदगी की हर शाम हमारी होगी। दूधिया चाँदनी की रातों में हम जी भर कर नहाएँगे। विश्वास-अविश्वास में डूबती-उतरती शुचिता झरती हुई आँखों से विदा हो गई तो मैंने गहरी तसल्ली भरीसाँस ली। जाने के बाद उसके कॉल और व्हाट्स एप मैसेज से मैं उकता गया तो उसे बेरहमी से ब्लॉक कर दिया। जाने अब वह कहाँ, किस शहर में होगी। अपने इस पाखंड और अपराध के लिए मैं सचमुच शुचिता से माफी माँगना चाहता हूँ।

मैं थोड़ी-सी मोहलत अपने दोस्त वैंकटेश के लिए जरूर चाहता हूँ। मैं यह स्वीकार लेना चाहता हूँ कि उसके प्रति मेरा व्यवहार हमेशा ही उस व्यक्ति जैसा ही रहा है जो हमेशालेनातो बखूबी जानता है पर

कुछ भीदेनाउसे हमेशा हीअसंभवऔरअभी नहींजैसा ही लगता रहा है। वह हर हाल में सिर्फ मेरे लिए एक बेहतरीन दोस्त था बल्कि मेरी बेवजह की आर्थिक-जरूरतों को पूरा करने वाला शांता क्लॉज भी था। उसको अपना दुख कहने का मैंने कोई अवसर नहीं नहीं दिया। तब भी नहीं जब उसकी पत्नी

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जिंदगी की लड़ाई हार गई थी और वैंकटेश अपनी पाँच साल की बेटी के साथ दुनिया में बिल्कुल तन्हा हो गया था। पर मैं उन्हीं दिनों शुचिता के साथ मेरे संबंधों की खबर सीमंती को लग जाने की वजह से बेहद परेशान था। इसलिए उस समय वैंकटेश के साथ मैं औपचारिकता जितना समय भी नहीं बिता पाया।

मैं जानता था कि उसकी परेशानियाँ बेइंतिहा थीं। बीवी के इंतकाल के बाद कई दिनों तक तो वह घर से बाहर ही नहीं निकला और फिर अचानक एक दिन अपनी बच्ची को ले कर बिना किसी को बताये जाने कहाँ चला गया कि अब तक भी नहीं लौटा। अपने ऐसे दोस्त को तलाश कर मैं अपने खुदगर्ज व्यवहार के लिए उससे माफी माँगना चाहता हूँ।

मैं उस अन्जान लड़के का भी अपराधी हूँ जो बरसों पहले मेरे साइड देने से सामने आती सिटी-बस से टकरा कर जिंदगी भर के लिए अपंग हो गया था। मैं उसे ओवरटेक करने के लिए जगह देता तो उसका एक्सीडेंट होता। उसके पैर पर से गुजरती सिटी बस को देख कर मैं कायरों की तरह वहाँ से निकल गया। मुझे हैरानी से देखती उसकी आँखें मुझे याद आती हैं तो मैं अब भी सिहर जाता हूँ। मैं उस लड़के से मिल कर उसके सामने अपराधी की तरह सिर झुका देना चाहता हूँ! मैं भारी मन से यह भी स्वीकारना चाहता हूँ कि मुझसे सीनियर चावला को मैंने ही एकाऊंट घपले में फँसा कर, उससे पहले प्रमोशन ले लिया था। मुझसे ज्यादा काबिल मेरेजूनियर्समेरी ईर्ष्या की लपटों से कई-कई बार बुरी तरह झुलस चुके हैं। मैं इन सबके सामने भी अपने अपराध कबूल करना चाहता हूँ। 

पर इन सारे कामों को कर सकूँ, उतना समय मुझे कौन देगा! मोहलत के नाम पर डॉक्टर शाम ही को अपना जवाब दे चुका है। अस्पताल की भारी हवा तो साँस लेने की मोहलत भी बामुश्किल देती है।

ढेर-से अपराध-बोधों का बोझ अब असहनीय होता जा रहा है। मैं अपने-आपको उस व्यक्ति आदमी की तरह महसूस कर रहा हूँ जिसका हवाई-जहाज से कूदने के बाद पैराशूट खुला ही नहीं है, जिसके खुलने की अब कोई संभावना भी नहीं है, धरती पर गिर कर उसका खत्म हो जाना तय है। इस तयशुदा सच को जान लेने के बाद धरती पर गिरने से पहले उसे बहुत-सी जरूरी बातें अपने आत्मीयों से करनी और कहनी हैं, उन तक बेहद जरूरी संदेश पहुँचाने हैं। पर उसके पास बिल्कुल भी समय नहीं है। वह छोटी-सी मोहलत चाहता है। बस, कुछ समय और।

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घर-गली संख्या-2,

चौपासनी ग्राम,

जोधपुर-342014

मो‘ 9414295336/7014165275

ईमेलः hdr2005@gmail.com

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